तापमान तकरीबन पांच डिग्री सेल्सियस। जल की यात्रा जमाव विंदु की ओर। इस हाड़कपाती ठंड में अद्भुत दृश्य। शरीर पर खादी का हाफ पैंट और कमीज। पैर में चप्पल। कंधे पर गांधी झोला। इन्हें ‘चंबल का संत’ कहा जाता है। इनका जीवन ही कैंप सदृश है। दशकों की जीवनचर्या का नाभिनाल संबंध ‘कैंप ही जीवन है, जीवन ही कैंप है’ से है। बंदूकों की धांय-धांय चंबल घाटी की पहचान थी। अपनी साधना और तप से उस चंबल की ‘रक्तिम-परंपरा’ को मिटा दिया। घाटी में ‘शांति की घंटियां’ गूंजें, इसके लिए मुरैना के जौरा गांव में महात्मा गांधी सेवा आश्रम की स्थापना की। यह वही प्रेरक धरती है, जहां वर्ष 1972 में 654 बागियों ने हिंसा का त्याग कर अहिंसा का वरण किया। गरजने वाली बंदूकें तो महात्मा गांधी के चरणों में गिरी थीं। उनके बताए रास्ते पर चलने से सफलता मिली थी। लेकिन सामने गांधी नहीं थे। चरण थे जय प्रकाश नारायन और एसएन सुब्बाराव थे। हम जैसे नई पीढ़ी के लोगों ने सेवाभाव की त्रयी- महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण को नहीं देखा। सिर्फ पढ़ा। खुद के जीवन में उन्हें ढालने की असफल कोशिश भी की। लेकिन हम सुब्बाराव यानी ‘भाई जी’ को देख कह सकते हैं कि उस सेवात्रयी को मैंने भी देखा है। भाई जी 90 वर्ष के चिर युवा हैं। शास्त्रीय संगीत में सिद्ध हैं। डेढ़ दर्जन भाषाओं के ज्ञाता हैं। उनकी आवाज में जादू है, सम्मोहन है। बच्चों जैसी निर्दोष मुस्कराहट है। ‘आध्यात्मिक अवरा शक्ति’ की तेजोमयता ऐसी कि जो एक बार मिला, फिर उन्हीं का हो गया। राष्ट्रीय सेवा योजना के संस्थापक सदस्य रहे। पदम सम्मान से अलंकरण हुआ। बागियों की धरती चंबल में डकैतों के बीच कभी तानपुरा तो कभी मजीरा बजा-बजा अपना प्रिय भजन ‘आया हूं दरबार में तेरे…’ सुना डकैतों का दिल जीत लिया। एक बार तो दो गिरोहों के बीच गोलीबारी में फंस गए। न डर, न भय। वहीं खड़े हो प्रार्थना करने लगे। यूं खतरों से खेलते रहे, इसीलिए उन्हें चंबल का संत कहा गया। चंबल में आया हूं दरबार में तेरे… सुनाया तो अयोध्या पहुंच उन्हें राम याद आने लगते हैं, रघुवर की सुधि सताने लगती है। विदग्ध ह्दय के गहरे तल से स्पर्शित हो ‘राम बिना मेरी सूनी अयोध्या…’ गाने लगे। गांधीवादी प्रो. वनवारी लाल शर्मा के शिष्य शिक्षाविद् ओमप्रकाश द्विवेदी के आमंत्रण पर एसएन सुब्बाराव अयोध्या-फैजाबाद पधारे थे, जहां उनसे उमेश सिंह की विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुई।

आलिया ने गीता पढ़ा तो कुछ लोगों को बुरा लग गया। धर्म को आखिर इतना संकीर्ण क्यों बनाया जा रहा है?
आलिया ने गीता पढ़ा तो मुल्ला लोगों को बुरा लगा। मैं चाहता हूं कि लाखों हिंदू लड़के कुरान पढ़ें, लाखों मुसलमान गीता पढ़ें, लाखों हिंदू गुरुग्रंध पढ़ें। ऐसा विशाल धर्म होना चाहिए। बच्चा शुरू में संकेतों में सिर्फ मुझे दूध पिलाओ ही कहता है। वह पहले मां, फिर पिता, मौसी, बुआ चाची से परिचित होता है। स्कूल गया तो उसकी पहचान सौ लोगों से हो जाती है। बढ़ते हुए यही भाव ‘वसुधैव कुटुंबकम’ तक जाना चाहिए। लेकिन आगे रुकावट आ जाती है। मंै ब्राहमण हूं, ठाकुर हूं, हिंदू हूं, इंडियन हूं। लेकिन सबसे आगे ‘मैं इंसान हूं’ होना चाहिए। दीवाल जैसे-जैसे टूटती जाएगी, अपने लिए भी फायदेमंद और विश्व के लिए भी। सरोजनी नायडू बोलती थीं, मै बर्थ से बंगाली हूं, विवाह से दक्षिण भारतीय, बट आई एम इंडियन फर्स्ट एंड लास्ट। हमारे जौरा आश्रम में 520 लड़के लड़कियां आए। महीनों तक रहे। दिन भर हमारे साथ रहते थे लेकिन रात को उसी क्षेत्र के गांवों में अलग अलग घरों में रहते थे। हिंदू-मुसलमान, ऊंच-नीच और सवर्ण-दलित सब एक दूसरे के घरों में रात बिताते थे। कोई भेदभाव नहीं रहता था। ये जो दीवार बनी है। जाति की, धर्म की और भाषा की। वह दीवार गिरनी चाहिए।
महात्मा गांधी के विचारों पर चर्चा खूब होती है और उस पर चलने का आह्वान भी होता है। क्या उनके सपनों का भारत बन रहा है?
दो महान व्यक्तियों से दुनिया बदली। कार्ल मार्क्स और महात्मा गांधी। दोनों में विरोधाभास था। लेकिन एक बात में दोनों की सहमति थी। मार्क्स ने कहा कि कम्युनिज्म के माध्यम से लोग इतने जिम्मेदार बन जाएंगे कि नागरिक के लिए सरकार की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। गांधी ने भी यही कहा। लेकिन न कार्ल मार्क्स का रसिया बना और न ही गांधी का भारत बना।
महात्मा गांधी का भारत बनने की कितनी संभावना है। क्या गांधी के विचारों का गांव कहीं पर बन रहा है?
महात्म गांधी ने कहा था कि मेरी कल्पना का भारत सात लाख सार्वभौम प्रभुत्व संगठन का भारत है। हर एक गांव स्वतंत्र। उसे न तो कलेक्टर की जरूरत होगी और न ही पुलिस की। यह सात लाख भारत और पाकिस्तान मिलाकर था। बंटवारे के बाद भारत में पांच लाख गांव ही तत्समय बचे। सार्वभौम प्रभुत्व संगठन का भारत बन नहीं पाया। क्योंकि गांव ही आत्मनिर्भर नहीं बन पाए। बहुत छोटे पैमाने पर महात्मा गांधी अपनाए जा रहे हंै। गढ़चिरौली में एक गांव स्वतंत्र बना है। लेकिन बस कहने भर को है।
इतने बड़े देश में गढ़चिरौली के गांव को छोड़कर कहीं कोई ऐसी जगह क्या है, जिसे देखकर लगे कि गांधी के विचार यहां जिंदा हैं?
मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास भगुवार गांव ने पुलिस थाने को हटा दिया। पांच वर्ष में एक भी मुकदमा नहीं। मैं वहां गया तो बहुत आश्चर्य हुआ। उस गांव में अभी तक चुनाव नहीं हुआ है। सर्वसम्मति से सरपंच को चुन लिया जाता है। गांव वालों ने बताया कि बुजुर्गों ने सलाह दी थी कि गांव में फूट नहीं पड़नी चाहिए। हम उस पर अमल करते हैं। चुनाव के दौरान गांव में कोई भी पोलिटिकल कार्यकर्ता प्रवेश नहीं करने पाता है।
आप के पास अनुभव का बड़ा संसार है। कौन सी ऐसी बात है जो ह्दय को कचोटती रहती है?
हमारे यहां कर्नाटक और केरल में दिन में शादी होती है लेकिन उत्तर भारत में रात को होती है। चंबल घाटी में एक विवाह समारोह में गया था। हमारे पास बैठे वहां के एसपी ने कहा कि हमारे यहां और आप के यहां शादी में क्या फर्क है। मैंने कहा हमारे यहां रात को नींद हराम नहीं करते हैं। भगवान राम की शादी रात में नहीं हुई थी तो अब क्यों नहीं होता है? तब और अब में फर्क यह है कि बीच में मुगलराज आ गया था। दूल्हा तलवार लेकर जाता है, पता नहीं कब लड़ाई हो जाए। उस वक्त शादी में महिलाएं नहीं जाती थीं। डर था। पता नहीं कब आक्रमण हो जाए। इसलिए रात को शादी होती थी। मुगल चला गया। अंग्रेज आया और वह भी चला गया। लेकिन अभी भी शादी वैसे ही हो रही है।
बेटियों को प्राथमिकता दी जा रही है। आप की दृष्टि में पुरुष के सापेक्ष महिलाओं की स्थिति में कितना सुधार हुआ है?
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ बहुत अच्छी बात है। यहां पर दो कार्यक्रमों में गया लेकिन मंच पर एक भी महिला नहीं थी। एक दूसरे शहर का वाकया है। वहां पर भी वक्ता सिर्फ पुरुष ही थे। सुनने वाली सिर्फ लड़कियां। सबने कहा-‘वीरमाता बनो’। लड़कियों ने तालियां बजाई। मैंने कहा कि ये वक्ता लड़कों के कालेज में क्या वीर पिता बनने को बोलते हैं। सब चुप हो गए। सन्नाटा घिर गया। यात्रा प्रवास में जिन घरों में रुकता हूं, वे थाली नहीं धुलने देते हैं। कहते हैं कि आप नहीं धोएंगे। लेकिन वह खुद नहीं धुलेगा, लड़के को भी नहीं देगा। लड़की को देगा धोने के लिए। लड़कियों से कहता हूं कि आंदोलन करो। लड़कियां और लड़के दोनों रसोई में जाएं।
शिकागो के विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के संबोधन के ठीक सौ साल बाद 1993 में उसी मंच से भारत के प्रतिनिधि के तौर पर संबोधित करते हुए आपने कैसा अनुभव किया?
मैंने कहा कि एक सदी पहले भारत के नौजवान संन्यासी बोले थे। मैं उसी देश से आया हूं। स्वामी जी ने संदेश लाया था सर्वधर्म समभाव। धर्म को विशाल बनाना होगा, तभी मनुष्यता के सुंदर भाव का उदय होगा। मेरा देश सर्व धर्म समभाव से सर्वधर्म ममभाव की ओर गया है। इसी भाव की ओर विश्व के सभी देशों को जाना होगा। संबोधन के दौरान यह मेरे लिए आत्मगौरव का क्षण था क्योंकि उसी मंच से युवा संन्यासी ने सनातन परंपरा के शिखर से समूची दुनिया को परिचित कराया था।
परंपराओं के नाम पर हम बहुत कुछ बेमतलब ढोए जा रहे हैं। सुधार कार्यक्रम चल रहे हैं, लेकिन उनका प्रभाव कम दिख रहा है?
सती मंदिर बने, अच्छी बात है। सच्ची बात तो तब होगी जब पति भी चिता में कूदे। मेरे पिता जी गुजर गए तो मैं कावेरी नदी गया। पानी में खड़े हो पंडित जी से पूछा कि यदि मेरी मां चली जाती और पिता बने रहते तो आप के गरुण पुराण में क्या क्या कानून है। पंडित जी ने कहा कि आदमी तो श्मशान से ही दूसरी शादी करके आ सकता है। मैने कहा-धिक्कार है तुम्हारे कानून का। पति के नहीं रहने पर महिलाओं के लिए तरह-तरह के निषेध से भरा हुआ गरुण पुराण और पत्नी के न रहने पर पति के लिए निषेध का अभाव।
पदमावत फिल्म को लेकर विवाद मचा हुआ है। आप की क्या राय है?
हमने पढ़ा नहीं और समझा भी नहीं। वैसे सुलझ जाए तो अच्छा है। फिल्म बनाने वालों को भी सोचना चाहिए कि देश में वैसे भी इतनी उलझने हैं। उसे आखिर और क्यों उलझा रहे हैं।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर आप क्या सोचते हैं?
35 वर्ष पहले अयोध्या आया था। मैने उस समय भी प्रस्ताव रखा था। दशरथ राजा थे, ये सभी स्वीकार करते हैं। राजा और रानी महल में रहे होंगे। क्योंकि तब मैटरनिटी होम नहीं था। राम महल में पैदा हुए होंगे। मंदिर तोड़ना बहुत गलत है। लेकिन कई मंदिर तोड़े गए। सबके लिए झगड़ा नहीं है, सिर्फ राम के लिए झगड़ा है। राजा दशरथ का महल तोड़कर वहां मंदिर किसने बनाया? बाबर तो बाद में आया होगा। मैं सुप्रीम कोर्ट को लिखूंगा कि राम अयोध्या में पैदा हुए लेकिन मैं यह नहीं मानता कि वह मस्जिद में पैदा हुए। राम सैकड़ों बार सरयू नदी में तैरे होंगे, वहां खेले कूदे होंगे। सरयू नदी के किनारे भव्य मंदिर बनाओ। सभी धर्मों के लोगों को कारसेवा के लिए लाऊंगा। जहां विवाद है, वहां अंतरराष्ट्रीय केंद्र बन जाए। सारा झगड़ा समाप्त हो जाए, जिससे दुनिया समझे कि हिंदुस्तान समस्याओं का समाधान कर लेता है।
(यह बोलते-बोलते गांधीवादी एसएन सुब्बाराव भाव जगत में खोने लगे और उनके हाथ झोले में से कुछ टटोलने लगे। वाद्य यंत्र मजीरा तलाश रहे थे बजाने के लिए। लेकिन वह दूसरे झोले में था। फिर टेबल पर अपनी उंगलियों से ही संगीत का स्वर निकालने लगे। विदग्ध ह्दय के गहरे तल से स्पर्श हो जुबां खुली तो समूचा कमरा कुछ मिनटों के लिए राममय से तारी हो गया। वह भजन गा रहे थे जिसमें राम, लक्ष्मन और मां जानकी को याद कर रहे थे। गाते-गाते उनकी आंखें सजल हो गईं और भावजनित अश्रुबूंदें भी आंखों के कोने-अंतरे से छलकने लगीं-)
रघुवर की सुधि आई/ मुझे रघुवर की सुधि आई/आगे आगे राम चलत है/ पीछे लक्षमन भाई/ मुझे रघुवर की सुधि आई/ तिनके पीछे चलत जानकी/ विपति सही न जाई/ मुझे रघुवर की सुधि आई/ सावन गरजे, भादौ बरसे/ पवन चलत पुरवाई/ राम बिना मेरी सूनी अयोध्या/ लक्षमन बिन ठकुराई/ सिया बिना मेरी सून रसोई/ महल उदासी छाई/ सिया बिन महल उदासी छाई/ मुझे रघुवर की सुधि आई…।

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