छत्तीसगढ़- ठेके की शिक्षा पर संकट

ओपिनियन पोस्ट
Tue, 09 Jan, 2018 17:21 PM IST

रमेश कुमार ‘रिपु’

बेमेतरा जिला निवासी तृतीय वर्ग की शिक्षाकर्मी भुनेश्वरी साहू अपनी 15 महीने की बेटी को लेकर धरने में आई थीं। वह कहती हैं, ‘मुझे अपनी बेटी के भविष्य की चिंता है। यह अभी छोटी है। नहीं जानती कि उसकी मां यहां घंटों क्यों बैठी रहती है। एक जगह बैठे-बैठे बिटिया परेशान हो जाती है, रोने लगती है। भीड़ देखकर घर जाने की जिद करने लगती है। यह जब बड़ी होगी तब समझेगी कि मां किसके लिए घंटों धरने पर बैठी थी। संविलियन (समाहित) का अधिकार मां ने लिया था तब उसके भविष्य ने सुरक्षित और बेहतर आकार लिया।’ यह कहानी केवल भुनेश्वरी साहू की नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ के हजारों शिक्षाकर्मी इसी तरह की स्थिति से दो चार हैं। दरसअल, शिक्षाकर्मियों की अपनी मांगों को लेकर लड़ाई आज की नहीं है। मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ बनने के 17 साल तक लगातार अपनी मांगों को लेकर समय समय पर शिक्षाकर्मी एक हुए और अपनी मांगें मनवाई। पिछले महीने शिक्षाकर्मियों ने एक बार फिर राजधानी रायपुर में बड़ा आंदोलन शुरू कर सरकार को अपनी ताकत दिखाई। विपक्ष ने उनके आंदोलन को समर्थन देकर उसे सियासी रंग दिया तो सरकार हरकत में आ गई। आनन फानन में उनके आंदोलन को कुचल दिया। प्रदेश स्तर के बड़े शिक्षाकर्मी नेताओं को जेल में डाल दिया। हजारों शिक्षकों के साथ अमानवीय व्यवहार सिर्फ इसलिए किया गया कि सरकार को झुकना न पड़े। संविलियन और समान काम समान वेतन की मांग को लेकर उनका आंदोलन एक बार फिर टूट गया।

कांग्रेस पार्टी अगर शिक्षाकर्मियों के आंदोलन को समर्थन देने और पांच दिसंबर को प्रदेश व्यापी बंद का आह्वान न करती तो इस मामले पर सियासत तेज न होती। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने नगरीय निकायों, जिला और जनपद पंचायत के कांग्रेस प्रतिनिधियों को शिक्षाकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का फरमान जारी कर चुनाव से पहले उन्हें अपने पक्ष में करने का बड़ा दांव खेला। भूपेश बघेल और छत्तीसगढ़ जन कांग्रेस (छजका) सुप्रीमो अजीत जोगी ने कहा उनकी सरकार बनी तो एक घंटे में संविलियन कर दिया जाएगा। प्रदेश में एक लाख 80 हजार ठेके वाले शिक्षाकर्मी हैं जो एक बहुत बड़ा वोट बैंक है। इन्हें शासकीय शिक्षाकर्मी नहीं माना जाता है बल्कि ये पंचायत के अधीन हैं। विपक्ष को वोट बैंक की राजनीति करता देख रमन सिंह सरकार ने प्रांतीय नेताआें को जेल में बुलाकर एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर करवा हड़ताल खत्म करा ली। विपक्ष औंधे मुंह गिर गया। लेकिन सवाल अब भी अपनी जगह है कि प्रदेश के 44 फीसदी स्कूलों में बिजली की सुविधा नहीं है, 50 फीसदी के पास खेल का मैदान नहीं है, 42 फीसदी स्कूलों में चहारदीवारी नहीं है, मात्र 3 फीसदी स्कूलों में कम्प्यूटर है, 13,117 पूर्व माध्यमिक शालाओं में प्रधान पाठक के 4,296 पद खाली हैं, 34,259 पद शिक्षकों के खालीहैं, पंचायत शिक्षकों के कुल 28,210 पद खालीहैं, 30,371 प्राथमिक शालाओं में प्रधान पाठक के 18,363 पद खाली हैं, बावजूद इसके सरकार ठेके के शिक्षाकर्मियों के सहारे शिक्षा व्यवस्था को सुधारना चाहती है। शिक्षकों की कमी और उनकी बदहाली से प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है।

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हड़ताल के बाद फूट
शिक्षाकर्मी 20 नवंबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल कर रहे थे जो चार दिसंबर को अचानक खत्म हो गई। हड़ताल खत्म होने के बाद शिक्षाकर्मियों के संयुक्त मोर्चा के प्रांतीय संचालकों में सिर फुटौव्वल शुरू हो गया। पांच अलग-अलग संगठन वीरेंद्र दुबे के शालेय शिक्षक संघ, संजय शर्मा के छत्तीसगढ़ नगरीय निकाय शिक्षाकर्मी पंचायत संघ, केदार जैन के संयुक्त शिक्षाकर्मी संघ, विकास राजपूत के नवीन शिक्षाकर्मी संघ और चंद्रदेव राय के प्रदेश शिक्षक नगरीय निकाय संघ ने एक दूसरे का हाथ थामते हुए नगरीय निकाय संयुक्त संघर्ष मोर्चा बनाया था। हड़ताल के दौरान भी वीरेंद्र दुबे और संजय शर्मा के बीच मनभेद बने रहे। हड़ताल टूटते ही यह सतह पर आ गया। हड़ताल खत्म करने को लेकर जानकारी पांचों प्रांताध्यक्ष को थी लेकिन फैसले को लेकर एक राय क्यों नहीं बन पाई, इस पर हर प्रांताध्यक्ष की अलग-अलग राय है। संजय शर्मा का कुछ लोगों पर महत्वाकांक्षी होने का संगीन आरोप लगाने से स्थिति बिगड़ गई। दरअसल, प्रदेश के शिक्षाकर्मियों के दो बड़े संगठन का प्रतिनिधित्व वीरेंद्र दुबे और संजय शर्मा करते हैं जबकि केदार जैन तीसरे नंबर पर हैं। विकास राजपूत और चंद्रदेव राय का संगठन अलग-अलग क्षेत्र में प्रभावी है। वीरेंद्र दुबे के संगठन का प्रभाव सरगुजा, दुर्ग में ज्यादा है। अन्य जिलों में भी उनका प्रभाव है। वहीं संजय शर्मा का मूल प्रभाव बिलासपुर संभाग में है। केदार जैन का बस्तर, विकास राजपूत का दुर्ग के अंदरूनी जिलों व चंद्रदेव राय का बलौदाबाजार में प्रभाव है। संजय शर्मा के साथ करीब 55 से 60 हजार तो वीरेंद्र दुबे के साथ भी इतने ही शिक्षाकर्मी हैं। केदार जैन के साथ भी 35 से 40 हजार शिक्षाकर्मी हैं।

संविलियन में दिक्कत
पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने दो टूक कह दिया है कि किसी भी हाल में शिक्षाकर्मियों का संविलियन नहीं किया जाएगा। उन्हें दूसरे किसी भी राज्य से बेहतर वेतन दिया जा रहा है। पंचायती राज अधिनियम की धारा 243 के अनुसार शिक्षाकर्मी राज्य शासन के कर्मचारी नहीं हैं। वे पंचायतों के अधीन हैं। उनकी नियुक्ति और सेवा शर्तों में संविलियन का उल्लेख नहीं है। इसके लिए राज्य शासन के नियमों में ही संशोधन करना होगा जिसे सरकार करना नहीं चाहती।

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खा गए धोखा
शिक्षाकर्मियों ने वर्ष 2012 में आंदोलन किया तो उन्हें सरकार ने आश्वासन दिया था कि उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा। सरकार ने उन्हें शासकीय शिक्षकों के समान वेतनमान देने की घोषणा की और छठवें वेतनमान पर सहमति जताकर पुनरीक्षित वेतनमान थमा दिया। गृह भाड़ा भत्ता (ग्रामीण 7 और शहरी 10 फीसदी), चिकित्सा भत्ता 200 रुपये और गतिरोध भत्ता 600 रुपये देकर बाद में इसे भी वापस ले लिया। साथ ही अनुकंपा नियुक्ति के प्रावधान में टीईटी, डीएड और बीएड जोड़ दिया गया।

आंदोलन से कब क्या मिला
शिक्षाकर्मी और सरकार के बीच टकराव लंबे समय से चला आ रहा है। जब-जब शिक्षाकर्मी हड़ताल करते हैं सरकार उनकी एक दो मांगें मान लेती है। इससे आंदोलन का मकसद पूरा नहीं हो पाता है। वर्ष 2003 में शिक्षाकर्मियों के आंदोलन के दौरान रमन सिंह (तब मुख्यमंत्री नहीं बने थे) ने वादा किया था कि भाजपा की सरकार बनी तो एक घंटे में सभी समस्याओं का निदान कर दिया जाएगा। मगर ऐसा हुआ नहीं। वर्ष 2004 में संविदा शाला शिक्षक संघ के आंदोलन के बाद 16,422 संविदा शिक्षकों को शिक्षाकर्मी बनाया गया। 2007 में शालेय शिक्षा कर्मी संघ ने आंदोलन किया तो परीविक्षा अवधि को घटाकर 3 से 2 वर्ष कर दिया गया। 2008 में आंदोलन हुआ तो 15 फीसदी अंतरिम राहत और इतना ही अंतरिम भत्ता मिला। 2011 में शिक्षाकर्मी फेडरेशन की 9 दिन की हड़ताल के बाद अंशदारी पेंशन योजना, समयमान क्रमोन्नति, स्थानांतरण नीति, अनुकंपा नियुक्ति और महंगाई भत्ता की घोषण की गई। चौंकाने वाली बात है कि पिछले 17 सालों में शिक्षाकर्मियों की मांगों पर विचार करने के लिए समय-समय पर कई कमेटियां बनी लेकिन नतीजा शून्य ही निकला। 2004 में राउत कमेटी ने राय दी कि हर साल 20-20 फीसदी शिक्षाकर्मियों का मूल पदों पर संविलियन किया जाए। शेष को पुनरीक्षण वेतनमान दिया जाए। लेकिन इसे अमल में नहीं लाया गया। 2007 में हाई पावर कमेटी तत्कालीन मुख्य सचिव नारायण सिंह की अध्यक्षता में गठित की गई लेकिन कमेटी ने जो अनुशंसा की उसे सार्वजनिक ही नहीं किया गया।

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अभनपुर से आई शिक्षाकर्मी वर्ग तीन की राखी मौर्य कहती हैं, ‘तत्कालीन अजीत जोगी सरकार ने भी लाठियां चलवा कर शिक्षाकर्मियों के आंदोलन को तोड़ दिया था। रमन सरकार भी जिस बर्बर तरीके से पेश आई है उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। महिला शिक्षाकर्मियों को परेशान करने के लिए पूरे टॉयलेट में ताला लगवा दिया। पुलिस तो शिक्षकों से अपराधियों की तरह पेश आई। हम जानते हैं कि सरकार से टकराव मुश्किल है लेकिन हम चाहते हैं कि सरकार हमारी मांगों पर विचार करे। हम आंदोलन नहीं करना चाहते पर सरकार हमें विवश न करे।’

सरकार का नजरिया ठीक नहीं
पतेरा पाल की वर्ग दो की शिक्षाकर्मी विमला पटेल कहती हैं, ‘राज्य बनने के बाद माननीयों ने चार बार प्रस्ताव लाकर अपना वेतन-भत्ता 11 गुना बढ़ा लिया और शिक्षाकर्मियों के लिए सरकार के पास फंड नहीं का रोना है। सरकार कहती है कि शिक्षाकर्मियों का संविलियन करने से हर साल करीब 1,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा लेकिन सच्चाई यह है कि केंद्र से शिक्षकों के लिए 75 फीसदी राशि आती है। प्रदेश सरकार को मात्र 25 फीसदी ही देना होता है। शासन को कैसा बोझ जबकि हर वर्ष नियमित शिक्षक सेवानिवृत्त भी हो रहे हैं। सरकार का नजरिया शिक्षाकर्मियों के प्रति ठीक नहीं दिखता है।’

प्राथमिक शाला बुरबुढ़ा भोपालपट्नम, बीजापुर से आए जी. सुभाष कहते हैं, ‘सरकार हमारे आंदोलन से डरी हुई है। हम जानते हैं कि आंदोलन खत्म करने के लिए सरकार किसी भी स्तर तक जा सकती है। लेकिन ऐसा कितनी बार होगा। हम अपनी मांगों के लिए आंदोलन कब तक करेंगे। शासन हमें शासकीय कर्मचारी नहीं मानती लेकिन हमारे आंदोलन या हड़ताल को खत्म करने के लिए एस्मा के दायरे में लाने की बात करती है। हाई कोर्ट ने 2011 में सरकार से जवाब मांगा था लेकिन आज तक जवाब नहीं दिया। राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र और उत्तरांचल में शिक्षकों को समाहित किया जा चुका है तो फिर यहां क्यों नहीं।’

शिक्षाकर्मियों की हड़ताल खत्म होने के बाद मुख्य सचिव विवके ढांढ की अध्यक्षता में आठ सदस्यीय समिति गठित की गई है। यह समिति शिक्षाकर्मियों के वेतन, भत्ते, पदोन्नति, अनुकंपा नियुक्ति और स्थनांतरण नीति पर निर्णय लेगी। समिति अपनी रिपोर्ट तीन माह में देगी। बहरहाल, शिक्षक और प्राथमिक शिक्षा के संकट का समाधान जरूरी है। शिक्षा का संकट तब तक रहेगा जब तक गैर बराबरी की सेवा शर्तों पर नियुक्ति करने वाली नीतियां रहेंगी।

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