मनोज तिवारी के अध्यक्ष बनने के कई मायने हैं

ओपिनियन पोस्ट
Wed, 30 Nov, 2016 17:28 PM IST

मृत्युंजय कुमार

आम आदमी पार्टी की आंधी में साफ हो चुकी दिल्ली भाजपा की कमान नार्थ ईस्ट दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी के हाथों में दिए जाने के कई मायने हैं। इससे केजरीवाल की पापुलर टाइप राजनीति को भाजपा की तरफ से जवाब मिलेगा तो दूसरी तरफ पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी की ओर पूरी तरह से चले गए यूपी बिहार के मतदाताओं को मनोज तिवारी के जरिए वापस लाने की कोशिश को बल मिलेगा। संकट बस संगठन के पुराने नेताओं को साधने का है, जो शायद स्टारडम में रहनेवाले मनोज तिवारी को सीधे सीधे स्वीकार न करें।

दरअसल,, भाजपा के पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प दिख भी नहीं रहा था। आम आदमी पार्टी के उतार के बावजूद सतीश उपाध्याय भाजपा को कोई बड़ा फायदा दिलाते हुए नहीं दिख रहे थे। दूसरे दावेदारों में कोई ऐसा नाम भी फिलहाल नहीं दिख रहा था जो भाजपा की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करता हुआ दिख रहा था। 21 सीटों पर उपचुनाव की आहट औऱ नगर निगम चुनाव का दबाव साफ था। क्योंकि कांग्रेस ने अपनी खोई जमीन वापस पाने की कसरत तेज कर दी थी। कांग्रेस का आकलन है कि उपचुनाव हुआ तो उसका प्रदर्शन ठीक ठाक रहेगा। केजरीवाल से नाराज पुरबिए कांग्रेस की ओर जा सकते थे। इसे देखते हुए कई महीनों से चल रहे कयास के बाद मनोज तिवारी को उतारने का फैसला किया गया। पंजाबी वोट बैंक तो किरण बेदी को सामने करने पर भी जीत दिलाने में सफल नहीं रहा था। हालांकि शुरूआत से ही दिल्ली भाजपा में पंजाबी नेताओं के हावी होने के कारण पंजाबी बनियों की पार्टी का ठप्पा सा लग गया था।

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दिल्ली में पुरबिए अपनी ताकत का आगाज लाल बिहारी तिवारी की जीत के साथ करा चुके थे। उसके बाद छठ घाटों पर बढ़ती भीड़ लगातार राजनीतिक दलों को सचेत करते रहे। कांग्रेस के साथ रहनेवाले पूर्वाँचली पिछले विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की बंपर जीत के कारक थे। अब भाजपा को उम्मीद है कि मनोज तिवारी के स्टारडम के कारण ये मतदाता भाजपा के साथ आएंगे। हालांकि पार्टी में मनोज तिवारी के विरोधियों का कहना है कि स्टारडम के कारण चुनाव जीतने में और जननेता बनने में बहुत फर्क है। जननेता का द्वार जनता के लिए हमेशा खुला होता है जबकि मनोज तिवारी अभी लोगों से हफ्ते में सिर्फ एक दिन मिलते हैं। संगठन के नेताओं के भी फोन नहीं उठाते और उनका स्टाफ भी काल बैक करवाने की जहमत नहीं करता। इन्हीं आरोपों के कारण यह बदलाव इतने दिन तक टला रहा पर संभवत कोई और बेहतर विकल्प न दिखने के कारण यह फैसला ले ही लिया गया। भाजपा हाईकमान को उम्मीद है कि लोग मनोज तिवारी के गाने भी सुनेंगे और वोट भी देंगे।

गौरतलब है कि मनोज तिवारी भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार गायक नायक रहे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में इनकी जबरदस्त लोकप्रियता रही है। इसी के कारण सपा ने पहली बार मनोज का राजनीतिक तौर पर गोरखपुर में इस्तेमाल किया था और योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़ाया था। हालांकि वह चुनाव हार गए थे। उस समय उन्होंने कहा था कि लोगों ने मेरे गाने सुने पर वोट नहीं दिए। बाद में अचानक लोकसभा चुनाव में दिल्ली से टिकट देकर भाजपा ने सबको चौंका दिया। स्थानीय भाजपा नेताओं की एक बड़ी लाबी इसके खिलाफ थी पर अपनी लोकप्रियता और मोदी लहर में मनोज तिवारी लोकसभा पहुंच गए।

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