वतन के लिए कुछ भी करने को ‘राजी’…

ओपिनियन पोस्ट
Tue, 03 Jul, 2018 16:03 PM IST

सत्यदेव त्रिपाठी

फिल्म ‘राजी’ 1971 की एक सच्ची घटना पर लिखे हरिन्दर सिक्का के उपन्यास ‘कालिंग सहमत’ पर आधारित है, जिसकी नायिका सहमत का यही नाम फिल्म में भी है। और इसी का पर्याय है फिल्म का नाम राजी। क्योंकि उसकी निर्देशक मेघना गुलजार का मानना है कि नायिका के नाम वाली फिल्म को लोग महिला विषयक समझ लेते हैं (दैनिक जागरण-11 मई, 2018) और इससे दर्शकता पर असर पड़ता है। लेकिन ‘सुजाता’ से लेकर ‘दामिनी’ तक के प्रमाण से सिद्ध होता है कि एक स्त्री की यह धारणा रूढ़िवादी भी है। और सिनेजगत में ऐसी अजीब रूढ़ियों के प्रचलन बहुतायत में हैं, क्योंकि फिल्म की लागत और अपनी शोहरत को लेकर यह कहीं काफी डरा हुआ समाज है। यह बात अलग है कि फिल्म के नाम के रूप में सहमत से कहीं बेहतर है- ‘राजी’- वतन के लिए कुछ भी करने को राजी- अपने प्रेम के साथ।
परंतु नाम की इस मामूली-सी रूढ़ि वाली ‘राजी’ की मेघना इधर वर्षों से पूर्वग्रही हिन्दुओं की इस रूढ़ि को बड़ी शिद्दत से तोड़ती है कि यहां और खासकर कश्मीर के मुसलमानों की जेहन में पाकिस्तानपरस्ती बसी होती है। भारत के प्रति उनकी वफादारी में कहीं खोट होता है। वरना कश्मीर के हिदायत खान की बेटी सहमत (आलिया भट्ट) हिन्दुस्तान के लिए अपनी जान जोखम में डालकर अपनी अस्मत के साथ दगाबाजी क्यों करती? और फिल्म यह भी खास तौर पर बताती है कि यह जज्बा हमारे देश में विरासत से मिलता है। बकौल हिदायत उन्हें अपने अब्बू से मिला है कि वे व्यापार के बहाने पाकिस्तान जाकर हिन्दुस्तान के लिए जासूसी करते हैं। इसी सिलसिले में वहां के ब्रिगेडियर को उनके माफिक कुछ हल्के-फुल्के राज बताकर उसका विश्वास हासिल करते हैं और उनकी बातों से 1971 के बंगलादेश में भारत के खिलाफ चल रही किसी खतरनाक साजिश को सूंघ लेते हैं। चूंकि वे लंग कैंसर के चलते चन्द महीनों के मेहमान हैं, अत: इस साजिश को फाश करने और भारत को आसन्न संकट से बचाने के काम की विरासत अपनी बीस वर्षीया एकमात्र बेटी को सौंपते हैं और इस सौंपने के दो आयाम फिल्म की भूमिका के रूप में बहुत पुख़्ता हैं- व्यावहारिक भी तथा फिल्म की प्रामाणिकता की जान भी। एक यह कि अपने विश्वास में आये ब्रिगेडियर के छोटे बेटे से अपनी बेटी की निकाह मुकर्रर करना, ताकि पाकिस्तानी फौज के गर्भ में रहकर सूचनाएं पायी जा सकें और दूसरा यह कि भारतीय खुफिया केंद्र के (शायद मुखिया) अपने मित्र खालिद मीर से बेटी को जरूरी और पक्का प्रशिक्षण दिलाना, ताकि वह पूरे काम को अंजाम देकर देश को गम्भीर संकट से बचा सके और अपनी खान्दानी विरासत में चार चांद लगा सके। कहने की जरूरत नहीं कि ‘जासूस बहू’ (यही नाम होता यदि फिल्म कमाऊ होती) बनी यह बिटिया इस काम को सही अंजाम तक पहुंचाती है, वरना फिल्म बनती ही नहीं। सो, यही है फिल्म और क्या खूब है! यहां तक के हीरो तो थियेटर के चहेते और श्याम बेनेगल के लाडले रजितकपूर हैं- सहमत के पिता की भूमिका में। बिना कुछ किये भी असली मां सोनी राजदान का फिल्म में भी मां होना बड़ा खुशगवार लगता है। छोटी ही सही, नियमित भूमिका में अंत तक रहे शिशिर शर्मा भी थियेटर वाले ही हैं। सत्यदेव दुबे की शिष्य-परम्परा को उसी कला के भिन्न माध्यम में निखार रहे हैं। प्रशिक्षक व खुफिया केंद्र वाले खालिद मीर बने जयदीप अहलावत पहली बार नजर में आये हैं, पर मजबूत कद-काठी के साथ क्या ही आवाज व अन्दाज लेकर आये हैं!
‘राजी’ में तलवार के अनुभवों की सीख-समृद्धि के साथ उतरी हैं मेघना। उसके बरक्स इसमें एक तरफ तो 1971 के घटित अब याद नहीं। फिर यह घटना भी अनाम है। दूसरे स्तर पर उपन्यास में निबद्ध होने की प्रामाणिकता की थाह न ली जा सकी। लेकिन कला की जो कुदरत और सम्प्रेषण की जो फितरत होती है, उसके अनुसार निश्चित ही कुछ कल्पना उपन्यासकार ने की ही होगी और कुछ फिल्मकार ने भी। फिर फिल्म में बार-बार संयोग (कोइंसीडेंस) और प्रत्युत्पन्न मति (प्रेजेंस आॅफ माइंड) का सहारा लिया गया है। एक उदाहरण- फाइल अन्दर ले जाकर सहमत ‘टप-टप’ सन्देश भेज रही है, उधर फाइल खोजने की हलचल मची है… फिर भी सन्देश पूरा होता है… वह निकलती है और अचानक ससुर सामने पड़ जाते हैं… ये सब संयोग हैं। फिर अचानक उपजी बुद्धि का प्रयोग- ‘पापा यही फाइल ढूंढ रहे थे?’ कहके फाइल सामने कर देना। फिर पापा का बहू पर अखण्ड विश्वास कि फाइल झटके से लेकर चल देते हैं और पापा का ब्रिगेडियर भी कुछ नहीं सोचता कि अन्दर के कमरे में फाइल गयी कैसे और क्यों! हां, ऐसे सब स्थलों पर घोर नाटकीयता व गजब का दिल धड़काता कुतूहल बनता है।
इसी तरह एक बहू उस दबंग अफसर के घर में इतने तार बिछा ले और सुरक्षादल को भनक न लगे, भरे-पूरे घर में नयी-नवेली बहू इतना कुछ कर पाये और इस किये पर किसी की नजर न पडे… सब कुछ के खुल जाने, वहां भेस बदलकर आसपास मौजूद सारे मददगारों के पकड़ लिये जाने, बेहद कड़ी सुरक्षा लग जाने… आदि के बावजूद ‘एकदम अकेली पड़ गयी है सहमत’ कहते हुए खालिद मीर साहेब का जाके उसे निकाल लाना- आदि पर हमें उसी तरह यकीन करना पड़ेगा, जैसे द्रौपदी की साड़ी खींचे जाते समय बेहद शक्तिशाली अर्जुन-भीम के साथ ही पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य-कृपाचार्य आदि के चुप रह जाने पर विश्वास करते हैं, वरना महाभारत का क्या होता! यानी कि बीच में सहमत पकड़ ली जाती, तो ‘राजी’ का क्या होता! क्या देशभक्ति का राजीपन इकहरा न हो जाता? जिन्दा निकाल न पाते, तो सहमत का क्या होता? मारी जाती। भले मारी जाती, फिल्म तो यथार्थ की कसक बनकर पाठकों के मन में चिर काल तक कचोटती रहती। लेकिन नहीं। तब वह अपने संकट की भयावहता (क्राइसिस) को बता न पाती। ‘राजी’ यह कहने के लिए भी बनायी गयी है कि ‘सहमत ने जो किया, अपने देश के लिए किया, वही तो ब्रिगेडियर-परिवार भी कर रहा था अपने देश के लिए। तो देश के लिए कुछ भी करना गुनाह नहीं- की बात सामने आती है। और पति इकबाल सय्यद बने विक्की कौशल के जरिये आती है। यह जुनूं, यह आदर्श अपने आप में हर देश-काल में इतना बड़ा रहा है कि इसके आगे सब कुछ तिनका जितना भी महत्त्व नहीं रखता। इस विषय की सबसे मशहूर हुई फिल्म ‘आंखें’ में देशभक्त नाजिर हुसैन अपने जवान बेटे की गद्दारी के खुलते ही उसे गोली मार देते हैं और ‘अरे यह क्या किया’ पूछने पर फख्र से जवाब देते हैं- अभी एक गोली मैं और चला सकता हूं।
‘राजी’ के देशप्रेम की वेदी पर सहमत भी अपना राज बनाये रखने के लिए अपने घर के बेहद वफादार नौकर बने आरिफ जकारिया को मार डालती है। ना के बराबर स्ंवाद में भी भूमिका की भास्वरता और अपने अन्दाज में आरिफ छा गये हैं फिल्म में। यही घटना फिल्म का ‘टर्निंग प्वाइंट’ भी है। आरिफ कें राज को जानने के करीब पहुंचते अपने जेठ को खत्म कर देती है। पटकथा-योजना का दिलचस्प पहलू यह कि प्रशिक्षण के दौरान जो जो सिखाया गया, कार्य को अंजाम देते हुए सब कुछ को या उसी-उसी को वैसी ही शिद्दत से चस्पा करने की संगति भी फिल्म की एक उल्लेख्य कला है। इस जोड़ के चलते बबार्दी मिनटों की भी नहीं है। लेकिन प्रशिक्षण में सिखाया गया था- सिखाये से परे जाना भी, जिसका नमूना किसी की खड़ी जीप से नौकर को कुचलने में गूंथा गया है। यह सब चूर से चूर मिलाने की कला का सुन्दर मानक है।
फिल्म की सबसे अहम बात प्रेम और देश-प्रेम की संगति में निहित है। जयशंकर प्रसादजी के साहित्य (पुरस्कार व आकाशदीप जैसी कहानियां तथा चन्द्रगुप्त-स्कन्दगुप्त जैसे नाटक आदि) में इन दोनों का द्वन्द्व बहुत सरनाम रहा है- वह समय आजादी की लड़ाई का था।
राजी में द्वन्द्व नहीं, संगति है और यह समय देश को सांस्कृतिक गुलामी से बचाने का है। इस संगति को सहमत की शादी के बाद की पहली रात से ही उसके पति इकबाल सय्यद (विक्की कौशल) के सलूक में पिरोया गया है। इकबाल का किरदार इस नायिका प्रधान फिल्म में नायक का है। पहली रात वह सहमत से अलग सोकर उसे (और खुद को भी) मानसिक तैयारी का मौका देता है, जो प्रेम के गहन संवेदन-स्वरूप व आयोजित विवाह में प्रेम पनपाने की प्रखर आधुनिकता से लबरेज कदम है। फिर धीमी-धीमी तैयारी के बाद जो मिलन होता है, उसके पारावर को दिखाने के लिए खींचे गये सघन दृश्य वाचाल हुए बिना व्यंजक व उत्तेजक हो सके हैं। इसी का वाजिब असर है कि सहमत ने यद्यपि इकबाल के पूरे देश व घर को बर्बाद कर दिया है, फिर भी वही उसकी देशभक्ति को सदर्थता है। उसके समझदारी भरे प्रेम का चरमोत्कर्ष उस क्षण आता है, जब तार वाले कमरे में पुलिस की जांच के दौरान सहमत के कनफूल (ईयरिंग) का दाना उसे मिल जाता है। वह पुलिस को नहीं देता, क्योंकि वही सबसे बड़ा प्रमाण है सहमत के तार लगाने का। इन सब रूपों में ‘मसान’ के बाद विक्की कौशल का होना बहुत भाता है। प्रेम व देशप्रेम का जलजला ठीक इसके बाद दोनों की समक्षता होते ही सहमत द्वारा इकबाल पर रिवॉल्वर तान देने में उठता है। हम प्रसादजी के पाठक जानते हैं कि मारेगी नहीं, क्योंकि ‘आकाशदीप’ की चम्पा को चाकू ताने देख एवं वह संवाद सुन चुके हैं- दस्यु, तुम मेरे पिता के हत्यारे हो, मैं तुम्हारी जान ले लूंगी…; परंतु हाय… क्या करूं, मैं तुमसे प्यार करती हूं’ और चाकू नदी में फेंक देती है।
यह प्यार की गांठ सहमत की तरफ से तब खुलती है, जब वह इकबाल के प्रेम की निशानी उसके बच्चे को जन्म देने का निर्णय लेती है। सहमत को न पकड़े देने के विधान की सर्वोपरि सार्थकता यही है। साथ ही वह बहूत्त्व (दुलारी बहू का दाय) भी बखूबी निभता है, जो उस घर के प्यार-दुलार, आस-विश्वास के बीच पनपा था, लेकिन राष्ट्र के फर्ज व पिता के कौल से बंधा था। इन संगतियों के चलते फिल्म में कोई खलनायक नहीं रह जाता, जो विषय के माकूल ‘राजी’ का काबिलेगौर इजाफा है।
इतनी सारी बज्र से भी कठोर व फूल से भी कोमल, जानलेवा व जान फूंक देने वाली स्थितियों एवं दारुण-मसृण भावों की ‘तरवारि की धार’ पर चलते हुए पूरी फिल्म को अपने कन्धे-कन्धे मंजिल तक बखूबी पहुंचाने वाली कमसिन-अल्हड़, पर बेहद समर्थ आलिया भट्ट को लाल सलाम- ‘तेरी नाजुकी से जाना, तेरे तीरे नींमकश को’! 

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