चीन के दुराग्रह और दलाई लामा

बनवारी।

दलाई लामा की तवांग यात्रा को लेकर चीन ने जो उग्र प्रतिक्रिया की है, उसे समझ पाना मुश्किल है। दलाई लामा कोई पहली बार तवांग मठ नहीं गए थे। 1959 में जब उन्होंने तिब्बत से पलायन करके भारत में शरण ली थी, तो सबसे पहले वे तवांग मठ में ही रुके थे। उनके संबंध जिस बौद्ध संप्रदाय से हैं, उसका यह महत्वपूर्ण मठ है। उसे ल्हासा के पोटाला महल के बाद दूसरे बड़े मठ के रूप में जाना जाता है। 1959 के बाद अब तक दलाई लामा चार बार तवांग जा चुके थे। यह उनकी पांचवीं यात्रा थी। तवांग मठ भारत और चीन के बीच की मैकमहोन सीमा रेखा से 47 किलोमीटर दूर भारतीय सीमा में है। चीन इस सीमा को विवादास्पद मानता है। वह अरुणाचल प्रदेश के बड़े क्षेत्र पर अपना दावा जताता रहा है। लेकिन उसके दावा जताने भर से यह तथ्य विलीन नहीं हो जाता कि अरुणाचल प्रदेश भारतीय प्रदेश है और वहां एक चुनी हुई सरकार शासन कर रही है। भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर जो भी विवाद है, उस पर दोनों देश बातचीत कर रहे हैं। दलाई लामा की यात्रा इस बातचीत के स्वरूप पर किसी तरह का प्रभाव नहीं डालती।

दलाई लामा को लेकर चीन के मार्क्सवादी शासकों की अपनी समस्याएं हो सकती हैं। वे अब तक दलाई लामा के बारे में अप्रिय और अशिष्ट शब्दावली का उपयोग करते रहे हैं। दलाई लामा भारत में ही नहीं, संसार भर में एक प्रतिष्ठित धार्मिक नेता माने जाते हैं। चीन के उनसे राजनैतिक मतभेद हो सकते हैं। लेकिन इन मतभेदों के आधार पर वह भारत के राजनयिक शिष्टाचार को नियंत्रित नहीं कर सकता। भारत पिछले 58 वर्ष से दलाई लामा और उनके साथ आए तिब्बतियों को अपने यहां शरण दिए हुए है। भारत और तिब्बत के सदा गहरे संबंध रहे हैं। चीन ने तिब्बत पर आक्रमण करके जिस तरह दलाई लामा की सुरक्षा खतरे में डाल दी थी, यह भारत के नेताओं का कर्तव्य था कि उस संकट की घड़ी में दलाई लामा को आश्रय देते। भारत में उन्हें अपने धार्मिक कर्तव्यों का निर्वाह करने की पूरी छूट है। वे यहां से चीन के विरुद्ध किसी राजनैतिक आंदोलन का संचालन नहीं कर रहे। दलाई लामा को तिब्बत में ही नहीं, चीन के श्रद्धालु समाज में भी श्रद्धा से देखा जाता था। चीन में मार्क्सवादी शासन अनंतकाल तक नहीं रहने वाला। जब मार्क्सवादी शासन समाप्त होगा, तभी यह जाना जा सकेगा कि दलाई लामा के प्रति चीन के सामान्यत: बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले नागरिक कितनी श्रद्धा रखते हैं।

तिब्बत पर चीन का नियंत्रण अनैतिक ही नहीं, अव्यावहारिक भी है। चीन के लोग एक स्वतंत्र समाज और एक स्वतंत्र राष्ट्र हैं। उनका राजनैतिक और धार्मिक अतीत काफी गौरवशाली रहा है। ईस्वी 600 से 850 तक तिब्बत के लोगों ने एक बड़ा साम्राज्य खड़ा किया था। उसका विस्तार मध्य एशिया तक था। चीन के तांगवंशीय सम्राट तक को तिब्बती सेना के सामने पराजय झेलनी पड़ी थी। पंद्रह दिन बाद स्थिति बदल गई। लेकिन एक तांगवंशीय सम्राट ने तिब्बती सम्राट से अपनी भतीजी का विवाह किया था, यह बात उस समय तिब्बती शासकों के प्रभाव का आकलन करने के लिए काफी है। वह साम्राज्य किसी आक्रमण के कारण नहीं, आंतरिक विवाद के कारण बिखर गया था। तेरहवीं शताब्दी में तिब्बत पर मंगोल शासकों का अधिकार हो गया। लेकिन उन्हीं मंगोलों ने तब चीन को भी अपने नियंत्रण में ले लिया था। चीन पर मंगोलों का 90 वर्ष तक शासन रहा था। मंगोलों के शासन में चीनियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। लेकिन मंगोलों ने तिब्बती धर्मगुरु को अपना धर्म गुरु स्वीकार किया था और दलाई लामा शब्द उन्हीं की देन है। मंगोलों ने तिब्बत को चीन का अंग नहीं बनाया था, एक अलग प्रशासनिक क्षेत्र रखा था। लेकिन मंगोलों के धार्मिक गुरु होने के नाते दलाई लामा उस समय के चीन के भी धार्मिक गुरु माने जाते थे।

बाद में जब मांचुओं ने चीन को विजित किया तो उन्हें अपने राज्य का तिब्बत तक विस्तार करने में सफलता मिल गई। तिब्बत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उस पर सीधे नियंत्रण नहीं रखा जा सकता था। तिब्बत की जलवायु कठिन है और कृषि अल्प है। इस सबके कारण तिब्बत को मांचुओं की अधीनता के बावजूद अपने आंतरिक शासन में स्वायत्तता मिली रही। 1912 में जब चीन में राष्ट्रीय आंदोलन छिड़ा और चीनी मांचू अधीनता से मुक्त हुए तो तिब्बतियों ने भी अपनी स्वतंत्रता का घोष कर दिया। बिना किसी खून-खराबे के मांचू शासन के प्रतिनिधियों को सुरक्षा प्रदान करके वापस भेज दिया गया। लेकिन चीन के नए शासकों ने तिब्बत की इस स्वतंत्रता को औपचारिक मान्यता नहीं दी। वह समय चीन के लिए भी काफी संकट का समय था। जल्दी ही चीन मार्क्सवादियों और राष्ट्रवादियों के बीच के आंतरिक संघर्ष में फंस गया। लंबे खून-खराबे के बाद 1949 में चीन पर मार्क्सवादियों का नियंत्रण हो गया। मार्क्सवादियों ने चीन की परंपरागत सीमाओं का विस्तार करना आरंभ किया। मार्क्सवादी शासकों ने कुछ इलाके सोवियत रूस के लिए छोड़कर मंचूरिया और मंगोलिया के एक बड़े भाग पर कब्जा जमा लिया। 1951 में उसने पश्चिमवर्ती तिब्बत पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया।

दूसरे महायुद्ध में चीन मित्र राष्ट्रों के साथ था। इसलिए मंचूरिया, मंगोलिया और तिब्बत पर उसके नियंत्रण को यूरोपीय शक्तियों द्वारा अनदेखा कर दिया गया। जब चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया था तो भारत में उसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी। सरदार पटेल सहित कई बड़े नेता चाहते थे कि भारत चीन के इस अनैतिक व्यवहार की निंदा करे और तिब्बत पर चीन के नियंत्रण को मान्यता न दे। भारत और तिब्बत के प्राचीन और आत्मीय संबंध रहे हैं। तिब्बत के शासक अपना संबंध महायान की वज्रयान शाखा से जोड़ते हैं। बिहार का नालंदा विहार वज्रयानियों का गढ़ था। तिब्बत के बौद्ध लामाओं के शास्त्रीय प्रशिक्षण का वह केंद्र था। भारतीयों का कैलाश मानसरोवर जैसा महत्वपूर्ण तीर्थ तिब्बत में है। भारत के साधु-संन्यासियों और अन्य श्रद्धालुओं का अत्यंत प्राचीन काल से तीर्थयात्रा के लिए वहां तांता लगा रहा है। तिब्बत भारत के साधकों की महत्वपूर्ण तपोस्थली है। साधना में उच्च स्थिति को प्राप्त साधक जिस ज्ञान गंज की बात करते हैं, वह तिब्बत में ही है। इसलिए तिब्बत का नास्तिक और भौतिकवादी मार्क्सवादियों के नियंत्रण में जाना सभी भारतीयों के लिए चिंता पैदा करने वाला था। भारत सरकार पर इस बात के लिए काफी दबाव था कि वह तिब्बत पर चीन के आक्रमण का प्रतिकार करे।

उस समय भारत इस स्थिति में था कि वह चीन द्वारा तिब्बत हड़प लिए जाने की बाधा बन सकता था। लेकिन जवाहर लाल नेहरू एक कमजोर नेता थे और उन्हें चीन के बारे में काफी गलतफहमियां थीं। यूरोपीय शक्तियों द्वारा चीनी आक्रमण की अनदेखी भी नेहरू की निष्क्रियता में सहायक रही होगी। जवाहर लाल नेहरू चीन से मैत्री की ही दुहाई देते रहे। वे परंपरागत चीन और मार्क्सवादी चीन में अंतर करने में असमर्थ रहे। जवाहर लाल नेहरू की आंखें तभी खुलीं, जब दलाई लामा को शरण देने से उत्तेजित चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया। यह माना जाता है कि चीनी आक्रमण के इस आघात से वे उबर नहीं पाए। अंतत: 1964 में उनकी मृत्यु हो गई।

चीन 1962 से अब तक हमें चारों ओर से घेरने की कोशिश कर रहा है। भारत को दबाव में रखने के लिए उसने पाकिस्तान को नाभिकीय शक्ति बना दिया है। भारत के एक बड़े भाग पर उसका कब्जा है। अक्साई चिन उसके नियंत्रण में है। उसने हमारे क्षेत्र पर कब्जा करके अपने सिक्यांग और तिब्बत के बीच संपर्क मार्ग बना लिया है। गिलगित-बाल्तिस्तान होकर वह एक आर्थिक गलियारा बना रहा है और मध्य-पूर्व तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रहा है। वह भारत को न सुरक्षा परिषद का सदस्य होने देना चाहता है, न नाभिकीय आपूर्ति समूह का। वह पाकिस्तान से भारत के भीतर आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न जेहादियों का भी सरपरस्त बना हुआ है। यह सब शत्रुतापूर्ण कार्रवाई नहीं तो क्या है? उस पर वह भारत को धमका रहा है कि अगर दलाई लामा को अरुणाचल जाने दिया जाता है तो दोनों देशों के बीच संबंध बिगड़ जाएंगे। चीन की अब तक की भारत विरोधी कार्रवाइयों से संबंधों को जो क्षति पहुंच चुकी है, उससे अधिक क्षति क्या होगी?

चीन सीमा विवाद पर भारत से सौदेबाजी के संकेत देता रहा है कि अगर तवांग उसके हवाले कर दिया जाए तो वह अन्यत्र अपना दावा छोड़ देगा। इससे यह स्पष्ट है कि वह तिब्बत की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं है। अभी चीन अपने व्यापारिक तंत्र का विस्तार कर रहा है। चीन से बाहर वह अपनी सुरक्षा और व्यापार को दृष्टिगत रखकर भारी निवेश कर रहा है और एक विशाल तंत्र खड़ा करता जा रहा है। रूस से अपनी सुरक्षा के खतरे को देखते हुए उसने अपने रेल मार्ग का मध्य एशिया तक विस्तार करते हुए उसे यूरोपीय रेल तंत्र से जोड़ दिया है। तिब्बत में उसने इंजीनियरिंग का अद्भुत कौशल दिखाते हुए रेल लाइन बिछा दी है और वह उसे नेपाल तक तथा भारतीय सीमा तक विस्तृत करना चाहता है। तिब्बत में उसकी सैन्य उपस्थिति भी काफी बढ़ गई है। वह तिब्बत के भौतिक विकास में लगा है। वह तिब्बत की सुरक्षा को लेकर आशंकित रहता है और चाहता है कि भारत से मिलने वाली किसी भी चुनौती को निरस्त करने की स्थिति में आ जाए।

लेकिन चीन यह भी जानता है कि वह कितना भी बड़ा भौतिक तंत्र खड़ा कर ले, आम तिब्बतियों का विश्वास नहीं जीत सकता। समुद्र तट से 4,900 मीटर की ऊंचाई पर बसा तिब्बत संसार की छत माना जाता है और उसकी विषम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बाहर के लोगों का वहां बसना काफी कष्टकारी होता है। इसके अलावा तिब्बती गहरी धार्मिक निष्ठा वाले अंतर्मुखी लोग हैं। लंबे समय से दलाई लामा ही तिब्बतियों के धर्म गुरु के साथ-साथ शासक रहे हैं। कुछ समय पहले दलाई लामा ने अपना राजनैतिक दायित्व स्वेच्छा से छोड़ दिया था। इसका अर्थ यह हुआ कि आम तिब्बती उनका धार्मिक अनुयायी होने के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से एक राष्ट्र के रूप में अपने आपको देखेगा। इससे चीन का उनकी पहचान को चीनी पहचान में विलीन करना और कठिन हो जाएगा। चीन दलाई लामा का निंदात्मक रूप से उल्लेख करते हुए यह मान लेता है कि इससे वह तिब्बतियों को डरा सकेगा और उन्हें चीन की हान पहचान में विलीन होने के लिए विवश कर सकेगा। लेकिन उसकी इन कोशिशों का अब तक उल्टा ही प्रभाव होता रहा है और तिब्बतियों की युवा पीढ़ी अपनी स्वतंत्रता के लिए और भी कृतसंकल्प दिखाई दे रही है। चीन के नियंत्रण का जितना विरोध आज भी तिब्बती कर रहे हैं, उतना कोई और नहीं कर रहा।

आज चीन विस्तारवाद के रास्ते पर है और वह इस ऐतिहासिक सीख को भूल रहा है कि हर शक्ति तंत्र अतिविस्तार के कारण आंतरिक रूप से असंतुलित हो जाता है और फिर उसे अपने पैर पीछे लौटाने पड़ते हैं। चीन अपनी सीमाओं से बाहर पैर फैलाते हुए अभी बढ़ती हुई शक्ति के नशे में है। उसे यह समझ में नहीं आ रहा कि जिस तरह सोवियत रूस को मध्य एशियाई देशों से अपने पैर पीछे खींचने पड़े थे उसी तरह चीन को भी जबरन हथियाए गए नए क्षेत्रों से अपने पैर पीछे खींचने पड़ेंगे। चीन के अभी के शासक तिब्बतियों का विरोध और विद्रोह दबाने के लिए जिस बर्बरतापूर्वक व्यवहार कर रहे हैं, उससे आम तिब्बतियों में चीन के प्रति स्थायी घृणा का भाव पनप रहा है और इसका नुकसान भविष्य की चीनी सत्ताओं को होगा। तिब्बती आज संख्या में अधिक नहीं रह गए हैं। लेकिन अगर तिब्बत का भौतिक विकास होता है तो तिब्बतियों की जनसंख्या के तेजी से बढ़ने की गुंजाइश भी बनेगी। नई परिस्थितियों में तिब्बतियों का व्यापक दमन और नरसंहार भी आसान नहीं रहेगा। इसलिए चीनी तिब्बतियों की जनसंख्या को नियंत्रित नहीं रख पाएंगे। यह गलतफहमी ही है कि आर्थिक विकास के द्वारा और वैचारिक घुट्टी पिलाकर चीनी तिब्बतियों का मानस बदल सकते हैं। चीनी और तिब्बती दो भिन्न जातियां और राष्ट्रीयताएं हैं और सांस्कृतिक रूप से उनमें कोई समानता नहीं है।

तिब्बत पर आक्रमण करके चीन ने एक ऐतिहासिक गलती कर दी है। अपनी इस गलती के परिणाम उसे लंबे समय तक भुगतने पड़ेंगे। ऐतिहासिक रूप से चीनी एक आत्मकेंद्रित जाति रहे हैं। वे अन्य लोगों से घुलमिल नहीं पाते। अब तक वे अपनी सीमाओं पर एक विशाल दीवार बनाकर अपने आपको अलग और सुरक्षित बनाए रहे हैं। अब वे अपनी सीमाओं से बाहर आकर अपना विस्तार करने में लगे हैं। लेकिन उनका स्वभाव इसके अनुरूप नहीं है। यही कारण है कि अपने विस्तार की प्रक्रिया में वे अपने मित्र नहीं बना पा रहे, शत्रुओं की संख्या बढ़ाते चले जा रहे हैं। अपने व्यवहार से उन्होंने आम भारतीयों का अपने प्रति विश्वास खो दिया है। सात दशक पहले भारत के लोग चीन को आत्मीय दृष्टि से ही देखते थे। आम चीनियों में भी भारत के प्रति सदा श्रद्धा का भाव रहा था। चीन भगवान बुद्ध के वचनों के लिए ही भारत का ऋणी नहीं है, भारत के शास्त्रीय चिंतन से भी वह काफी कुछ ग्रहण करता रहा है। अब चीन को लगता है कि उन शास्त्रीय कोटियों का कोई उपयोग नहीं है। लेकिन यूरोप ने जिन विद्याओं के आधार पर आधुनिक शक्ति तंत्र खड़ा किया, वह एक शताब्दी में ही चरमराने लगा। अब तक ये विद्याएं यूरोप को दो महायुद्धों में झोंक चुकी हैं। यूरोप की विद्याएं औपनिवेशिक काल की बर्बरता के बीच से उदित हुई हैं और उनका पाप अंतत: यूरोपीय जातियों को विनाश की ओर ले जाएगा। भारत की शास्त्र परंपरा में ही भविष्य को कल्याणकारी मार्ग पर आगे बढ़ाने की क्षमता है।

दलाई लामा ने उचित ही कहा है कि भारत ने कभी उनका उपयोग करने की कोशिश नहीं की। लेकिन वे भारत और उसके ज्ञान की ऋणी हैं और संसार भर में भारत के इस ज्ञान के संदेशवाहक बने घूमते हैं। चीन के शासक अभी यह समझने में असमर्थ हैं कि बौद्ध धर्म का संदेश कालजयी है, जबकि मार्क्सवाद ने सौ वर्ष में ही अपनी सार्थकता खो दी है। चीन के शासक अब तक मार्क्सवाद के कारण नहीं विशाल चीनी सेना और अपनी दमनात्मक नीतियों के कारण अपना शासन टिकाए हुए है। पर यह अनंत काल तक नहीं चलने वाला। चीनी प्रशासक स्वयं इस आशंका से घिरे रहते हैं कि कभी भी उनका तंत्र जनविद्रोह की बलि चढ़ सकता है। दलाई लामा का पद चीन के मार्क्सवादी शासकों से लंबे समय तक टिकने वाला है। इसलिए चीन को दलाई लामा के प्रति अपने दुराग्रह और भारत के प्रति अपनी शत्रुता छोड़ देनी चाहिए। इसी में उसका हित है।

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