यह विपक्ष की मूर्खता का नतीजा है

डॉ. मनीष कुमार
Thu, 06 Jun, 2019 17:37 PM IST

2019 का लोकसभा चुनाव कई मायनों में अद्भुत रहा. कुछ राजनीतिक दलों ने समझ रखा था कि जनता नासमझ है, उसे झूठ-फरेब और प्रपंच के जरिये बरगलाया जा सकता है. जाति-धर्म के नाम पर लोगों को बांटकर उनके वोट हथियाए जा सकते हैं. कुछ राजनीतिक दल और उनके नेता मान बैठे थे कि मात्र गठबंधन कर लेने से उनकी नैय्या पार हो जाएगी. वहीं कुछ को यह भ्रम था कि चुनाव का फैसला सिर्फ जातीय समीकरण और वोटों के अंकगणित से होता है. इसी मायाजाल में मीडिया के साथ-साथ देश के बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक भी फंस गए. उनका सारा विश्लेषण धरा का धरा रह गया. उनकी विश्वसनीयता को जो झटका लगा है, उससे वे शायद कभी उबर नहीं पाएंगे. चुनाव के नतीजे आने के बाद अब वही लोग कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव जीतने में कामयाब रहे. सवाल यह है कि जनता से जुड़े सवालों को मुद्दा न बना पाने का दोषी कौन है? राफेल का मुद्दा जनता के बीच ले जाने में कौन विफल रहा? चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक मामलों में अदालत से फैसला कराने की मूर्खता किसने की? चाहे मामला जस्टिस लोया का हो, न्यायाधीशों की प्रेस कांफ्रेंस का हो या फिर राफेल का. ये सारे मुद्दे दिल्ली में मीडिया और राजनीतिक रूप से सक्रिय लोगों के बीच ही रहे. इन मामलों को लेकर विपक्ष ने ऐसा प्रपंच किया कि कुछ लोगों को यकीन हो गया कि नरेंद्र मोदी की साख खत्म हो गई है, इसलिए अब भाजपा का जीतना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.  

‘ओपिनियन पोस्ट’ देश का अकेला ऐसा मीडिया हाउस था, जिसने यह दावा किया था कि भाजपा अपने सहयोगियों के साथ तीन सौ का आंकड़ा पार कर जाएगी. ओपिनियन पोस्ट ने अपना सर्वे नतीजे आने से करीब तीन महीने पहले प्रकाशित किया था. हमने सिर्फ देश का आंकड़ा नहीं दिया, बल्कि हर राज्य का अलग-अलग विश्लेषण किया था. हमें इस बात का गर्व है कि हमारा हर दावा कमोबेश सही साबित हुआ. हमारे संवाददाताओं और रिसर्च टीम को जमीनी हकीकत का अंदाजा सर्वे के दौरान हो गया था कि देश बदल गया है, लेकिन राजनीतिक दलों एवं विश्लेषकों का मिजाज जस का तस है. जनता का मूड अलग था, लेकिन राजनीतिक दल एवं विश्लेषक अपने-अपने पूर्वाग्रहों में फंसे हुए थे. यही वजह है कि चुनाव के आखिर चरण तक बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक, टीवी चैनल और अखबार ‘त्रिशंकु संसद’ की भविष्यवाणी कर रहे थे. वे बहस कर रहे थे कि इस बार मोदी लहर है या नहीं? वे इस जमीनी हकीकत से बेखबर थे कि देश भर में ‘मोदी’ नामक सुनामी चल रही है. कई नामी-गिरामी चुनाव विशेषज्ञ भारतीय जनता पार्टी को 200 से कम सीटें दे रहे थे. जबकि इस बार के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की लहर 2014 से ज्यादा प्रचंड थी. 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत के पीछे मनमोहन सरकार की विफलता थी. मनमोहन सिंह के रूप में एक कमजोर नेतृत्व के खिलाफ लोगों में गुस्सा था. नरेंद्र मोदी ने जनता के बीच आशा और विश्वास की भावना पैदा की, नतीजा यह हुआ कि भारतीय जनता पार्टी बहुमत पाने में कामयाब रही. 2014 में जनता ने घोटालों का बदला लेते हुए कांग्रेस समेत यूपीए में शामिल सभी पार्टियों को हाशिये पर भेज दिया था.

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अगर 2014 का चुनाव कांग्रेस के लिए एक दु:स्वप्न था, तो 2019 के चुनावी नतीजे राहुल गांधी की अक्षमता का परिणाम हैं, क्योंकि इस बार उन्हें मोदी सरकार की विफलताओं को उजागर करना था, उनके अधूरे वादों पर जनता का विश्वास जीतना था. विपक्ष को एकजुट होकर मोदी से लोहा लेना था, जनता के सामने भविष्य का ब्लूप्रिंट रखना था. देश के गरीबों, दलितों, पिछड़ों, वनवासियों एवं अल्पसंख्यकों का  कल्याण कैसे संभव है, युवाओं को रोजगार के अवसर कैसे मिलेंगे, यह बताने की जरूरत थी. बजाय इसके, विपक्ष के नेता दार्शनिक बन गए. उन्होंने कभी घृणा को प्रेम से जीतने वाले संत का रूप धारण कर लिया, तो कभी खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण बताने में जुटे रहे. यही नहीं, वह अपनी रैलियों में ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगवा कर खुश होते रहे. कांग्रेस के पूरे प्रचार अभियान को देखकर ऐसा लगा कि राहुल गांधी देश का नहीं, बल्कि कॉलेज-यूनिवर्सिटी छात्रसंघ का चुनाव लड़ रहे हैं. यह राहुल गांधी की अपरिपक्वता का ही नतीजा था कि वह ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे…’ जैसे नारे लगाने वाले

तत्वों के समर्थन में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंच गए. अभिव्यक्ति की आजादी की लड़ाई कई तरीके से लड़ी जा सकती है. लेकिन, ऐसे संगठनों एवं छात्रों के साथ खड़ा हो जाना, जो ‘छीन के लेंगे आजादी’ का नारा लगाते हों, किसी भी राष्ट्रीय नेता के लिए शर्मनाक है. राहुल गांधी अपनी अनियोजित और अपरिपक्व राजनीति की वजह से सिर्फ चुनाव ही नहीं हारे, बल्कि उन्होंने सवा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी पार्टी कांग्रेस के गौरवशाली इतिहास पर कालिख भी पोत दी.

राहुल गांधी अब कोई बच्चे नहीं हैं. 19 जून को वह 49 साल के हो जाएंगे. पिछले दो दशकों से वह राजनीति में सक्रिय हैं,लेकिन अफसोस कि वह आज तक शौकिया राजनेता हैं. वह न तो देश की जनता को समझ पाए और न उसकी समस्याओं को. वह तो नेहरू एवं इंदिरा गांधी की राजनीति और विचारों को भी नहीं समझ सके. वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष जरूर हैं, लेकिन कांग्रेस के मूल स्वरूप और चरित्र से सर्वथा अपरिचित हैं. राहुल गांधी की कांग्रेस को किसी वर्ग या समुदाय का संपूर्ण समर्थन हासिल नहीं है. वह कभी एक्टिविस्ट की तरह भाषण देते हैं, तो कभी संत बन जाते हैं. दरअसल, राहुल गांधी के सलाहकार उन तक सही जानकारी नहीं पहुंचाते. यही वजह है कि वह मेहनत तो भरपूर करते हैं, लेकिन इसके बावजूद जनता से कटे रहते हैं. नतीजा सामने है कि चुनाव जीतना तो दूर, कांग्रेस को आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लडऩी पड़ रही है. 20 राज्यों में एक भी सीट न मिलना आखिर क्या संदेश देता है? हकीकत यह है कि राहुल गांधी देश की जनता के गुस्से को भांप नहीं पाए, उनके इर्द-गिर्द रहने वाले कथित सहयोगियों ने उन्हें गलत सुझाव दिए. वह अपने भाषण खुद सुनकर खुश होते रहे. उन्होंने कई मुद्दे उठाए, लेकिन मोदी को घेरने में विफल रहे. ऐसा नहीं है कि उनके मुद्दों में दम नहीं था. लेकिन, जिस तरीके से उन्हें राहुल गांधी ने उठाया, भद्दे संवादों का इस्तेमाल किया और उनकी टीम ने सोशल मीडिया में चुनाव का मजाक उड़ाया, उससे जनता को लगा कि राहुल गंभीर राजनेता नहीं हैं. यही वजह है कि वह जनता का भरोसा नहीं जीत सके.

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एक तरफ राहुल गांधी जैसा शौकिया राजनेता, तो दूसरी तरफ राजनीति को गहरे तक आत्मसात करने वाले परिपक्व राजनेता नरेंद्र मोदी. मोदी ने एक साल पहले से ही चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी थीं. प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने जनता से जुड़ी योजनाओं का न सिर्फ जायजा लिया, बल्कि उन्हें आम जन तक जल्द से जल्द पहुंचाने के लिए समूचा सरकारी तंत्र झोंक दिया. यही वजह है, देश के उन इलाकों तक उज्जवला, शौचालय, गरीबों को मुफ्त आवास और घर-घर बिजली जैसी सुविधाएं पहुंच गईं, जहां कभी कोई मीडिया नहीं पहुंचा था और न विश्लेषक. इसके बाद मोदी ने उन तमाम संभावित संकटों को रास्ते से हटाया, जो चुनाव जीतने में बाधक बन सकते थे. उन्होंने मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ की हार का विश्लेषण किया, सबक सीखा. नतीजा यह हुआ कि 2019 के अंतरिम बजट में नरेंद्र मोदी सरकार ने गरीबों के लिए सरकारी खजाना खोल दिया. हर गरीब किसान के खाते में 2,000 रुपये बतौर किसान सम्मान निधि पहुंचाए गए. देश भर में सवर्णों को आरक्षण देने की मांग उठ रही थी. जाट, गुर्जर, मराठा एवं पटेल जैसी कई जातियां आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन पर आमादा थीं. मोदी सरकार ने संविधान में संशोधन करके गरीब सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता साफ किया. एक ही झटके में सारे आंदोलन खत्म हो गए. सरकार का विरोध करने वाले लोग ही मोदी की तारीफ करने लगे. विपक्ष द्वारा स्थापित कई जातीय नेता हाशिये पर चले गए. सरकार ने व्यापारियों के लिए जीएसटी का सरलीकरण किया और महंगाई पर लगाम कसी.

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चुनाव से ठीक पहले पुलवामा हमला हुआ. एक मंझे हुए नेता की तरह मोदी ने फौरन सेना को पाकिस्तान स्थित आतंकियों के ठिकानों पर हवाई हमले के आदेश दिए. देश की जनता को पहली बार लगा कि नरेंद्र मोदी न सिर्फ एक सशक्त नेता हैं, बल्कि वह कड़े से कड़े फैसले लेने में जरा भी नहीं हिचकते. लेकिन, विपक्ष की मूर्खता का आलम यह था कि उसने पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर हुए भारतीय हमले को लेकर सवाल खड़े कर दिए. कुछ विपक्षी नेता तो सुबूत मांगने लगे. मोदी को नीचा दिखाने के चक्कर में पूरा विपक्ष जनता की नजरों में गिर गया. जनता को लगा कि मोदी का विरोध करते-करते विपक्ष देश विरोधी हो गया है. राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता भ्रष्टाचार, महंगाई एवं बेरोजगारी को मुद्दा नहीं बना सके. वे नरेंद्र मोदी द्वारा बिछाए गए जाल में फंस गए और उन्हें ही मुद्दा बना बैठे. नरेंद्र मोदी ने इसी को अपना हथियार बना लिया. वह हर रैली में कहते रहे, हम कामगार हैं, मेहनती हैं और देश के लिए अपना सब कुछ  न्यौछावर करने को तैयार हैं, लेकिन विपक्षी नेता मुझे गालियां देते हैं. मोदी जनता तक यह संदेश पहुंचाने में कामयाब रहे कि वह गरीब तबके के हैं, इसलिए गरीबों की समस्याएं समझते हैं. उन्होंने जनता को बताया कि उनकी सरकार की योजनाओं से कितने गरीबों का फायदा हुआ. मोदी ने यह भी वादा किया कि जो लोग इस बार लाभांवित होने से रह गए हैं, उनके लिए वह अगले पांच सालों तक काम करते रहेंगे. मोदी के भाषणों में देश को फिर एक नई संभावना झलकी. ऐसी संभावना, जिसे राजनीतिक दल और मीडिया नहीं भांप सके, लेकिन गरीबों तक मोदी का संदेश चला गया. भाजपा को मिली अपार सफलता उसी संदेश का परिणाम है.

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