नई दिल्ली। फोन बीच में कट जाने से दिल्‍ली के लोग लंबे समय से परेशान हैं। इस सिलसिले में बार-बार की कवायद भी काम न आई, लेकिन अब मोबाइल फोन धारकों की कॉल ड्रॉप की समस्या जल्द ही सुलझने वाली है। दिल्ली के तीनों स्थानीय निकायों, सेल्युलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) और एसोसिएशन ऑफ़ यूनिफाइड टेलीकॉम सर्विसेस प्रोवाइडर (एयूएसपीआई) ने एक बैठक में टॉवर शुल्क को लेकर निकायों और टेलीकॉम कंपनियों के बीच सहमति बनाई है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सेल टावर शुल्क विवाद निपटाने के लिए दोनों पक्षों को आपस में बातचीत करने का अवसर दिया था। इसके बाद निगम मुख्यालय सिविक सेंटर में बैठक का आयोजन किया गया।

बैठक की अध्यक्षता उत्तरी निगम आयुक्त पीके गुप्ता ने की, जिसमें एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया, एमटीएस और एयरसेल समेत 15 टेलीकॉम कंपनियों के उच्च अधिकारियों व पूर्वी दिल्ली नगर निगम, दक्षिणी दिल्ली नगर निगम और उत्तरी दिल्ली नगर निगम के 10 आला अधिकारियों ने भाग लिया। दोनों पक्षों ने प्रति सेल टॉवर दो लाख रुपये (पांच साल के लिए) शुल्क पर सहमति जताई है, जो टावर लगाने की तिथि से देय होगा। वहीं,  भूमि पर 12 मीटर तक ऊंचा टावर लगाने के लिए 20 हजार रुपये प्रति ऑपरेटर अतिरिक्त देने होंगे।

कंपनियां इस शुल्क का भुगतान एक जनवरी 2016 से करेंगी। वहीं, सेलुलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक जॉन मैथ्यू ने बताया कि काल ड्राप की समस्या के मद्देनजर बीच का रास्ता निकाला जाना जरूरी था। इससे आम लोगों का नुकसान हो रहा था। लिहाजा एसोसिएशन ने दो लाख रुपये पर मंजूरी दे दी। हालांकि यह राशि टेलीकॉम कंपनियों के लिए ज्यादा है लेकिन लोगों के हितों को देखते हुए सहमति जताई गई है। अब इस संबंध में नियमों और शर्तों का विस्तार से अध्ययन किया जा रहा है। जल्द ही सारा मामला सुलझा लिया जाएगा। एकीकृत दिल्ली नगर निगम ने साल 2010 में सेल टॉवर लगाने के लिए निर्धारित लाइसेंस शुल्क की राशि एक लाख रुपये से बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर दी थी। उससे तीनों निगम और टेलीकॉम कंपनियों के बीच विवाद चला आ रहा है। उक्त बैठक के बाद उम्मीद की जा रही है कि लोगों को जल्द ही कॉल ड्रॉप की समस्या से छुटकारा मिलेगा। वहीं,  स्थानीय निकायों को भी इस वर्ग से मिलने वाले राजस्व में बढ़ोत्तरी होगी।

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