हिंद-प्रशांत क्षेत्र के निहितार्थ

बनवारी

अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां किस तेजी से बदल रही हैं, यह हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को लेकर हो रही रणनीतिक बहस से समझा जा सकता है। कुछ वर्ष पहले तक सारी बहस दक्षिण-चीन सागर में चीन द्वारा की जा रही नाकेबंदी पर सीमित थी। अभी भी दक्षिण-चीन सागर के द्वीपों के सैन्यीकरण को लेकर सबकी चिंता बनी हुई है। लेकिन इस समस्या से निपटने के लिए इस रणनीतिक बहस में अब हिन्द महासागर पर भी ध्यान केंद्रित हो रहा है। चीन को छोड़कर लगभग सभी विश्व शक्तियां भारत को इस क्षेत्र की एक संतुलनकारी नौसैनिक शक्ति के रूप में उभरते देखना चाहती हैं। इसलिए दक्षिण-चीन सागर पर होने वाली बहस अब हिन्द-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा में बदल गई है। भारत अपनी इस नई भूमिका को लेकर गंभीर हुआ है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सागर माला का विचार रखा था। अब भारत हिन्द महासागर में अपनी नौसैनिक उपस्थिति को बढ़ाने की कोशिश में लग गया है। बिना अपने आपको चीन की प्रतिद्वंद्वी शक्ति के रूप में चित्रित किए वह इस पूरे क्षेत्र में अपने आर्थिक और सामरिक हितों की रक्षा करने में लगा है। उसने भी चीन की तरह अपनी सीमाओं के बाहर बंदरगाह बनाने और अपनी उपस्थिति सुनिश्चित किए रहने की दिशा में प्रयत्न आरंभ किया है। सेशल्स द्वीप, अदन, ईरान और अब इंडोनेशिया में उसे इस दिशा में उल्लेखनीय सफलता मिली है। वह इस कोशिश में लगा है कि हिन्द महासागर क्षेत्र की रक्षा, निगरानी और गश्त लगाने से संबंधित साधन और क्षमता उसे प्राप्त हो।
इसका ताजा उदाहरण नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर की यात्रा है। इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे बड़ा देश है। उसका महत्व समझते हुए ही हमने इंडोनेशिया के राष्टÑपति को 1950 की गणतंत्र दिवस की परेड के समय विशेष अतिथि बनाकर आमंत्रित किया था। लेकिन सुकर्ण के समय की भारत-इंडोनेशिया मैत्री अधिक दिन नहीं रह पाई। पिछले काफी समय से भारत और इंडोनेशिया के संबंधों में दूरी बनी रही थी। इंडोनेशिया इस बीच राजनैतिक उतार-चढ़ाव का भी शिकार रहा। लेकिन 2014 में जोको विडोडो के सत्ता में आने के बाद भारत और इंडोनेशिया के संबंधों में फिर निकटता आई है। इंडोनेशिया का समुद्र हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर का मिलन बिंदु है। भारत के अंडमान निकोबार द्वीपों से उसके कुछ द्वीपों की काफी निकटता है। इंडोनेशिया के शासक चीन के प्रति सशंकित ही रहे हैं। अब जब इंडोनेशिया और चीन के बीच दक्षिण-चीन सागर के एक द्वीप को लेकर विवाद बढ़ा है, इंडोनेशिया ने भारत की ओर देखना शुरू किया है। नरेंद्र मोदी की इस यात्रा में उसने भारत से सैनिक और सामुद्रिक सहयोग बढ़ाने के लिए कई समझौते किए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सुमात्रा द्वीप पर साबांग बंदरगाह का निर्माण है। यह द्वीप मलाका खाड़ी के मुहाने पर है और इसके रास्ते इस क्षेत्र का सर्वाधिक सामुद्रिक व्यापार होता है। इंडोनेशिया इस बंदरगाह को आर्थिक ही नहीं, सामरिक आवश्यकताओं का भी ध्यान रखते हुए विकसित करना चाहता है। इस बंदरगाह का विकास भारतीय सहयोग से होगा और उसका विकास इस तरह होगा कि वहां पनडुब्बियां भी आ-जा सकें।
हिन्द महासागर संसार के सबसे व्यस्ततम सामुद्रिक मार्गों में से एक है। उसकी रक्षा और निगरानी के लिए हम केवल विदेशों से खरीदे गए जलपोतों पर निर्भर नहीं रह सकते थे। इसका हमें शुरू से अनुमान था। इसलिए 1960 में ही हमने पोत निर्माण की ओर ध्यान देना शुरू किया था। मझगांव की गोदी में पोतों का निर्माण शुरू हुआ था और उसमें हमें काफी सफलता भी मिली। कुछ समय पहले तक नौसेना के मामले में हम चीन से आगे थे। लेकिन पिछले दिनों चीन ने अपने आपको संसार की एक बड़ी नौसैनिक शक्ति बनाने का संकल्प लिया है। 2015 में उसने अपनी नौसैनिक शक्ति बढ़ाने, उसे अत्याधुनिक पोतों से लैस करने और उनका चीन के भीतर निर्माण करने का रणनीतिक फैसला लिया। चीन इस दिशा में काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। उसने रूस और अमेरिका आदि से खरीदे गए उन्नत हथियारों को खोलकर उनकी उन्नत प्रौद्योगिकी को समझने और आत्मसात करने में अपने आपको लगाए रखा है। वह विमान वाहक अत्याधुनिक पोतों को बनाने में सिद्घहस्त हो गया है। लड़ाकू विमानों के निर्माण में भी उसने काफी प्रगति की है। नाभिकीय क्षमता से संपन्न पनडुब्बियों के मामले में भी वह काफी आगे हैं। एक नौसैनिक शक्ति बनने की दिशा में संतोषजनक प्रगति करने के बाद ही उसने दक्षिण चीन सागर में अपनी गतिविधियां बढ़ानी आरंभ की थीं। उसका प्राथमिक उद्देश्य तो अपने आपको एक नौसैनिक शक्ति के रूप में स्वीकृति दिलवाना ही था। लेकिन उसके बाद उसने दक्षिण-चीन सागर पर अपना अधिकार जताना शुरू किया और यह आशंका हुई कि वह उसकी नाकेबंदी करके इस क्षेत्र से होने वाले व्यापार को नियंत्रित करना चाहता है।
दक्षिण-चीन सागर में चीन की बढ़ती हुई सामरिक उपस्थिति को लेकर सबसे पहले जापान और दक्षिण कोरिया चिंतित हुए। कोरिया युद्घ के बाद से इस क्षेत्र में अमेरिकी सेना की उपस्थिति रही है। अमेरिका ने इसे एक अंतरराष्टÑीय मुद्दा बनाना शुरू किया। दक्षिण-चीन सागर के अनेक द्वीपों को लेकर चीन के दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों से विवाद पैदा हुए। वियतनाम से उसका विवाद काफी बढ़ गया था। उसने वियतनाम द्वारा समुद्री क्षेत्र में तेल भंडार खोजने पर भी आपत्ति की। वियतनाम ने तत्संबंधी अधिकार भारत की कंपनियों को भी दिए थे। चीन ने इस पर भी गंभीर आपत्ति की। उसके फिलीपींस और इंडोनेशिया आदि से भी द्वीपों को लेकर विवाद हैं। इससे उन सभी देशों में चीन की शक्ति को संतुलित किए जाने की आकांक्षा पैदा हुई है। यह काम अमेरिका अकेले नहीं कर सकता, इस क्षेत्र की दूसरी बड़ी शक्ति भारत है। इसलिए दक्षिण-पूर्व एशिया के सभी देशों की भारत से अपेक्षाएं बढ़ी हैं। इस अनुकूल स्थिति का लाभ उठाते हुए भारत दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से अपना सामरिक सहयोग बढ़ा रहा है। वियतनाम, थाईलैंड और इंडोनेशिया आदि को वह अपने हथियारों के एक बड़े बाजार के रूप में भी देख रहा है। भारत जानता है कि बिना बाहरी बाजार के रक्षा उद्योग खड़ा करना कितना मुश्किल होता है। भारत ने पूर्व की ओर दृष्टि नीति के अंतर्गत इस क्षेत्र के सभी देशों से आर्थिक, सांस्कृतिक और सामरिक सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है। इस बार के गणतंत्र दिवस की परेड में तो भारत ने दक्षिण-पूर्व एशिया के सभी दस देशों के राष्टÑाध्यक्षों को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था।
इस क्षेत्र के देशों से सामरिक सहयोग बढ़ाने की दृष्टि से काफी पहले मालाबार नौसैनिक अभ्यास शुरू हुआ था। भारत के अलावा उसमें जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिकी नौसैना भाग लेती थी। बीच में चीन के दबाव में आॅस्ट्रेलिया ने अपने आपको इससे अलग कर लिया। अब आॅस्ट्रेलिया फिर इस अभ्यास में शामिल होना चाहता है। अमेरिका और जापान उसे शामिल किए जाने के पक्ष में हैं। लेकिन कम से कम इस वर्ष के लिए भारत आॅस्ट्रेलिया को मालाबार नौसैनिक अभ्यास में शामिल करने के लिए तैयार नहीं हुआ। इन चारों देशों को एक चतुर्भुज की संज्ञा दी जाती रही है। आॅस्ट्रेलिया भी इस चतुर्भुज में शामिल है ही, लेकिन भारत अभी यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसे चीन के खिलाफ किसी गोलबंदी के रूप में चित्रित न किया जाए। भारत दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों की प्रतिक्रिया को लेकर भी सजग है। आसियान देशों को यह नहीं लगना चाहिए कि भारत इस क्षेत्र में कोई समानांतर समूह खड़ा कर रहा है। चीन ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए अपने प्रचुर वित्तीय साधनों के बल पर ढांचागत क्षेत्र की अनेक परियोजनाएं हाथ में ली थीं। लेकिन उसकी परियोजनाओं के बारे में अब यह भावना बढ़ती जा रही है कि वे दूसरे देशों को कर्ज के जाल में फंसा देती हैं। नरेंद्र मोदी ने सिंगापुर यात्रा के दौरान शांगरी-ला व्याख्यान देते हुए इस ओर इशारा भी किया था। उसके तुरंत बाद अमेरिकी रक्षामंत्री जेम्स माटिस ने नरेंद्र मोदी की इस टिप्पणी की तारीफ की थी। जेम्स माटिस ने नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के उल्लेख की सराहना करते हुए यह भी कहा कि भारत इस क्षेत्र की अग्रणी शक्ति है।
एशिया प्रशांत क्षेत्र को हिन्द प्रशांत क्षेत्र के रूप में स्वीकृति दिलवाने में इधर अमेरिका की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन इसका उल्लेख सबसे पहले जनवरी-2007 में छपे गुरुप्रीत खुराना के एक लेख में हुआ था। यह लेख भारत और जापान के बीच रणनीतिक सहयोग की संभावनाओं के बारे में था। अगस्त 2007 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे भारत आए थे। उन्होंने भारतीय संसद को संबोधित किया था। अपने इस संबोधन में उन्होंने हिन्द-प्रशांत क्षेत्र का पहली बार उल्लेख किया था। उसके बाद यह संज्ञा अंतरराष्टÑीय रणनीतिक विमर्श में आ गई। 2011 से उसका अधिक उपयोग होने लगा। धीरे-धीरे अमेरिका के रक्षा विशेषज्ञों को उसका महत्व समझ में आया। 2017 में डोनाल्ड ट्रम्प से बात करने जब नरेंद्र मोदी अमेरिका गए थे तो बातचीत के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य में हिन्द-प्रशांत क्षेत्र का ही उपयोग हुआ था। उसके बाद से अमेरिका इसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की जगह स्वीकृति दिलवाने में लगा है। इस पूरे क्षेत्र को हिन्द-प्रशांत क्षेत्र बताने का अर्थ ही है भारत को क्षेत्र की बड़ी शक्ति के रूप में मान्यता देना और उस पर इस क्षेत्र की रक्षा की जिम्मेदारी डालना। अपने शांगरी-ला व्याख्यान में मोदी ने हिन्द-प्रशांत क्षेत्र की और भी व्यापक व्याख्या की थी। उन्होंने कहा कि इसका आशय अफ्रीका के पूर्वी तट से लगाकर अमेरिका के पश्चिमी तट तक फैले विशाल सामुद्रिक क्षेत्र से है। इस तरह यह भारत और चीन का ही मामला नहीं रहता, अमेरिका भी उसमें शामिल हो जाता है।
इस नए दायित्व का भारत को एहसास है। लेकिन उसके अनुरूप सामरिक क्षमता हासिल करने में अभी हमें कुछ समय लगेगा। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही देश का अपना रक्षा उद्योग खड़ा करने की ओर ध्यान दिया था। पहली बार अपने किसी प्रधानमंत्री ने यह अनुभव किया था कि जितना आर्थिक रूप से समर्थ होना आवश्यक है, उतना ही सामरिक रूप से समर्थ होना आवश्यक है। सामरिक रूप से समर्थ होने के लिए अपना रक्षा उद्योग विकसित करना होता है। आप विदेशों से खरीदे गए हथियारों के आधार पर अपनी रक्षा संबंधी तैयारी नहीं कर सकते। सामरिक सामर्थ्य केवल हथियार पाने से नहीं आ जाता, उन्हें निरंतर उन्नत करना होता है और अपनी रक्षा चुनौतियों को समझते हुए अपनी सैन्य सामग्री का विकास करना होता है। नरेंद्र मोदी की सरकार की इस कोशिश ने हमारे सैनिक और रणनीतिक प्रतिष्ठान में काफी आशा पैदा की थी। लेकिन पिछले चार वर्ष में इस दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हो पाई। पिछले सात दशकों में जो तमस और निष्क्रियता पैदा की गई है, उसे दूर करना काफी कठिन दिख रहा है। सैनिक और प्रशासनिक स्तर पर सहयोग की जगह इस कार्यक्रम में अब तक बाधाएं ही डाली जा रही हैं। हमारी सैनिक और असैनिक नौकरशाही को नकारात्मक होकर सोचने की आदत है और वह सामरिक क्षेत्र में कोई नया संकल्प पैदा होने नहीं दे रही। कुछ व्यावहारिक बाधाएं भी हैं। अब तक अमेरिका और रूस हमें अपने हथियार बेचने में तो उत्साह दिखाते रहे हैं, लेकिन उन्नत तकनीकी के बारे में विशेषकर अमेरिका हमारी बाधा बना रहा है। एक समय उसने हमें रूस से क्रायोजनिक इंजन नहीं लेने दिया था। हमारे वैज्ञानिकों ने कालांतर में उसका विकास कर लिया, पर समय तो लगा ही।
अपना रक्षा उद्योग खड़ा करने में किस तरह की कठिनाइयां आती हैं, इसका अनुमान हल्के लड़ाकू विमान देश के भीतर निर्मित करने की कोशिशों से लगाया जा सकता है। काफी कोशिश के बाद हमने स्थल से उड़ान भरने वाले हल्के लड़ाकू विमान तो बना लिए और उन्हें वायुसेना में शामिल भी कर लिया गया। लेकिन वे जिस अमेरिकी इंजन की डिजाइन पर आधारित हैं, उसकी क्षमता को लेकर सेना बहुत संतुष्ट नहीं है। इसलिए अपनी जरूरतों के हिसाब से कुछ हल्के लड़ाकू विमान विदेश से खरीदने का फैसला भी हुआ है। लेकिन नौसैनिक पोतों से उड़ान भरने वाले विमानों की डिजाइन में कुछ परिवर्तन करने होते हैं। उनके देश के भीतर उत्पादन की अभी स्थिति नहीं आ पाई है। इसी तरह कावेरी-टर्बो इंजन के विकास में हमें अभी अधिक सफलता नहीं मिल पाई। हमें अपनी कुछ अन्य परियोजनाओं को भी छोड़ देना पड़ा है। उन्नत हथियारों के मामले में निरंतर सीखते-समझते रहना पड़ता है और उन्नत तकनीकी सिद्ध करने में समय लगता है। हमने पिछले सात दशक गंवाकर देश के साथ बहुत अन्याय किया है। देर-सबेर हम यह क्षमता हासिल कर ही लेंगे। उसके लिए साधनों की आवश्यकता तो होती ही है, उससे अधिक आवश्यकता राष्टÑीय संकल्प की होती है। हमें अपने वैज्ञानिक प्रतिष्ठान में राष्टÑीय भावनाएं बढ़ाते हुए यह संकल्प पैदा करना होगा कि उन्हें देश को सामरिक दृष्टि से विश्व की अगली पंक्ति में खड़ा करना है। इसके लिए उन्हें जी-जान से जुट जाना होगा। अमेरिका रूस पर फिर से आर्थिक प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है। इससे फिर हमारी सामरिक तैयारियों में बाधा पड़ सकती है। अमेरिका को भारतीय चिंता बता दी गई है। प्रतिबंधों से भारत को अलग रखने की कोशिश भी हो रही है। लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों में अनिश्चितता रहती है। इसलिए भारत को अपनी तकनीकी क्षमता तेजी से बढ़ानी होगी। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र की स्वीकृति ने भारत को जो बड़ी भूमिका दी है, वह हमारे लिए चुनौती और अवसर दोनों है। 

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