ओपिनियन पोस्ट के प्रथम अंक में विशेष सामग्री

NDA's Bihar poll campaign launchedवित्तमंत्री श्री अरुण जेटली ने ओपिनियन पोस्ट पाक्षिक पत्रिका के 1 से 15  अक्टूबर अंक का लोकार्पण किया उस अंक में कई खास रिपोर्ट है।

कवर स्टोरी- बिहार में सबकी राजनीतिक साख दांव पर

विधानसभा चुनाव से पार्टियों ही नहीं, कई नेताओं और नेता परिवारों का राजनीतिक भविष्य भी तय होगा। नतीजे बताएंगे कि बिहार जाति की राजनीति से बाहर निकलने को तैयार है या नहीं। प्रदीप सिंह की विशेष रिपोर्ट। साथ ही 16 घंटे की ट्रेन यात्रा में चुनावी माहौल को भांपनेवाली आनंद सिंह की यात्रा रिपोर्ट। मुसलमान मतदाताओं की मनोदशा पर इर्शादुल और अतिपिछड़े मतदाताओं पर देवेंद्र कुमार का तथ्यपरक विश्लेषण

मुसलमान सोचें, देश को क्या दिया -मौलाना कल्बे सादिक

मजहबी विषयों पर बेबाक राय देने के लिए मशहूर लखनऊ के शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे सादिक ने सदैव मुसलमानों से धर्म के प्रति kalbe sadiqeवैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है। रमजान के महीने में चांद देखकर ईद मनाने के दकियानूसी दृष्टिकोण का मौलाना ने सदा विरोध किया। उनका तर्क रहा है कि किसी भी नौसेना की वेबसाइट देखकर चांद की स्थिति जानी जा सकती है। चांद दिखे या न दिखे, तीस दिन के रोजे के बाद अगला दिन ईद है। मौलाना देश के शायद अकेले इस्लामी विद्वान हैं जो महिलाओं के मस्जिद में नमाज अदा करने की वकालत करते हैं। लखनऊ में इस्लामी कैलेन्डर के पहले महीने मोहर्रम माह में निकलने वाले धार्मिक जूलूसों के कारण सौ वर्ष से भी अधिक पुराने शिया सुन्नी विवाद व दोनों समुदायों के बीच की खाई पाटने के लिए मौलाना सादिक ने पहल की थी कि दोनों समुदायों के लोग एक दूसरे की मस्जिद में जाकर एक साथ नमाज पढ़ें। उनसे वीरेन्द्र नाथ भट्ट  की बातचीत के प्रमुख अंश

 

निजाम बदला पर हालात और संगीन 

jammu storyपाकिस्तानी सेना की हरकतें अब पहले से आगे बढ़ गई हैं। नए इलाकों पर गोलाबारी सीमा से सटे इलाकों के बाशिंदों की जिंदगी को दहशत और दुश्वारियों से भर रही है।पाकिस्तान ने अपने हमले की रेंज बढ़ा दी है और अच्छे अस्पताल, सड़क, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए शिकायतों की भरमार है। जम्मू के आरएसपुरा से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर है सई गांव। यह गांव भारतीय सेना की पीतल पोस्ट के करीब है। कैसे गुजर रही है वहां के लोगों की जिंदगी, क्या कर रही है सरकारें? सीमावर्ती गांवों के हालात पर मृत्युंजय कुमार की रिपोर्ट

नृत्य के सहारे जिंदगी की जंग

तंगहाली और थैलीसीमिया से पीड़ित आठ साल की तनुश्री के लिए नृत्य अपनी जिंदगी बचाने के लिए कमाई का जरिया बन गया है।

tanushreeपश्चिम बंगाल से नवीन कुमार राय की एक एेसी बच्ची की स्टोरी जो डांस कर पैसा कमाती है, उससे खून खरीदती है। गरीब परिवार की यह मासूम थैलीसीमिया (रक्त कैंसर) की चपेट में है। हर महीने उसके शरीर का खून बदला जाता है, जिसमें चार हजार रुपये खर्च होते हैं। मां-बाप दोनों काम करते हैं, फिर भी इतना नहीं कमा पाते कि उसके इलाज का खर्च उठा सकें। पिता एक स्कूल में दो हजार रुपये की पगार पर दरबानी करते हैं, तो मां दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर अपना घर चलाती है।

अश्लील साहित्य से ऊपर का स्तर नहीं है शोभा डे और चेतन भगत का -कुमार विश्वास

कुमार विश्वास, युवाओं के चहेते कवि, अरविंद केजरीवाल के भरोसेमंद दोस्त। सितारों जैसी स्टाइल और रईसों जैसे ठाठ के साथ सबसे ज्यादा पारिश्रमिक लेने वाले कवि के तौर पर जाने जाते हैं। गूगल हेडक्वार्टर उनको हिंदी पर भाषण देने बुलाता है, तो फेसबुक पर दुनिया के किसी भी कवि से बड़ा परिवार उनका है, न्यूजीलैंड की आबादी जितना। उनसे अजय विद्युत की बातचीत के प्रमुख अंश…

k vishawashअभी विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ। देश-दुनिया में आज हिंदी भाषा और साहित्य कहां-कितना पहुंचा है?

कुछ समय देंगे तो अच्छे से बता पाऊंगा। हिंदी इस समय दो-ढाई सौ करोड़ लोगों की जुबान है। सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका में लोग हिंदी बोलते हैं। फिर आप्रवासियों की संख्या बहुत बड़ी है। जिस मां की रसोई में ढाई सौ करोड़ बेटे-बेटियां खाते हों, उसे इंतजाम कितना करना है? इंतजाम हुआ नहीं। उसके बेटे-बेटियों ने सबके लिए खाना बनाया नहीं, तो उसके भूखे बच्चों को क्या पढ़ना पड़ रहा है- चेतन भगत, शोभा डे। उनको हिंदी में अनुवाद करके छापो, तो हमारे यहां जो अश्लील चीजें छपती हैं, उनमें वे जब्त हो जाएं। खुद को ठीक ठाक बुद्धिजीवी कहलाने और मानसिक खुराक के लिए उनके बच्चों को क्या पढ़ना पड़ा- खुशवंत सिंह। मैंने उनका सारा साहित्य पढ़ा है। ‘आई शैल नॉट हियर द नाइटिंगेल’ के अलावा कोई दूसरी पुस्तक उनकी ला दीजिए, जिसमें कोई बहुत बड़ा साहित्य बोध हो। मैंने शोभा जी का भी ‘स्टडी डेज’ से लेकर ‘सिस्टर्स’ तक पढ़ा है। मुझे नहीं लगता कि इनमें कोई ऐसी बड़ी उत्कृष्ट बात है, जो मेरे प्रेमचंद के पासंग भी बैठती है। हमारे उदय प्रकाश के आसपास भी बैठती हो जो हमारे नए लेखकों में शुमार हैं।

   पूरी रिपोर्ट ओपिनियन पोस्ट (1-15 अक्टूबर) में

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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