be a minority is dangerous in pakistan

पिछले दिनों पाकिस्तान के सिंध प्रांत से दो वीडियो वायरल हुए. पहले वीडियो में अधेड़ उम्र का एक शख्स छाती पीट-पीट कर पछाड़ें खा रहा था. वह पाकिस्तान का एक गरीब हिंदू था. जिस दिन पूरी दुनिया होली मना रही थी, उसकी दो नाबालिग बेटियों रीना (12) एवं रवीना (14) को कथित तौर पर उनके घर से अगवा कर लिया गया. बाद में जबरन धर्म परिवर्तन के बाद उनकी शादी करा दी गई. दूसरे वीडियो में एक मौलवी दोनों लड़कियों का निकाह पढ़ाते दिख रहा है. पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखने वाली लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन का यह पहला वाकया नहीं है. एक अध्ययन के मुताबिक, पाकिस्तान में हर साल अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखने वाली तकरीबन 1,000 लड़कियों को अगवा कर उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया जाता है और फिर उनकी शादी करा दी जाती है. रीना-रवीना जैसी कुछ ही वारदातें मीडिया की नजरों में आती हैं या उन पर चर्चा होती है.

आम तौर पर यह माना जाता था कि पाकिस्तान का सिंध प्रांत सूफी परंपरा के प्रभाव में रहा है, इसलिए यहां उतनी धार्मिक कट्टरता नहीं है, जितनी देश के अन्य प्रांतों में है. शायद यही वजह है कि यहां देश के दूसरे प्रांतों के विपरीत हिंदुओं की एक बड़ी आबादी रहती है अथवा यूं कहा जाए, तो गलत नहीं होगा कि पाकिस्तानी हिंदुओं की लगभग पूरी आबादी इसी प्रांत में बसती है. लेकिन, पिछले कुछ सालों से इस प्रांत में भी धार्मिक कट्टरता ने सिर उठाना शुरू कर दिया है, जिसके शिकार अल्पसंख्यक, खास तौर पर हिंदू हो रहे हैं. उन्हें प्रताडि़त करने का एक आम तरीका नाबालिग लड़कियों को अगवा कर जबरन उनकी शादी करा देना बन गया है. इस वजह से हिंदू अल्पसंख्यक देश छोड़ रहे हैं. पिछले कुछ सालों में कई पाकिस्तानी हिंदू परिवार भारत पलायन करने पर मजबूर हुए हैं.

गौरतलब है कि बीते 21 मार्च को रीना एवं रवीना को घोटकी जिला स्थित उनके घर से कुछ रसूखदारों ने अगवा कर लिया था. परिवार वालों का कहना था कि अपहर्ताओं के साथ लड़कियों के पिता की कुछ कहासुनी हो गई थी, जिसका बदला लेने के लिए होली के दिन हथियार दिखाकर वे लड़कियों को घर से उठा ले गए. परिवार वालों को वारदात की एफआईआर दर्ज कराने के लिए भी काफी मशक्कत करनी पड़ी. स्थानीय हिंदू समुदाय को धरना-प्रदर्शन करना पड़ा, तब कहीं जाकर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की. लेकिन, पुलिस उस समय तक हरकत में नहीं आई, जब तक उन लड़कियों के अगवा होने की खबर सोशल मीडिया में वायरल नहीं हो गई और पाकिस्तानी हिंदुओं एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू नहीं कर दिया. पुलिस-प्रशासन की निष्क्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक तो उसने अपहर्ताओं को सिंध से निकल जाने का मौका दिया और दूसरे एक अन्य वीडियो का हवाला देकर यह दलील भी दी कि लड़कियां अपनी मर्जी से घर से भागी हैं. फिलहाल जांच का दायरा भी इसी ‘अपनी मर्जी’ के इर्द-गिर्द घूम रहा है. जबकि एफआईआर में साफ तौर पर लिखा है कि लड़कियां नाबालिग हैं.

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पाकिस्तान में अगर कोई मामला धर्म से जुड़ा हो, तो केवल एफआईआर दर्ज करा देने मात्र से कार्रवाई हो जाएगी, इसकी कोई उम्मीद नहीं कर सकता. लिहाजा, पाकिस्तान के हिंदू संगठनों एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने बड़े-बड़े जुलूस निकाल कर दोषियों को सजा दिलाने और जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून पारित करने की मांग की. साथ ही प्रधानमंत्री इमरान खान को भी याद दिलाया कि उन्होंने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों से जो वादा किया था, उसे वह निभाएं. बात यहीं नहीं रुकी, भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा. उन्होंने ट्वीट कर जानकारी दी कि पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायुक्त से पूरे मामले पर रिपोर्ट मांगी गई है. जाहिर है, पाकिस्तान भारतीय विदेश मंत्री के बयान को खामोशी से कैसे बर्दाश्त कर सकता था. पाकिस्तान के सूचना मंत्री फव्वाद चौधरी ने इसे पाकिस्तान का अंदरूनी मामला करार देते हुए भारत से अपने अल्पसंख्यकों की सुध लेने की सलाह दी. पाकिस्तान की ओर से बताया गया कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने मामले की जांच और दोनों लड़कियों को जल्द से जल्द मुक्त कराने का आदेश दिया है. उसके बाद पुलिस हरकत में आई, मामले पर कार्रवाई हुई और कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं.

इस पूरे प्रकरण में उस समय एक नया मोड़ आया, जब इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने मामले की जांच एक पांच सदस्यीय आयोग को सौंप दी. दरअसल, दोनों अपहृत लड़कियों एवं उनके कथित पतियों ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर अपने लिए सुरक्षा की मांग की. लड़कियों ने अदालत को बताया कि उन्होंने अपनी मर्जी से इस्लाम अपनाया और शादी की. लड़कियों के परिवार वालों ने भी हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उनकी असल उम्र निर्धारित करने के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग की है. यहां यह जान लेना दिलचस्पी से खाली नहीं होगा कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में एक कानून मौजूद है, जिसके तहत बाल विवाह अपराध है. उस कानून के तहत 18 साल से कम आयु के लडक़ों-लड़कियों को नाबालिग करार दिया गया है. साथ ही पाकिस्तानी संसद द्वारा पारित हिंदू विवाह अधिनियम 2017 और सिंध हिंदू विवाह अधिनियम 2016 में भी शादी की आयु सीमा 18 साल रखी गई है. ऐसे में, अगर मान भी लिया जाए कि उन लड़कियों ने अपनी मर्जी से शादी की है, तो पाकिस्तान और सिंध के कानून के मुताबिक, वह शादी गैर कानूनी है. अगर शादी गैर कानूनी है, तो लड़कियों को उनके परिवार वालों को क्यों नहीं सौंप दिया जाता? यह बड़ा सवाल है.

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अल्पसंख्यकों और आवाज उठाने वालों पर हमले

अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन के अलावा भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हमले के कई अन्य तरीके हैं, जिनमें से एक है ईशनिंदा कानून. ईसाई महिला आसिया बीबी का मामला पिछले कई सालों से पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बना हुआ है. पिछले दिनों पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने नौ सालों से सजा-ए-मौत के साये में जी रहीं आसिया बीबी को ईशनिंदा के आरोपों से बरी करते हुए 2011 के लाहौर हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया. आसिया बीबी को पाकिस्तान पीनल कोड की धारा 295-सी के तहत सजा-ए-मौत दी गई थी. उन पर इल्जाम था कि उन्होंने 2009 में एक मुस्लिम औरत के साथ हुए विवाद के दौरान मोहम्मद साहब के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी. अब यह कोई भी समझ सकता है कि उनका उक्त औरत से एक आम सा झगड़ा हुआ होगा, जिसमें ईशनिंदा कानून का सहारा लेकर उन्हें फंसा दिया गया. फिर यह मसला इतना पेचीदा हो गया कि आसिया बीबी का बचाव और ईशनिंदा कानून समाप्त करने की वकालत करने वाले दो हाई प्रोफाइल लोगों, शहबाज भट्टी एवं सलमान तासीर को मौत के घाट उतार दिया गया. शहबाज भट्टी तत्कालीन पीपीपी सरकार में मंत्री थे, लेकिन उनकी सुरक्षा इतनी लचर थी कि हमलावर उन्हें गोलियों से भूनकर आराम से भाग निकले थे. सलमान तासीर पंजाब के गवर्नर थे. उन्हें आसिया बीबी के बचाव और ईशनिंदा कानून में संशोधन की आवाज उठाने के जुर्म में उन्हीं के अंगरक्षक ने गोली मार दी थी. हालांकि, सलमान के कातिल को मौत की सजा दे दी गई थी, लेकिन उसके बचाव में वकील ने जो दलीलें दी थीं, वे पाकिस्तानी समाज और राजनीति की असल कहानी बयान करती हैं. सलमान के कातिल के बचाव में कहा गया कि वह सुअर का मांस खाते थे, शराब पीते थे, लिहाजा उन्हें कत्ल किया जा सकता था. बहरहाल, आरोप से बरी होने के इतने महीने बाद भी आसिया बीबी पाकिस्तान में सुरक्षित नहीं हैं और बहुत मुमकिन है कि उन्हें एवं उनके परिवार को पाकिस्तान छोडऩा पड़े. जिस जज ने उनका फैसला सुनाया, उन्हें भी धमकियां मिल रही हैं. कहने का मतलब यह कि पाकिस्तान में न केवल अल्पसंख्यक, बल्कि उनके लिए आवाज उठाने वाले भी सुरक्षित नहीं हैं.

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पाकिस्तान का दावा है कि वह एक लोकतांत्रिक देश है. किसी भी देश के लोकतंत्र की मजबूती का अंदाजा वहां के अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यवहार से भी लगाया जाता है. यह एक घिसा-पिटा, लेकिन सटीक वाक्य है. पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था, पाकिस्तान एक धर्मनिरपेक्ष देश है और यहां हर किसी को अपने धर्म के पालन का अधिकार है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी अपने चुनाव अभियान के दौरान देश के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने और उन्हें बराबरी का अधिकार दिलाने का वादा किया था. अगर इमरान खान वाकई अल्पसंख्यकों को बराबरी का अधिकार दिलाना चाहते हैं, तो उन्हें वह कानून पारित कराना चाहिए, जिसमें 18 साल से कम आयु के व्यक्ति द्वारा धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने का प्रावधान है. लेकिन, पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार से ऐसी अपेक्षा करना अतिशयोक्ति होगी, क्योंकि कहने को तो पाकिस्तान लोकतांत्रिक है, लेकिन वहां लोकतंत्र आजादी के 70 सालों बाद भी घुटनों के बल चल रहा है. यह बात सर्वविदित है कि वहां फैसले जनता द्वारा चुनी हुई सरकार नहीं, बल्कि सेना लेती है. बावजूद इसके, पाकिस्तान से यह अपेक्षा जरूर की जानी चाहिए कि वह अपने नागरिकों, खास तौर पर कमजोर वर्गों एवं अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी तरह का भेदभाव न होने दे. यह अपेक्षा इसलिए भी की जा सकती है, क्योंकि वह इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संधियों से बंधा हुआ है.