जैन मुनि तरुण सागर का निधन

ओपिनियन पोस्ट
Sat, 01 Sep, 2018 18:35 PM IST

ओपिनियन पोस्ट।

जैन मुनि तरुण सागर महाराज का 51 साल की उम्र में आज सुबह दिल्ली में निधन हो गया। वह कई दिनों से बीमार थे। बताते हैं कि उन्होंने इलाज कराने से मना कर दिया था। उनका अंतिम संस्कार शनिवार दोपहर उत्तर प्रदेश के मुरादनगर सैंथली गांव के तरुण सागर धाम में किया गया। इस निर्माणाधीन तीर्थ स्थल में ही महाराज का समाधि स्थल बनेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर लिखा कि उनके आदर्शों और समाज में उनके योगदान के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। गृहमंत्री राजनाथ सिंह और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी जैन मुनि के निधन पर संवेदना व्यक्त की है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी जैन मुनि के निधन पर कहा कि वो इससे स्तब्ध हैं।

खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने लिखा, ‘मुनी श्री तरुण सागर जी के निधन के बारे में जानकर दुख हुआ। वो एक प्रेरणादायक आध्यात्मिक नेता थे। सुरेश प्रभु ने ट्विटर पर लिखा, वह केवल 51 वर्ष के थे। उनका छोटा जीवन हमेशा समाज में अपने समृद्ध योगदान के लिए याद किया जाएगा।

बताया जा रहा है कि उन्होंने इलाज कराने से मना किया और कृष्णा नगर (दिल्ली) स्थित राधापुरी जैन मंदिर चातुर्मास स्थल पर जाने का निर्णय किया। तरुण सागर ने अपने गुरु पुष्पदंत सागर की स्वीकृति के बाद संलेखना (आहार-जल न लेना) कर रहे थे।

क्या होता है संलेखना

संलेखना को संथारा या समाधि भी कहते हैं। जैन धर्म के मुताबिक, मृत्यु को समीप देखकर धीरे-धीरे खानपान त्याग देने को संथारा या संलेखना (मृत्यु तक उपवास) कहा जाता है। इसे जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है। सल्लेखना दो शब्दों से मिलकर बना है सत्+लेखना। यह श्रावक और मुनि दोनों के लिए है।

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बता दें कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संथारा लेने के बाद संलेखना लेने वाले मुनि धीरे-धीरे अन्न आदि का त्याग कर देते हैं। कई लोग मृत्यु से कई दिन पहले संथारा ले लेते हैं, जिसमें वे धीरे-धीरे चीजों का त्याग करते हैं, जैसे चावल, आटा आदि। मृत्यु के बाद उन्हें हिंदू रिवाजों की तरह अंतिम स्थल तक लेटाकर ले जाने के बजाय बैठाकर ले जाया जाता है। उसके बाद अंतिम संस्कार किया जाता है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 2015 में इसे आत्महत्या जैसा बताते हुए उसे भारतीय दंड संहिता 306 और 309 के तहत दंडनीय बताया था। दिगंबर जैन परिषद ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी।

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