चिकोटी : बसंती को बनवा दो पीएम!

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मेरे दिमाग में तो विकास की कई योजनाएं हैं. वैसे आप क्या चाहते हैं, आदेश करें, मैं तो आपका सेवक हूं. मतदाता की तल्खी के बावजूद उम्मीदवार की विनम्रता बरकरार थी. अगर आपकी पार्टी को बहुमत मिल गया, तो प्रधानमंत्री किसे बनाओगे? भइया लाल ने नया सवाल दागा.

वीट संडे की सुपर स्वीट दोपहर. भइया लाल अपने बरामदे में आराम कुर्सी पर चिंतन की मुद्रा में बैठे थे. तभी अचानक गली में शोर उठा, गोरख अपना भाई है, इसी का ‘टेम्पो’ हाई है. भइया लाल कुछ समझ पाते, उससे पहले ही सफेद कुर्ता-पायजामा पहने एक शख्स ने तकरीबन आधा दर्जन साथियों समेत घर में प्रवेश किया.

भइया लाल पहले तो अचकचाए, फिर बोले, फरमाइए…

आगंतुक ने पहले हाथ जोड़े, फिर मुस्कुराते हुए बताया कि उसका नाम गोरख नाथ है, वह अगड़म बगड़म पार्टी का कर्मठ कार्यकर्ता है और इस इलाके से पार्टी ने उसे लोकसभा का उम्मीदवार बनाया है.

तो आप यहां क्यों आए हैं? भइया लाल ने सवाल दागा.

आपका अमूल्य मत रूपी आशीर्वाद चाहिए. उम्मीदवार ने बड़ी ‘उम्मीद’ के साथ जवाब दिया.

उसका क्या करोगे? भइया लाल ने पलट सवाल ठोंका.

उसी अमूल्य आशीर्वाद के सहारे ही तो जीत हासिल कर मैं बहुमूल्य सडक़ें बनवाऊंगा, गली-खड़ंजे ठीक कराऊंगा, इलाके में मीठे पानी की व्यवस्था करूंगा, बिजली कटौती के खिलाफ संघर्ष करूंगा. उम्मीदवार ने विस्तार से अपने इरादे जाहिर किए.

लेकिन, भइया लाल को संतोष नहीं हुआ. बोले, और क्या-क्या करोगे?

मेरे दिमाग में तो विकास की कई योजनाएं हैं. वैसे आप क्या चाहते हैं, आदेश करें, मैं तो आपका सेवक हूं. मतदाता की तल्खी के बावजूद उम्मीदवार की विनम्रता बरकरार थी.

अगर आपकी पार्टी को बहुमत मिल गया, तो प्रधानमंत्री किसे बनाओगे? भइया लाल ने नया सवाल दागा.

उम्मीदवार सकते में आ गया, लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल कर बहुत सधा-सा जवाब दिया, उन्हें ही, जिन्हें पिछली बार बनाया था!

‘बसंती’ को प्रधानमंत्री बना सकते हो?भइया लाल ने उम्मीदवार को अपनी ख्वाहिश बताई.

श्रीमान् जी, यह भला कैसे संभव है? उम्मीदवार के स्वर में कुछ गिड़गिड़ाहट सी थी.

सब कुछ संभव है. विद्वानों का मानना है कि अगर ठान लिया जाए, तो कुछ भी असंभव नहीं है, भइया लाल ने तर्क पेश किया.

लेकिन मान्यवर, पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिए नाम पहले से ही तय कर रखा है. इसलिए किसी दूसरे नाम पर विचार का कोई सवाल नहीं उठता. उम्मीदवार कुछ-कुछ खीजने लगा था.

एक बार फिर सोच लो! मानो भइया लाल ने उम्मीदवार का पसीना निकालने की ठान ली थी.

सोचना क्या माई-बाप? आपकी मांग तो पार्टी लाइन से बिल्कुल मेल नहीं खाती. आप मुझे इस बिंदु पर क्षमा करें. उम्मीदवार हताश हो गया.

चलो कर दिया! अब तुरंत फूट लो यहां से, कहते हुए भइया लाल ने अपने घर के दरवाजे की ओर इशारा कर दिया.

उम्मीदवार के पास और कुछ बोलने की ताकत शेष न थी. उसे लगा कि यहां से चुपचाप निकल भागने में ही उसकी भलाई है. अगले ही पल वह तीर की तरह दरवाजे की ओर लपका और बगल वाले घर में घुस गया.

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