सम्मत- पहले मारे सो मीर

प्रदीप सिंह
Tue, 04 Sep, 2018 09:24 AM IST

राजनीति में परसेप्शन (धारणा) बहुत अहम होता है। कांग्रेस पार्टी एक के बाद एक परसेप्शन की लड़ाई हारती जा रही है। ताजा मामला राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव का है। कांग्रेस ऐसी बाजी हारी है जो थोड़े से प्रयास से वह जीत सकती थी। राज्यसभा में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बहुमत हासिल नहीं है। किसी भी विधायी कार्य के लिए सरकार को विपक्षी दलों की मदद पर निर्भर रहना पड़ता है। राजग से बाहर के दलों में एकता न होने से कई बार सत्तारूढ़ दल को फायदा होता है। राज्यसभा में पार्टियों के सदस्यों की स्थिति और दोनों खेमों के लिए घोषित समर्थन के आधार पर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए और भाजपा की अगुआई वाले राजग को क्रमश: एक सौ ग्यारह और 124 सदस्यों का समर्थन हासिल था। मतदान हुआ तो राजग के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह को एक सौ पच्चीस और यूपीए के उम्मीदवार बीके हरिप्रसाद को सिर्फ एक सौ एक वोट मिले। यानी जो साथ थे उनमें से भी कई वोट देने नहीं आए। न आने वालों में कांग्रेस के भी सदस्य हैं। करीब चार दशक बाद राज्यसभा के उपसभापति के पद से भी कांग्रेस की विदाई हो गई। अब राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, राज्यसभा के उप सभापति, लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सहित पांचों संवैधानिक पदों पर भाजपा या राजग का कब्जा है। आजादी के बाद यह पहली बार हो रहा है कि इनमें से कोई पद कांग्रेस के पास नहीं है।
पुरानी कहावत है- पहले मारे सो मीर। राज्यसभा के उप सभापति के चुनाव में दोनों खेमों में फर्क यह रहा कि भाजपा पहले से तैयार थी और कांग्रेस ने देर से और बेमन से कदम उठाया। कांग्रेस ने पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की वंदना चह्वाण के नाम पर सहमति जताई। शिवसेना ने आश्वासन दे दिया कि वह मराठी अस्मिता के सवाल पर चह्वाण का साथ देगी। पर शरद पवार पीछे हट गए। उन्हें कांग्रेस के रवैये से अपने उम्मीदवार की जीत का भरोसा नहीं हुआ। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक अमूमन कांग्रेस और भाजपा दोनों से दूरी बनाकर चलते हैं। उप राष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने विपक्ष के उम्मीदवार का समर्थन किया था। इस बार भाजपा ने उनको पहले से साधा। नवीन पटनायक की बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात करवाई गई। नवीन पटनायक की शर्त थी कि उम्मीदवार भाजपा या उसके बहुत करीबी का नहीं होना चाहिए। इसी वजह से शिरोमणि अकाली दल के नरेश गुजराल का नाम कट गया। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को प्रधानमंत्री पहले से ही साध रहे थे। राव फेडरल फं्रट के मुद्दे पर ममता बनर्जी के साथ थे। पर इस बार भाजपा के साथ आ गए। ममता बनर्जी ने राव से पहले संपर्क करने या बाद में भी मनाने की कोशिश नहीं की। दरअसल तृणमूल कांग्रेस चाहती थी कि उप सभापति के लिए उसका उम्मीदवार हो। पर कांग्रेस तैयार नहीं हुई।
बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्र समिति का समर्थन हासिल करने के बाद भाजपा का रास्ता आसान हो गया। इसके बावजूद कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी चुनौती देने की कोशिश नहीं की। उसका सबसे बड़ा उदाहरण आम आदमी पार्टी का बयान है। आप ने राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति चुनाव में बिना मांगे कांग्रेस को समर्थन दिया। इस बार उनका कहना था कि राहुल गांधी अरविंद केजरीवाल से फोन करके समर्थन मांगें तभी देंगे। राहुल गांधी ने फोन नहीं किया। इसी तरह पीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस से पार्टी ने सम्पर्क नहीं किया। राम जेठमलानी ने राष्ट्रीय जनता दल का सांसद होते हुए भी हरिवंश के लिए वोट किया। कांग्रेस देर से जागी पर पूरी तरह नहीं। नवीन पटनायक ने जब हरिवंश के समर्थन की सार्वजनिक घोषणा कर दी तो शरद पवार से कहा गया कि पटनायक से सम्पर्क करें। शरद पवार ने फोन किया तो पटनायक ने कहा कि अब तो वे नीतीश कुमार को वादा कर चुके हैं। कांग्रेस गंभीरता से पूरी ताकत लगाती तो शायद बीजेडी और टीआरएस को कम से कम किसी को वोट न देने के लिए राजी कर सकती थी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और उसका नतीजा सामने है।
पहले अविश्वास प्रस्ताव और अब राज्यसभा के उप सभापति के चुनाव में हार से विपक्षी एकता का तिलिस्म टूट गया है। इसके साथ ही कांग्रेस की विपक्ष को एक करने की क्षमता और राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर एक बार फिर सवालिया निशान लग गया है। संसद के भीतर ये दोनों घटनाएं राहुल गांधी के लिए बड़े अवसर के रूप में आर्इं लेकिन राहुल गांधी अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पाए। भाजपा और अमित शाह की रणनीति एक बार फिर विजयी हुई है। दोनों अवसरों पर सत्तारूढ़ गठबंधन को अपेक्षा से ज्यादा वोट मिले। अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार का साथ न देने वाली शिवसेना को इस बार पार्टी ने हरिवंश को वोट देने के लिए मना लिया। बीजेडी और टीआरएस के समर्थन की घोषणा के बाद तय हो गया था कि भाजपा ने बाजी मार ली है। इसके बावजूद कांग्रेस भाजपा को कड़ी टक्कर देने की कोशिश में भी नाकाम रही। जनतंत्र में प्रत्यक्ष और परोक्ष चुनावों में हार जीत होती रहती है। सवाल इतना ही होता है कि आप हारे कैसे और जीते कैसे। नवम्बर दिसम्बर में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं उसके बाद पूरा देश लोकसभा चुनावों में जुट जाएगा। इसलिए विपक्ष मोदी के खिलाफ जिस एकता की बात कर रहा है उसे देश के सामने दिखाने का यही मौका था। पहले अविश्वास प्रस्ताव और उप सभापति के चुनाव में विपक्षी एकता की कोई तस्वीर उभर कर नहीं आई। भाजपा को इस बात से जरूर प्रसन्नता होगी कि उसके विरोधी खेमे में सब कुछ ठीक नहीं है।
कांग्रेस पार्टी में गजब का आशावाद है। विपक्षी एकता में बिखराव के बावजूद न केवल कांग्रेस दुखी नहीं है, बल्कि खुश है। उसकी खुशी का कारण पार्टी की कोई उपलब्धि नहीं है। वह इस बात से खुश है कि उसके ही एक सहयोगी दल का नुक्सान हुआ है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को आगे करके ममता बनर्जी फेडरल फ्रंट बनाने की बात कर रही हैं। कांग्रेस की परेशानी यह है कि इस फ्रंट में उसके लिए कोई जगह नहीं है। ऐसे में कांग्रेस को लग रहा है कि चंद्रशेकर राव का राजग के साथ जाना ममता के लिए बड़ा झटका है। इन दलों का भाजपा के साथ जाने का एक और संकेत है कि इन नेताओं को लग रहा है कि मोदी सरकार 2019 में वापस आ रही है। वे 2019 के हिसाब से अपने पत्ते चल रहे हैं। कांग्रेस पार्टी को पता नहीं समझ में आ रहा है या नहीं। या वह समझकर भी समझना नहीं चाहती। आम आदमी पार्टी का जनाधार दिल्ली और पंजाब तक ही सीमित है पर उसके नेताओं की यह टिप्पणी कि राहुल गांधी विपक्षी एकता के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा हैं, विपक्षी खेमे के बिखराव का साफ संकेत देती है। कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए 2019 से पहले विपक्षी दलों के बीच अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव आखिरी मौका हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में से कम से कम दो राज्यों में जीत ही 2019 के चुनाव में मोदी बनाम राहुल की लड़ाई बनाने की कांग्रेस की कोशिश को सिरे चढ़ा सकती है। राहुल गांधी का 2019 का रास्ता इन्हीं तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव से होकर गुजरेगा। यहां हार राहुल गांधी को विपक्षी नेताओं की कतार में पीछे धकेल देगी। 

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