कुन्नूर : सियासी मौतों का मरकज

ओपिनियन पोस्ट
Fri, 03 Mar, 2017 18:46 PM IST

कुन्नूर से लौटकर अभिषेक रंजन सिंह

सियासी रंजिशों को लेकर हत्याएं होना देश में कोई नई बात नहीं है। अमूमन सभी राज्यों में ऐसी वारदात सामने आती रहती हैं लेकिन देश के सर्वाधिक शिक्षित राज्य केरल के कुन्नूर जिले में सियासी कत्लेआम एक खतरनाक रूप अख्तियार कर चुका है। इन्हीं वजहों से इस जिले को मौत की राजधानी भी कहा जाने लगा है।

सितंबर में कोझिकोड में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केरल में जारी राजनीतिक हत्याओं पर चिंता जाहिर करते हुए इसके लिए सीधे तौर पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) को जिम्मेदार ठहराया। मोदी ने मीडिया से अपील की  कि वह देश की जनता को केरल में जारी कत्लेआम से अवगत कराए ताकि माकपा की हिंसक राजनीति के बारे में उन्हें भी पता चले। प्रधानमंत्री की यह चिंता वाजिब है लेकिन कुन्नूर की इस  खूनी राजनीति के लिए किसी एक पार्टी को पूरी तरह से दोषी करार देना भी उचित नहीं है। दरअसल, कुन्नूर में इस गलत परिपाटी में सभी पार्टियां कमोबेश शामिल हैं। हालांकि आज की तारीख में माकपा सभी विपक्षी दलों के निशाने पर है क्योंकि कुन्नूर में होने वाली राजनीतिक हत्याओं में माकपा कार्यकर्ताओं की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रदेश के तमाम सियासी दलों के पास कुन्नूर में अपने कार्यकर्ताओं की हत्या से संबंधित लंबी फेहरिस्त है। वे सीधे तौर पर इसके लिए माकपा को कसूरवार मानते हैं। यहां होने वाली ज्यादातर हत्याएं माकपा और आरएसएस-भाजपा कार्यकर्ताओं की हुई हैं। माकपा और इंडियन यूनाइटेड मुस्लिम लीग भी एक दूसरे के प्रति हमलावर हैं। कई जगहों पर कांग्रेस और माकपा के बीच भी हिंसक झड़पें होती हैं। हालांकि यहां आरएसएस-भाजपा और मुस्लिम लीग के बीच उतनी बड़ी सियासी रंजिश नहीं है क्योंकि इन संगठनों को एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगने का खतरा नहीं है। हाल के वर्षों में माकपा और आरएसएस-भाजपा के बीच सियासी रंजिश  इसलिए बढ़ी है क्योंकि केरल में भाजपा लगातार मजबूत हो रही है। भाजपा के इस उभार के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जमीनी कार्यों का योगदान है। केरल की मौजूदा सियासत में भाजपा को उन लोगों का समर्थन मिल रहा है जिनका वोट कभी माकपा के हिस्से में जाता था। जहां तक कांग्रेस की बात है तो केरल में उसे ज्यादातर हिंदुओं और ईसाइयों का वोट मिलता रहा है। मुस्लिम लीग के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से उसे मुसलमानों का भी वोट मिलता रहा है।

वामदलों की राजनीति पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भले ही एक जैसी है लेकिन केरल में उसकी राजनीति और एजेंडा पूरी तरह अलग है। धर्म को अफीम बताने वाले वामदलों को केरल में धार्मिक आयोजनों से कभी परहेज नहीं रहा। कुन्नूर में व्यापार करने वाले सुरेश गोपी के मुताबिक, ‘केरल के कम्युनिस्ट विशुद्ध हिंदूवादी हैं। इसलिए बड़ी संख्या में वाम कार्यकर्ता अपनी पार्टी छोड़कर आरएसएस और भाजपा में शामिल हो रहे हैं। कुन्नूर में एक और दिलचस्प बात है। यहां आप किसी भी इलाके में जाएंगे तो आपसे पहला सवाल पूछा जाएगा कि आपका संबंध किस पार्टी से है? तलेश्शरी कुन्नूर का वह तालुका है जहां हालिया वर्षों में सबसे ज्यादा राजनीतिक हत्याएं हुई हैं। इसी तरह कोझिकोड में मराड एक गांव है जहां सियासी रंजिश में कई लोगों की मौत हुई है।’

सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप निलसन के मुताबिक, ‘कोझिकोड में कट्टरपंथी मुसलमानों का एक अखबार है तेजस जो भड़काऊखबरों और आलेखों के लिए विवादों में रहा है। कई बार इस अखबार के दफ्तर में पुलिस का छापा पड़ा है। पूर्व मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन को केरल में सिद्धांतवादी और ईमानदार कम्युनिस्ट नेता माना जाता है। उन्हें इस बार मुख्यमंत्री न बनाए जाने से लोगों में काफी निराशा है। वहीं मौजूदा मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की छवि एक बाहुबली नेता की है। मूलत: कुन्नूर जिले से ताल्लुक रखने वाले विजयन कई गंभीर आरोपों का सामना भी कर रहे हैं।’

kunnur3इसमें कोई शक नहीं कि कुन्नूर में होने वाली ज्यादातर हत्याएं माकपा और आरएसएस-भाजपा  कार्यकर्ताओं की हुई है लेकिन कई दशक पहले तक कांग्रेस भी वही करती थी जो आज माकपा कर रही है। केरल समाजवादी जनपरिषद के अध्यक्ष विनोद पायडा बताते हैं, ‘पचास और साठ के दशक में कुन्नूर समेत पूरे मालाबार इलाके में सोशलिस्ट पार्टी का अच्छा-खासा असर था। यहां कांग्रेस कार्यकर्ता सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर ऐसे टूटते थे, मानो संसदीय राजनीति में उनकी कोई अहमियत ही नहीं है। वर्ष 1960 में समाजवादी चिंतक व राजनेता डॉ. राममनोहर लोहिया अपने कार्यकर्ताओं पर जारी हमलों से दुखी होकर कुन्नूर आए थे। पय्यनूर  स्थित गांधी मैदान में उन्होंने एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस की हिंसक राजनीति का विरोध किया था। कुन्नूर में सियासी कत्लेआम के लिए वैसे तो सभी दल जिम्मेदार हैं लेकिन इसकी शुरुआत कांग्रेस ने की थी।’

केरल भाजपा के वरिष्ठ नेता के. रंजीत ने ओपिनियन पोस्ट से बातचीत में बताया, ‘माकपा के नेतृत्व में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) की सरकार बनने के बाद भाजपा-आरएसएस के कार्यकर्ताओं पर हमले काफी बढ़ गए हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री पिनाराई खुद आरएसएस कार्यकर्ता वडिकल रामकृष्णन की हत्या में आरोपी हैं। 28 अप्रैल 1969 में हुई यह हत्या केरल में आरएसएस कार्यकर्ता की पहली हत्या थी। प्रदेश में अब तक 172 भाजपा-आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। सिर्फ कुन्नूर जिले में संगठन से जुड़े 80 लोगों को माकपा के लोगों ने मौत के घाट उतार दिया।’ भाजपा के स्थानीय नेता पीआर राजन के अनुसार, ‘माकपा नहीं चाहती कि केरल में उसके खिलाफ कोई दूसरी पार्टी उभरे। उसकी यह सोच लोकतांत्रिक नहीं है। केरल पुलिस को राजनीतिक संरक्षण हासिल है क्योंकि यहां कांग्रेस और माकपा की पुलिस मेंस एसोसिएशन है। अगर केरल में एलडीएफ की सरकार बनती है तो पुलिस माकपा के इशारे पर काम करती है और यूडीएफ की सरकार बनने पर पुलिस कांग्रेस के हाथों की कठपुतली बन जाती है। अगर केरल में पुलिस को स्वतंत्र रूप से काम करने दिया जाए तो शायद राजनीतिक हत्याएं बंद हो सकती हैं।’

कुन्नूर में जारी सियासी कत्लेआम को इंडियन यूनाइटेड मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इसके लिए माकपा को कसूरवार मानती है। पार्टी महासचिव एडवोकेट अब्दुल करीम ने ओपिनियन पोस्ट को बताया कि पिछले दो दशकों में उनके कई कार्यकर्ताओं  की हत्या माकपा के कारकुनों ने की है। उनके मुताबिक, ‘माकपा की सरकार बनने के बाद कुन्नूर में अलग-अलग पार्टियों के छह लोगों की हत्याएं हुर्इं जबकि साढ़े तीन सौ लोगों पर जानलेवा हमले हुए हैं। अभी हाल में मुस्लिम लीग के तीन युवा कार्यकर्ताओं की हत्या माकपा के लोगों ने कर दी। सत्तर के दशक में कालीकट में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए जिसमें सैकड़ों बेगुनाह लोगों की जानें गर्इं। इस फसाद की जड़ में कोई और नहीं बल्कि माकपा थी। माकपा  खुद को धर्मनिरपेक्ष बताती है लेकिन कालीकट दंगे का जब भी जिक्र आता है उनके नेता खामोश हो जाते हैं। दरअसल, मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं पर माकपा समर्थक इसलिए हमला करते हैं क्योंकि मुसलमानों का एकमुश्त वोट मुस्लिम लीग को जाता है। माकपा इसमें सेंध लगाना चाहती है लेकिन उसके सारे प्रयास अब तक विफल साबित हुए हैं।’

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कुन्नूर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के. सुरेंद्रन भी राजनीतिक हत्याओं के लिए माकपा को ही जिम्मेदार मानते हैं। उनके अनुसार, ‘वामपंथ का सिद्धांत ही हिंसा पर आधारित है। कहने को वामपंथी पार्टियां चुनाव लड़ती हैं लेकिन लोकतंत्र पर उनका कोई भरोसा नहीं है। अपने राजनीतिक विरोधियों को वामदल शत्रु समझते हैं।’ गौरतलब है कि वर्ष 1973 से लेकर 2016 तक कुल 43 कांग्रेस कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुर्इं जबकि ढाई सौ लोगों पर कातिलाना हमले हुए। कुन्नूर में जारी राजनीतिक हत्याओं और माकपा पर उठ रहे सवाल के बीच जब ओपिनियन पोस्ट स्थानीय माकपा दफ्तर पहुंचा तो वहां मौजूद नेताओं ने इस मुद्दे पर बात करने से मना कर दिया। दफ्तर से बाहर निकलते समय एक कार्यकर्ता ने माकपा के मुखपत्र ‘देशाभिमानी’ के कार्यालय जाने की सलाह दी। बतौर लाइब्रेरियन वहां कार्यरत अजिंद्रन ने कहा कि भाजपा और आरएसएस का यह आरोप गलत है कि उनके कार्यकर्ताओं की हत्या में माकपा से जुड़े लोग शामिल हैं। उनके मुताबिक, ‘1994 से लेकर 2016 के बीच 53 माकपा कार्यकर्ताओं की हत्या आरएसएस और भाजपा समर्थकों ने कर दी। कुन्नूर में किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े लोगों की हत्या होने पर विपक्षी पार्टियां बगैर किसी ठोस सबूत के माकपा पर आरोप मढ़ देती हैं।’

साक्षात्कार – जे. नंदकुमार, आरएसएस के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख

खून से सने हैं मुख्यमंत्री के हाथ

माकपा और आरएसएस कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा की मुख्य वजह क्या है? इस खूनी संघर्ष में आपके कितने कार्यकर्ताओं की मौत हुई?
कम्युनिस्ट पार्टियों की बुनियादी विचारधारा हिंसा पर आधारित है। कम्युनिस्ट पार्टियां वर्ग संघर्ष की बात करती है जबकि आरएसएस वर्ग समन्वय के सिद्धांतों पर अमल करता है। हमारी और उनकी विचारधारा में यह महत्वपूर्ण बुनियादी फर्क है। केरल में माकपा आरएसएस और भाजपा के उभार को सहन नहीं कर पा रही है। यही वजह है कि हमारे कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले होते हैं। बावजूद इसके केरल में आरएसएस की शाखाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है। आरएसएस की सर्वाधिक शाखाएं केरल में हैं। केरल में पिछले पांच दशक में आरएसएस के 268 सदस्यों की हत्या हुई है। इनमें करीब ढाई सौ लोग माकपा कार्यकर्ताओं द्वारा मारे गए हैं। इसके अलावा हमारे उन स्वयंसेवकों की संख्या सैकड़ों में है जो गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं या फिर जीवन भर के लिए अपाहिज।
क्या स्थानीय पुलिस आरोपियों पर उचित कार्रवाई करती है?kunnur-rss
राजनीतिक हत्याओं के बाद पुलिस कार्रवाई तो करती है लेकिन उन लोगों को छोड़कर जो खूनी वारदात में मुख्य रूप से शामिल होते हैं। सूबे की पुलिस सरकार के इशारों पर काम करती है। जिन हत्याओं में माकपा के कार्यकर्ता शामिल रहे हैं उन मामलों में पुलिस की कार्रवाई धीमी रही है। हिंसक वारदातों के बाद पुलिस लोगों को गिरफ्तार तो करती है लेकिन ठोस सबूत के अभाव में अधिकांश आरोपी अदालत से बरी हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि हमलावरों को माकपा सरकार का खुला समर्थन हासिल है।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कार्यकर्ताओं से आक्रामक होकर आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटने का आह्वान किया है। क्या आपको नहीं लगता कि इससे राज्य में हिंसक घटनाओं में वृद्धि होगी?
बेहतर होता कि आप यह सवाल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से ही करते। केरल में आरएसएस की मौजूदगी दशकों से है। आरएसएस मानवता और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित है। हम लोग बिना किसी प्रचार के जन कल्याण के प्रति समर्पित हैं। सभी पार्टियां चुनाव में कामयाब होना चाहती हैं। भाजपा भी धीरे-धीरे अपना विस्तार कर रही है। कार्यकर्ताओं से अगले चुनाव की तैयारियों में जुटने का आह्वान करना कोई गलत नहीं है।
आरएसएस और भाजपा में बड़ी संख्या में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता एवं कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं, ऐसा क्यों?
वामपंथ की नर्सरी रहा केरल हालिया वर्षों में इस्लामी आतंकवाद का गढ़ बनता जा रहा है। यही वजह है कि यहां के हिंदू खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। माकपा का हिंदू विरोधी चेहरा अब सामने आ चुका है। उसकी सरकार बनने के बाद प्रदेश में जिस तरह हत्याओं एवं भ्रष्टाचार का दौर शुरू हो जाता है उससे यहां के लोगों में काफी निराशा है। यहां माकपा और भाकपा में भी काफी सियासी रंजिश है। माकपा के कार्यकर्ता भाकपा से जुड़े लोगों पर भी हमला करते हैं। यह भी एक वजह है भाकपा से जुड़े काफी लोग संघ में शामिल हो रहे हैं। जिस तरह वामदलों के नेता आरएसएस में शामिल हो रहे हैं उससे माकपा में घबराहट पैदा हो गई है। यही वजह है कि वह हमारे लोगों पर सुनियोजित हमला कर रही है।
राजनीतिक हत्याओं को रोकने में राज्य सरकार क्या ठोस कदम उठा रही है?
मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के हाथ खुद आरएसएस के कार्यकर्ता के खून से सने हैं। 28 अप्रैल 1969 को आरएसएस कार्यकर्ता वडिक्कल रामकृष्णन की हत्या में विजयन को आरोपी बनाया गया था लेकिन सरकारी मशीनरी का फायदा उठाते हुए वे अदालत से बरी हो गए। प्रदेश की जनता उन्हें आज भी रामकृष्णन का हत्यारा मानती है। रामकृष्णन पहले माकपा के सदस्य थे जो बाद आरएसएस में शामिल हो गए थे। यही बात पिनाराई विजयन समेत अन्य माकपा नेताओं को नागवार गुजरी थी और उन्होंने रामकृष्णन की बेरहमी से हत्या कर दी थी।

 

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कुन्नूर विश्वविद्यालय के छात्र एस. कृष्णन यहां होने वाली हत्याओं के लिए वोट बैंक की राजनीति को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है, ‘केरल में शिक्षा अधिक है लेकिन रोजगार के अवसर बेहद कम हैं। इसलिए यहां के ज्यादातर लोग खाड़ी देशों में काम करने को मजबूर हैं।  कुन्नूर, कोझिकोड और वायनाड में कॉफी, मसाले और रबड़ की खेती अधिक होती है लेकिन इससे संबंधित कोई फैक्ट्री यहां नहीं है। गांवों में बेरोजगारी अधिक है इसलिए लोग अपने फायदे के लिए राजनीतिक दलों में शामिल होते हैं। चुनाव के समय इन कार्यकर्ताओं का गलत इस्तेमाल होता है।’

राजनीतिक हत्याओं पर सियासी दलों का आरोप है कि स्थानीय पुलिस ऐसी घटनाओं को रोकने में नाकाम साबित हुई है। पुलिस राजनीतिक संरक्षण में काम करती है इसलिए दोषियों के ऊपर उचित कार्रवाई नहीं होती। ओपिनियन पोस्ट से बातचीत में कुन्नूर के पुलिस अधीक्षक कोरी संजय कुमार गुरुदीन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा, ‘स्थानीय पुलिस बगैर किसी पक्षपात के राजनीतिक हत्या में शामिल लोगों पर कानून के तहत कार्रवाई करती है। कुन्नूर में होने वाली सभी हत्याएं राजनीतिक नहीं हैं लेकिन सियासी फायदे के लिए इन हत्याओं को राजनीतिक रंग दे दिया जाता है।’ उन्होंने वर्ष वार हुई हत्याओं के संबंध में एक आंकड़ा पेश किया लेकिन राजनीतिक दलों को इस आंकड़े पर भरोसा नहीं है। भाजपा और कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि स्थानीय पुलिस माकपा सरकार के दबाव में राजनीतिक हत्याओं से जुड़े आंकड़ों को कम करके बता रही है। कुन्नूर पुलिस अधीक्षक कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक, वर्ष 1991 से 2016 के बीच कुन्नूर में कुल 104 राजनीतिक हत्याएं हुर्इं। मरने वालों में सबसे ज्यादा 42 माकपा से जुड़े कार्यकर्ता थे जबकि भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं की संख्या 41, कांग्रेस के 15 एवं मुस्लिम लीग से जुड़े चार और अन्य पार्टियों से संबंधित दो लोग शामिल हैं। पुलिस अधीक्षक के मुताबिक, 1 मई 2016 से 16 सितंबर 2016 के बीच कुन्नूर में राजनीतिक हिंसा की 301 घटनाएं हुर्इं। इन मामलों में सर्वाधिक 485 माकपा से जुड़े नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया जबकि भाजपा और आरएसएस से जुड़े 190, कांग्रेस के 42 एवं अन्य दलों से संबंधित 113 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

kunnur2तीन दिन में दो हत्या

अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में एक माकपा और एक भाजपा कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई। 52 वर्षीय के. मोहनन माकपा की कुन्नूर इकाई से जुड़े थे। एक भीड़-भाड़ वाले इलाके में उनकी दुकान थी। हमेशा की तरह वे अपनी दुकान पर बैठे थे। इसी बीच कुछ हथियारबंद लोगों ने उन पर हमला कर दिया। माकपा का आरोप है कि इस हमले के पीछे भाजपा का हाथ है। इस घटना के दो दिन बाद ही 26 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता रेमित की हत्या कर दी गई। रेमित पेशे से  ड्राइवर था। उसकी हत्या उस वक्त हुई जब वह एक पेट्रोल पंप पर अपनी गाड़ी में तेल भरा रहा था। ये दोनों हत्याएं मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के विधानसभा क्षेत्र धर्माडम में हुई हैं। इन हत्याओं के बाद माकपा और भाजपा ने केरल बंद का आह्वान भी किया था। इसे लेकर कुन्नूर समेत कई जिलों में हिंसा की छिटपुट घटनाएं भी हुर्इं। इन घटनाओं के बाद सत्ताधारी एलडीएफ सरकार विपक्षी पार्टियों समेत आम लोगों के निशाने पर आ गई है। स्थानीय कारोबारियों और आम लोगों का आरोप है कि सरकार हिंसक घटनाओं को रोकने में नाकाम साबित हो रही है।  इन आरोपों में दम इसलिए भी दिखता है कि इसी साल मई में वाम सरकार के सत्ता में आने के बाद से अब तक कुन्नूर जिले में 300 से ज्यादा राजनीतिक हमले और छह हत्याएं हो चुकी हैं। बावजूद इसके मुख्यमंत्री ने इस बाबत अभी तक न तो कोई सर्वदलीय बैठक की और न कोई उच्चस्तरीय बैठक बुलाई। भाजपा, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं का कहना है कि मौजूदा वाम सरकार में विपक्षी पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता असुरक्षित हैं।

जयकृष्णन की हुई थी बर्बर हत्या

1 दिसंबर 1999 को कुन्नूरवासी शायद ही कभी भुला पाएंगे। केटी. जयकृष्णन कुन्नूर स्थित एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक थे। साथ ही वह भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष भी थे। उस दिन वे हमेशा की तरह स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे थे। इसी बीच माकपा से जुड़े दर्जन भर हथियारबंद लोग क्लास में घुसे और छोटे-छोटे बच्चों के सामने ही उनकी बेरहमी से हत्या कर दी। इस घटना को अंजाम देने के बाद हमलावरों ने क्लास के ब्लैक बोर्ड पर एक धमकी भरा संदेश भी लिख दिया कि इस मामले में गवाही देने वालों का यही हाल किया जाएगा।

हर आंगन में मातम

कुन्नूर जिले का तलेश्शरी और पय्यनूर तालुका राजनीतिक हत्याओं का केंद्र बन चुका है। पिछले कुछ दशकों में यहां विभिन्न राजनीतिक दलों से संबंधित सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। अन्नूर गांव में 11 जुलाई, 2016 को भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) से जुड़े आॅटो ड्राइवर सीके रामचंद्रन की हत्या रात करीब साढ़े ग्यारह बजे माकपा के आधा दर्जन हथियारबंद लोगों ने घर में घुसकर कर दी। उनके घर में अब विधवा पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं। इस घटना के बाद आरएसएस ने रामचंद्रन के पीड़ित परिवार को बीस लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी लेकिन उनकी गैर-मौजूदगी  इस परिवार को बराबर सालती रहेगी। अन्नूर गांव से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर रामंदली गांव में उसी दिन माकपा कार्यकर्ता सीवी धनराज की हत्या आरएसएस से जुड़े कार्यकर्ताओं ने कर दी। मजदूरी करने वाले धनराज के दो बेटे हैं जिनकी उम्र दस साल और ढाई साल है। माकपा की ओर से धनराज के पोस्टर तो पूरे कुन्नूर जिले में चस्पा कर दिए गए हैं लेकिन पीड़ित परिवार को कोई मुआवजा नहीं मिला है। धनराज की पत्नी सजनी के मुताबिक, माकपा से जुड़े नेता घर आकर सांत्वना तो दे रहे हैं लेकिन किसी ने भी आर्थिक मदद का भरोसा नहीं दिया।

भाजपा ने बनाई समिति

राजनीतिक हत्याओं से आहत प्रदेश भाजपा ने इस बाबत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार लगाई है। पार्टी की केंद्रीय समिति ने इस मामले की संजीदगी को देखते हुए हिंसक घटनाओं की पड़ताल के लिए पार्टी महासचिव भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय समिति गठित की है। इस समिति में सांसद मीनाक्षी लेखी, अनंत हेगड़े, एच. राजा और नलिन शामिल हैं। यह समिति अगले कुछ महीने में पार्टी को कुन्नूर में जारी सियासी कत्लेआम से संबंधित रिपोर्ट पेश करेगी। इस मुद्दे पर बीते दिनों केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से बातचीत भी की थी। सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने राजनाथ को यकीन दिलाया है कि हिंसक घटनाओं के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ राज्य सरकार कठोर कार्रवाई करेगी।

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हड़ताल मालाबार की नियति

कुन्नूर समेत केरल के आम आदमी और कारोबारी यहां होने वाली हड़ताल से खासे परेशान हैं। राज्य के किसी भी इलाके में राजनीतिक हत्याओं के बाद संबंधित पार्टी अगले दिन बंद का ऐलान करती है। दरअसल, इसके पीछे उनकी अपनी राजनीति और शक्ति प्रदर्शन है। कुन्नूर में बेकरी व्यवसाय से जुड़े अकरम शकील बताते हैं, ‘ऐसा कोई महीना नहीं जाता जब कुन्नूर और मालाबार इलाके में हड़ताल न हुई हो। बंद और चक्का जाम से यहां के लोगों को बेशुमार कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अगर कोई दुकानदार हड़ताल की परवाह किए बगैर अपनी दुकान खोलता है तो राजनीतिक दलों से जुड़े लोग दुकान में घुसकर तोड़फोड़ और लूटपाट करते हैं। नतीजतन सभी छोटे-बड़े कारोबारी हड़ताल के दिन अपनी दुकानें बंद करने में ही भलाई समझते हैं। अगर आप साल भर का आकलन करें तो केरल में हड़ताल और बंद की वजह से करोड़ों रुपये का नुकसान होता है।’

आम कार्यकर्ता ही शिकार

केरल में पिछले कुछ दशकों के दौरान जितनी भी राजनीतिक हत्याएं हुई हैं उनमें गौर करने वाली बात यह है कि मारे गए सभी लोग चाहे वे किसी भी दल के हों आम कार्यकर्ता ही थे। मरने वालों की सूची में किसी भी पार्टी के किसी बड़े नेता का नाम नहीं है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि सियासी कत्लेआम में नेता अपने फायदे के लिए गरीब और साधारण कार्यकर्ताओं को मौत के मुंह में धकेल रहे हैं। भाजपा, आरएसएस, माकपा, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के पास इस बात कोई मुकम्मल जवाब नहीं है कि आखिर जब कुन्नूर और मालाबार इलाके में इतने बड़े पैमाने पर राजनीतिक हत्याएं हो रही हैं तो उसका शिकार कोई बड़ा नेता क्यों नहीं होता? आखिर मौत मामूली कार्यकर्ताओं के हिस्से ही क्यों आती है? इस सवाल का जवाब उन सभी दलों को देना चाहिए जो हत्याओं पर राजनीति करते हैं। 

साक्षात्कार – एमके अब्दुल कादर, कुलपति, कुन्नूर विश्वविद्यालय

सियासी कत्लेआम शर्मनाक

कुन्नूर और कोझिकोड इलाकों में राजनीतिक हत्याएं कई दशकों से जारी है। आखिर इसकी वजह क्या है?kunnur-vc
यहां जारी सियासी फसाद से पहले मैं आपको मालाबार क्षेत्र के इतिहास के बारे में थोड़ा बताना चाहूंगा। कई सौ साल पहले कोझिकोड यानी कालीकट में नायर शासकों का साम्राज्य हुआ करता था। यहां के राजा सामुथ्री वंश से संबंध रखते थे। सत्ता हासिल करने के लिए इस राजवंश का संघर्ष चेरा नामक एक लड़ाकू जाति से होता था। इन लोगों के बीच युद्ध के अपने कुछ खास नियम और अनुशासन थे। ये लोग साल में एक बार लड़ाई लड़ते थे। उस युद्ध को मामंगम कहा जाता था जो आज भी कुन्नूर समेत पूरे मालाबार इलाके में एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। मामंगम युद्ध में हमेशा सामुथ्री राजवंश की विजय होती थी लेकिन पराजय के बावजूद चेरा समुदाय ने कभी हार नहीं मानी। इतिहासकारों के मुताबिक, आजादी के बाद तक यानी जमींदारी उन्मूलन से पहले तक मालाबार इलाके में वर्चस्व के लिए इन दोनों कौमों के बीच युद्ध होते रहे हैं। मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि मालाबार क्षेत्र के लोगों में हिंसक प्रवृति की भावना प्रबल है लेकिन कुछ हद तक इसमें सच्चाई जरूर है कि यह क्षेत्र सैकड़ों सालों से अशांत और लड़ाईयों की जद में रहा है।
सियासी हिंसा के लिए सभी दल माकपा के लोगों को जिम्मेदार मानते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है?
यह बात सही है कि ज्यादातर राजनीतिक हत्याओं में माकपा कार्यकर्ता शामिल रहे हैं लेकिन इस आरएसएस, भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता भी कम दोषी नहीं हैं। जिन इलाकों में माकपा का वर्चस्व है वहां उनके कार्यकर्ता हिंसक घटनाओं को अंजाम देते हैं। उसी तरह जिन क्षेत्रों में भाजपा और आरएसएस का दखल है वहां उनके समर्थक माकपा से जुड़े लोगों पर हमला करते हैं। पहले कांग्रेस और माकपा के बीच झड़पें होती थी लेकिन अब यह लड़ाई आरएसएस और माकपा के बीच केंद्रित हो गई है। इसमें कोई शक नहीं कि आरएसएस और भाजपा केरल में मजबूत हुई है। हालिया चुनावों पर अगर गौर करें तो भाजपा को चुनावी फायदा बेशक नहीं हुआ लेकिन उसके वोट फीसद में इजाफा जरूर हुआ है। केरल में भाजपा की यही मौजूदगी माकपा को रास नहीं आ रही है। नतीजतन इन दोनों संगठनों के बीच हिंसक झड़पें लगातार बढ़ रही हैं।
कुन्नूर को मौत का मरकज भी कहा जाने लगा है। इस नकारात्मक छवि से उबरने का कोई रास्ता है?
कुन्नूर में जारी सियासी कत्लेआम से पूरा केरल शर्मसार है। देश में इसे लेकर सूबे की गलत छवि सामने आ रही है। मेरे ख्याल से जम्हूरियत में हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। इसका इल्म हर उन पार्टियों को होना चाहिए जो केरल की राजनीति में सक्रिय हैं। सभी राजनीतिक दलों की अपनी विचारधाराएं होती हैं। हर व्यक्ति चाहे वह किसी भी दल से जुड़ा हो उसके लिए अपनी पार्टी की विचारधारा महत्वपूर्ण होती है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम उन विचारधारा या उस पार्टी के नेताओं से नफरत करें जिनसे हमारा वैचारिक सामंजस्य नहीं है। अफसोस की बात है कि आज केरल में यही हो रहा है। कुन्नूर में होने वाली राजनीतिक हत्याओं को रोका जा सकता है लेकिन इसके लिए सभी सियासी दलों को आपसी मतभेद भुलाकर दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देना होगा। मौत का यह सिलसिला नहीं थमा तो इसकी कीमत सभी राजनीतिक दलों को चुकानी पड़ेगी। आज हर दलों के साधारण कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है लेकिन कल इन्हीं दलों के बड़े नेताओं का बेरहमी से सरेआम कत्ल किया जा सकता है।

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