उमेश सिंह।

डेढ़ दशक पहले इक्कीसवीं शताब्दी में भारत ने कदम ही रखा था कि विकास के सूरज की रोशनी जिस गुजरात से पूरी त्वरा में छिटकती है, उसी के पांव डगमगा गए। 26 जनवरी 2001… भारत तरक्की की सलामी पेश कर रहा था, देश गणतंत्र दिवस की खुशियां मना रहा था… वहीं दूसरी ओर गुजरात का कच्छ गाते-गाते रोने-चिल्लाने लगा।

गांव के गांव मिट्टी में मिल गए, मिट्टी के थूह में तब्दील हो गए। जब तक लोग समझ पाते बड़ी बड़ी इमारतें ताश के महल की तरह जमींदोज हो गर्इं। धरती सिर्फ दो मिनट के लिए डांवाडोल हुई थी लेकिन इसी दो मिनट में… सब खत्म। खुशी की आवाजें दर्द और चीखों में तब्दील हो गई थीं। मलबों में ड्रिलिंग करके जीवन की तलाशी लेकिन मलबों से जीवन निकालने का काम आसान नहीं था। कच्छ के श्मशान लाशों से पट चुके थे। कच्छ के चार सौ पचास गांवों का नामोनिशान मिट गया। भूकंप से चौबीस जिले प्रभावित थे लेकिन कच्छ के भुज, अंजार, भचाऊ, चौबारी और नखत्राणा में अधिक तबाही हुई थी। बीस हजार लोगों की मौत हुई थी। डेढ़ लाख लोग बेघर हुए थे। कच्छवासियों की जिजीविषा को नमन। सब कुछ मिट जाने के बाद भी उनमें जीवन ऊर्जा ऐसी धधकी कि यह क्षेत्र डेढ़ दशक में ही एक बार फिर तनकर दुनिया के सामने खड़ा हो गया। कच्छ की विश्वप्रसिद्ध बांधनीकला का केंद्र अंजार शहर प्राकृतिक विपदा को बिसार कर एक बार फिर मुस्कराने लगा है। महिलाओं के हाथों की कला सूइयों के सहारे कपड़ों पर कलात्मक अभिव्यक्ति कर रही है। यह वही अंजार है जिसका दो तिहाई हिस्सा भूकंप में बर्बाद हो चुका था। चौबारी गांव तो भूकंप का केंद्र ही था। चौबारी के लोग विपदा को भूल विकास के रास्ते पर चल पड़े हैं। इपिक सेंटर होने के कारण कच्छ के रन का यह गांव पर्यटन के क्षेत्र में कुलाचे भरने लगा है। पग-पग पर नीम के पेड़ हैं, उस पर चबूतरे बने हैं, नीम की ठंडी छांव में बच्चे, युवा, बुजर्ग बैठकी लगाते हैं और विकास के सपनों को पंख लगाने जैसी आपस में चर्चा करते हुए तो मिल जाते हैं लेकिन बहुत कुरेदने पर भी सियासत पर चर्चा करने से बचते रहते हैं। संकेतों में थोड़ा बहुत संकेत भर कर देते हैं। समझने से चूके तो आप से बड़ा अनाड़ी कोई नहीं।

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अंजार… जिसकी कला पर यूरोप, अमेरिका रीझे
यह सच है कि कलाएं मरती नहीं है, मर-मर कर जीवित हो उठती हैं। ऐसी ही अनुभूति हुई अंजार में। कच्छ की परंपरागत बांधनी कला ने यूरोप, अमेरिका को रीझने के लिए मजबूर कर दिया। भूकंप आया तो विश्वप्रसिद्ध कला का यह केंद्र अंजार तहसील भी बर्बाद हो गया था। लेकिन यह फिर से गुलजार हो गया है। यहां का खत्री बाजार बांधनी कपड़ों का सबसे बड़ा केंद्र है, जहां से अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी आदि देशों को निर्यात किया जाता है। खत्री बाजार में तकरीबन साठ दुकानें हैं, जहां पर ग्राहकों की खचाखच भीड़ भरी हुई थी। खत्री इस्माइल हाजी अब्दुल लतीफ नाम की दुकान काफी पुरानी है, जो बाहर से आने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र है। दुकान के फारुख भाई ने बताया, ‘एक बार तो ऐसा लगा कि सब कुछ मिट गया लेकिन मेहनत और लगन से इस इलाके की बांधनी कला ने फिर अपना मुकाम हासिल कर लिया।’ दुकान के ही अब्दुल लतीफ ने बताया, ‘इस धंधे में हम चौथी पीढ़ी हैं। कई देशों को अंजार शहर निर्यात करता है लेकिन मौके पर धंधा थोड़ा मंदा चल रहा है। कच्छ में तकरीबन पचास हजार लोगों को बांधनी से रोजगार मिला है। इस कारोबार का केंद्र अंजार है, जिसके कारण यहां के लोग ज्यादा लाभान्वित है। प्राकृतिक रंगों का ही इसमें प्रयोग होता है। सरकार कॉटेज इंडस्ट्री को सपोर्ट करे तो इस कारोबार में उछाल आ जाए।’

बांधनी यहां पर कुटीर उद्योग की शक्ल में है। अंजार के एकता नगर में तकरीबन तीन सौ घरों में विभिन्न किस्म के कपड़ों पर कलाकारी होती है और उन पर चटक रंग चढ़ाया जाता है। एक-एक कपड़े पर दो-दो महिलाएं सूई से कलाकारी करती हुई यहां के घरों में दिखीं, जबकि पुरुष रंग बनाने, उसे एक निश्चित ताप तक गरम करने फिर उसमें बांधनी कपड़ों को रंगते हुए दिखे। सलीम के घर में इकरा और सुकरा तख्त पर बैठ कपड़ों पर सूई चला रही थी जबकि सूफियान कपड़ों को रंग पहनाने के लिए पानी को गरम कर रहे थे। इकरा ने बताया, ‘एक साड़ी को बनाने में चार से पांच दिन लग जाते हैं।’ सुकरा का कहना था, ‘इस काम में लड़कियां ही ज्यादा काम करती हैं, घर पर ही अच्छी आमदनी हो जाती है।’ सूफियान ने कहा, ‘हम लोगों को दुकानों से आर्डर मिल जाता है, वहीं से कपड़े मिलते हैं, तय समय में तैयार करके देना होता है। खुद का भी काम करते हैं। यदि कोई ग्राहक यहां से खरीदता है तो उसमें ज्यादा लाभ मिलता है।’ सलीम ने बताया, ‘बांधनी का काम कच्छ के धमड़का, अजरफपुर और भुज में भी होता है लेकिन उसका बड़ा केंद्र अंजार ही है।’

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‘तांडव’ के बाद विकास के वसंत का राग
विपदा से विकास की यात्रा देखनी हो तो चौबारी गांव आइए। भचाऊ तालुका से नौ किलोमीटर और भुज से बीस किलोमीटर की दूरी पर है। भूकंप का केंद्र यही गांव था। गांव से सात किमी. दूर उत्तर दिशा में ‘जगलाल मोरा’ से ही धरती डोली थी जिसने हंसती-खिलखिलाती विकासमान जमीं को श्माशान भूमि में तब्दील कर दिया था। अकेले इसी गांव में धरती कांपी तो साढ़े पांच सौ लोग शव में तब्दील हो गए। विपदा को बिसार कर प्रगति के पथ से कदमताल कर रहे इस गांव के बाशिंदों को जैसे ही कुरेदा गया, उनकी आंखें नम हो आर्इं। चौबारी चौराहे पर भूकंप आने के पहले बारह दुकानें थीं जो अब साठ हो गई हैं। 2001 के पहले यहां सिर्फ एक प्राइमरी स्कूल था लेकिन अब हायर सेकेंडरी स्कूल भी है तथा देना गुजरात ग्रामीण बैंक भी। कच्छ का रन होने के नाते पर्यटन की विशेष संभावनाओं के कारण इस क्षेत्र का विकास हो रहा है। देशी-विदेशी सैलानी नवंबर माह के आखिर में आना शुरू कर देते हैं। सैलानियों के लिए चौबारी गांव सजधज कर तैयार हो गया है। बारह हजार की आबादी वाले इस गांव से नर्मदा नहर तीन स्थानों से गुजरती है। कृष्णानगर, केशवनगर, घनश्यामनगर, पुराना चौबारी, नया चौबारी, एकल नगर, चामुंदा नगर, मूमैमोरा, भवानीनगर और कबीरनगर से मिलकर चौबारी गांव बना हुआ है। चौराहा जहां पर साठ दुकानें हैं, उसे कबीरनगर कहते हैं। गुजरात का सीएम बनने के बाद दीपावली मनाने नरेंद्र मोदी इसी गांव में आए थे और रामजी भाई की बाइक पर बैठ विपदा का जायजा लिया था। रामजी भाई ने कहा, ‘तत्कालीन सीएम की पहली विजिट इसी गांव में हुई। बर्बादी को देख वापस शिवमंदिर पर आए तो मैंने कहा कि ‘कहीं दीप जले तो कहीं दिल’। विपदा ने साढेÞ पांच सौ लोगों की जान ले ली। यह सुन वे भावुक हो रोने लगे। हम दुखियों के साथ उन्होंने दीपावली मनाई थी।’ स्वर्णकार विशाल सोनी ने कहा, ‘लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी है। 2001 में दस गा्रम सोना तीन हजार रुपए में था और अब तीस हजार का हो गया है। पहले के सापेक्ष गोल्ड की बिक्री ज्यादा है।’ शैलेश भाई ने कहा, ‘चौबीस घंटे बिजली मिल रही है, खेतों को पानी मिल रहा है। पहले सूखा था लेकिन नर्मदा नहर ने यहां की जमींन को हरा-भरा कर दिया। अब जीरा और अरंडी की फसल खेतों में लहलहाएंगी।’ राम जी भाई ने जम्मू कश्मीर के अक्षय गुप्ता से मुलाकात कराई जिनकी आंखों में चौबारी में ही पयर्टन के क्षेत्र में असीम संभावनाएं जगर-मगर कर रही है। अक्षय ने कहा, ‘सैलानियों के लिए हमने तैयारी पूरी कर ली है। पिछले कुछ वर्षों से वे बड़ी तादात में चौबारी गांव आने लगे हैं।’

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गोरक्षपीठ और योगी आदित्यनाथ का गहरा रिश्ता
चौबारी से बीस किलोमीटर की परिधि में कंथकोट सूर्यमंदिर तथा एकल गांव में एकल माता का मंदिर है। गोरक्षपीठ और योगी आदित्यनाथ का यहां से गहरा रिश्ता है। रामजी भाई ने बताया, ‘योगी आदित्यनाथ यहां पर दो बार आ चुके हैं।’ गौरतलब है कि चौबारी गांव में तकरीबन सौ साल पहले केशव मूल प्रकाश ने साधना की धूनी रमाई और फिर यहीं के होकर रह गए। केशव के शिष्य रहे दूदा भाई के पुत्र रामजी ने कहा, ‘रविभान्ह संप्रदाय’ हम लोगों का है जो आगे जाकर संत कबीरदास में जुड़ता है।