बैंकों में फ्रॉड की बीमारी बड़ी पुरानी

ओपिनियन पोस्ट
Wed, 21 Mar, 2018 13:13 PM IST

अरुण पांडेय

रिजर्व बैंक गवर्नर का पद छोड़ने से कुछ दिन पहले एक कांफ्रेंस में रघुराम राजन ने माना था कि बैंकों के खराब लोन के लिए कुछ हद तक इकोनॉमी में आया दबाव जिम्मेदार होता है। लेकिन खराब लोन के लिए अकसर बैंक भी जिम्मेदार होते हैं जो बिना सोचे समझे अंधाधुंध कर्ज बांट देते हैं। उन्होंने माना था कि सबसे ज्यादा खराब लोन 2007-08 में दिए गए। उनकी अच्छे से निगरानी नहीं की गई।

दुनिया की बैंकिंग इंडस्ट्री में ज्यादातर फ्रॉड बैंकों के नियमों के सहारे ही हुए हैं। बीस साल पहले ब्रिटेन के पुराने बैंक बेरिंग्स को सिंगापुर के एक ट्रेडर ने अवैध ट्रेडिंग करके 130 करोड़ डॉलर का चूना लगाया था। 2008 में फ्रांस के एक बड़े बैंक सोसायटी जनरल को इसी तरह की ट्रिक से 5 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था। 2008 में ही अमेरिकी बैंक लीमन का संकट सबको मालूम होगा। फिर भी 2011 में स्विट्जरलैंड के बड़े बैंक यूबीएस को एक ट्रेडर ने 2 अरब डॉलर का झटका दिया था। मतलब ये है कि बैंकों में फ्रॉड की कहानी ग्लोबल है। ये सच है कि कोई भी फ्रॉड बैंक अधिकारियों की मिलीभगत के बगैर मुमकिन नहीं है। इसलिए इनके सामने आने में वक्त लग जाता है। भारत में इस कहानी में एक ट्विस्ट भी है। भारत की बैंकिंग स्टोरी में बड़ा खेल एनपीए का है जिसे पूरी गंभीरता से बैंकों ने सिस्टम के साथ रहकर अंजाम दिया।

अंधाधुंध बांटे कर्ज
बैंक अपना कारोबार बढ़ाने के लिए कर्ज देते हैं क्योंकि यही उनका बिजनेस मॉडल है। खेल भी इसी में होता है। कारोबारियों से मिलकर और कई बार सत्ता के दबाव में ऐसे बिजनेस को कर्ज दे दिया जाता है जिसका मकसद ही बैंकों को चूना लगाना होता है। बैंकों के फ्रॉड को बाहर आने में वक्त लगता है इसलिए ये पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है, मौजूदा सरकार या पिछली सरकार। साल 2004 तक भारत की अर्थव्यवस्था शानदार तरीके से आगे बढ़ रही थी। अगंभीर कॉरपोरेट ने बैंकों के साथ मिलकर बिजनेस की ग्रोथ को ध्यान में रखे बगैर जमकर कर्ज लिए। बढ़ते-बढ़ते अब स्थिति ये है कि सरकारी बैंकों का यही कर्ज एनपीए यानी फंसा कर्ज बन गया है जिसकी वापसी की उम्मीद कम होती जा रही है।

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ये सच है कि सड़कें होंगी तो एक्सीडेंट भी होंगे, इसलिए बैंक में फ्रॉड को पूरी तरह रोकना भले मुमकिन न हो पर ऐसा भी न हो कि फ्रॉड से पूरा बैंकिंग सिस्टम ही तहस नहस हो जाए। भारत का बैंकिंग सिस्टम इन दिनों इसी बीमारी का शिकार है। कॉरपोरेट को जो कर्ज बिजनेस बढ़ाने के लिए दिए गए थे वो एनपीए की शक्ल में सामने हैं। कर्ज देते वक्त तहकीकात नहीं की गई या जानबूझकर इस बात की अनदेखी की गई कि कारोबार में दम है या नहीं। फिर इन्हें लगातार छिपाया गया। अब जब रिजर्व बैंक और नए कानूनों की वजह से सिस्टम क्लीन होना शुरू हुआ तो फंसे कर्ज का आकार प्रकार बढ़ता ही गया।

पुराना पाप तो नहीं भुगत रहे बैंक
पीएनबी घोटाले के बाद बैंकों के एनपीए को लेकर बहुत सवाल उठ रहे हैं। कोई कह रहा है कि मोदी सरकार का निगरानी सिस्टम फेल हुआ तो कोई लापरवाही लेकिन ये जान लीजिए कि एनपीए और फ्रॉड दो साल चार साल में नहीं होते। कई बार इनका इतिहास बहुत पुराना रहता है। ये धीरे-धीरे सामने आते हैं। अभी बैंकों के जो रोग सामने आ रहे हैं इनमें से ज्यादातर की बीमारी पांच से दस साल पहले की है। समस्या पुरानी और कितनी गहरी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाइए कि सरकारी बैंकों को पटरी पर लाने के लिए सरकार को करीब पांच लाख करोड़ रुपये देने होंगे। मोदी सरकार ने 2017 में ही सभी सरकारी बैंकों को 2.11 लाख करोड़ रुपये देने का फैसला किया है लेकिन जानकारों का अनुमान है कि सरकारी बैंकों की सेहत सुधारने के लिए पांच लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी।

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बैंकों पर रिसर्च करने वाली एजेंसी एमके ग्लोबल के मुताबिक, खराब लोन की रिकवरी बड़ी मुश्किल है। इसमें चौथाई या आधे से ज्यादा की वसूली की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। ऐसे में बैंकों को काम चलाने के लिए भारी भरकम रकम की जरूरत होगी। आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2017 तक बैंकों का 9.6 लाख करोड़ रुपये का खराब लोन है। सरकारी बैंकों में खराब लोन की रकम 7 लाख 34 हजार करोड़ रुपये जबकि प्राइवेट बैंकों का खराब लोन करीब एक लाख करोड़ रुपये था। करीब 2.6 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को पुनर्गठित किया गया है। अब इतने खराब लोन से बैंकों पर दबाव तो बढ़ना ही है। इसलिए सरकार को बड़ी रकम इन्हें देनी होगी। पीएनबी में जिस तरह का फ्रॉड हुआ है उसे देखते हुए लगता है कि मौजूदा हालात में सरकारी बैंकों के खराब लोन का 75 फीसदी तक डूबने का खतरा है।

कहां से आएंगे 4.7 लाख करोड़
देश का सबसे बड़ा बैंक भारतीय स्टेट बैंक नुकसान उठा रहा है। दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक पीएनबी भारी भरकम घोटाले का शिकार हो गया है। ऐसे में सरकार ने जो 2.11 लाख करोड़ रुपये की पूंजी देने का फैसला किया है उससे काम चलने वाला नहीं है। बैंकों को अभी 2.6 लाख करोड़ रुपये की और जरूरत होगी। वैसे नाकामी की वजह से सरकारी बैंकों का जो बुरा हाल हुआ है उसे सुधारने के लिए सरकार 11 साल में 2 लाख 60 हजार करोड़ रुपये पहले ही बैंकों को दे चुकी है।

कैसे सुधरेगा सिस्टम?
बैंकों की निगरानी व्यवस्था बहुत कमजोर, इस पर ध्यान नहीं दिया गया
दोबारा ऐसे घोटाले नहीं होंगे इसकी गारंटी नहीं
सब ठीक रहा तो बैंकों को ठीक होने में 18 से 24 महीने लगेंगे
सरकारी बैंकों के मैनेजमेंट कई सालों से कह रहे हैं कि एनपीए अब नहीं बढ़ेंगे पर लगातार बढ़ रहे हैं
रिजर्व बैंक की नई गाइडलाइंस के बाद खराब लोन छिपाना होगा मुश्किल और एनपीए बढ़ेंगे

कर्ज का खेल
कर्ज लेने से पहले कई कॉरपोरेट बैंकों की मिलीभगत से अपनी संपत्ति का आकलन बढ़ा-चढ़ा कर करा लेते हैं और उस आधार पर उन्हें ज्यादा राशि का कर्ज मंजूर हो जाता है। पहले तो वे सब्सिडी का फायदा लेते हैं, उसके बाद खुद को डिफॉल्टर की श्रेणी में डलवाकर या नुकसान खातों की श्रेणी में आ जाते हैं। डिफॉल्ट करने के बाद जब वे संपत्ति का आकलन कराते हैं तो वह पहले की तुलना में काफी कम निकलती है। इस स्थिति में बैंक के पास सिर्फ एक ही चारा बचता है कि वह संबंधित संपत्ति की नीलामी से मिलने वाली रकम को लेकर समझौता करे और शेष बची रकम को डूबा मान ले।

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बकाया से बचने को डूबा कर्ज
बैंक अधिकारी बताते हैं कि कोई भी बैंक नहीं चाहता कि उसके बैलेंस शीट में बकाया नजर आए। कर्ज लेने वाले इसका फायदा उठाते हैं। वे बैंक से कर्ज माफ करने की मांग करते हैं और बैंक अधिकारी भी निगरानी बढ़ने से रकम डूबी दिखा देते हैं। ये हालात बैंकिंग के लिए अच्छी नहीं है क्योंकि जिस रकम को डूबा दिखाया जा रहा है वो आखिरकार आम जमाधारकों के हिस्से का है। इससे आम ग्राहकों का बैंकों से भरोसा कम होगा। इतना ही नहीं बैंकों के दिवालियेपन की ओर बढ़ने का यह एक बड़ा खतरा भी हो सकता है। सरकार ने जो नया सिस्टम बनाया है उसके तहत बैंक किसी भी तरह से कर्जे को छिपा नहीं पाएंगे। इसलिए भी अचानक एनपीए में रफ्तार दिख रही है क्योंकि बैंक पहले बैलेंस शीट में इसे छिपाते रहे हैं।

हालांकि खराब लोन रोकने पर सख्ती के दूसरे साइड इफेक्ट भी हैं। इससे बैंक कर्ज देने में बहुत सुरक्षात्मक हो जाएंगे जो इंडस्ट्री खासतौर पर छोटे उद्यमियों के लिए बहुत नुकसान वाली स्थिति होगी। बैंकों को बेलेंसशीट साफ रखने के साथ-साथ अपने रुख में भी संतुलन बनाना होगा वरना आसमान से गिरे और खजूर में अटके जैसी स्थिति होने का खतरा है।

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