…. रमंते तत्र शांति!

महेंद्र अवधेश
Mon, 11 Mar, 2019 16:47 PM IST

मैंने छेड़ा, जरूर आप में कोई खोट नजर आती होगी भाभी जी को, अन्यथा एक हाथ से तो ताली भी नहीं बजती. आप अपनी उलझने वाली आदत छोड़ दीजिए. शास्त्रों में कहा गया है, यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता. मेरे इतना कहते ही भइया लाल उबल गए, मति मारी गई है तुम्हारी. सुबह से शाम तक ऑफिस, फिर हाट-बाजार और उसके बाद तुम्हारे भतीजे-भतीजियों का होमवर्क, सारे के सारे काम मैं ही निपटाता हूं, पड़ोसी नहीं. और सुनो पुत्तर, इतवार की सुबह सब्जी काटने का ओवरटाइम अलग से करता हूं. कभी-कभी कपड़े भी प्रेस करने पड़ते हैं. कभी मैं पूछंूगा कि तुम्हारे घर में देवता वास कर रहे हैं या नहीं?

chikotiसंडे का दिन और ऊपर से मौसम भी खुशगवार था, बावजूद इसके भइया लाल बहुत उखड़े-उखड़े नजर आ रहे थे. मैंने सोचा कि शायद ऑफिस में किसी से किसी बात पर ठन गई होगी, इसलिए मिजाज में इतनी तल्खी झलक रही है. वजह जानने की गरज से पूछा, क्या बात है बॉस?

कुछ नहीं, बस यूं ही, कहकर भइया लाल ने बनावटी मुस्कान के साथ एक ठंडी सांस छोड़ी. मैंने कहा, लेकिन फिर भी? थोड़ी देर बाद वह बोले, कहा न कि तुम नहीं समझ पाओगे. जब तक ईश्वर की इच्छा है, मौज करो.

जरा बताइए तो सही कि आखिर मामला क्या है?

भइया लाल पहले बुदबुदाए, फिर बोले, और कुछ  नहीं, सारे रण की जड़ तुम्हारी भौजाई है, जो हमेशा राशन-पानी लिए मेरे सिर पर चढ़ी रहती है. जब देखो, तब किच-किच, खोपड़ी नुचौव्वल.

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मैंने छेड़ा, जरूर आप में कोई खोट नजर आती होगी भाभी जी को, अन्यथा एक हाथ से तो ताली भी नहीं बजती. आप अपनी उलझने वाली आदत छोड़ दीजिए. शास्त्रों में कहा गया है, यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता.

मेरे इतना कहते ही भइया लाल उबल गए, मति मारी गई है तुम्हारी. सुबह से शाम तक ऑफिस, फिर हाट-बाजार और उसके बाद तुम्हारे भतीजे-भतीजियों का होमवर्क, सारे के सारे काम मैं ही निपटाता हूं, पड़ोसी नहीं. और सुनो पुत्तर, इतवार की सुबह सब्जी काटने का ओवरटाइम अलग से करता हूं. कभी-कभी कपड़े भी प्रेस करने पड़ते हैं. कभी मैं पूछंूगा कि तुम्हारे घर में देवता वास कर रहे हैं या नहीं?

मैंने कहा, आप नाहक नाराज होते हैं. घर के काम घर वाले करते हैं, पड़ोसियों का काम दूसरा है! यह ऐसी विशेष किस्म की प्रजाति है, जो अपना कामइतने शातिराना अंदाज में कर जाती है कि किसी को भनक तक नहीं लगती. जब लगती है, तो अपना सिर धुनने के अलावा कोई हल शेष नहीं दीखता.

तुम ज्यादा ज्ञान मत बघारो, मैं जानता हूं कि तुम्हारी भौजाई के भाव आखिर बढ़े क्यों हैं? भइया लाल झल्ला उठे.

क्यों, जरा मैं भी तो जानूं, मैंने तुरंत सवाल दागा.

बोले, जबसे देश में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण का झुनझुना क्या बजा है, मेरा जीना हराम हो गया है. खबरें पढ़-पढक़र उसका दिमाग अपनी धुरी से हट गया है. बात-बात में बहस पर उतर आती हैै, भाषा बिल्कुल नेताओं वाली हो गई है. उसके तेवरों से लगता है कि और कहीं हो या न हो, मेरे घर में क्रांति का सायरन किसी दिन जरूर बज उठेगा.

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मैं बोला, इसका इलाज है बड़े भाई, आप जरा भाभी जी के सामने एक शिगूफा छोडि़ए कि अबकी बार दीवाली पर जब बोनस मिलेगा, तो सारी खरीदारी उन्हीं  पर केंद्रित होगी. बस, नए-नए जेवरों और साडिय़ों की चाह उनके सारे तेवर ढीले कर देगी. क्रांतिकी सारी आशंकाएं धूल-धूसरित और शांतिकी अपार संभावनाएं बलवती हो जाएंगी. जरा सबक लीजिए उसी महिला आरक्षण से, जिसे आप अपनी परेशानी की वजह मानते हैं. जब व्यवस्था33 प्रतिशत का लालीपॉप दिखाकर समूचे देश में क्रांति को थामे हुए है तो आप भी बोनस का झुनझुना बजाकर अनहोनी को होनी में बदल सकते हैं.

यानी मैं साल में एक बार मिलने वाला बोनस खून कर दूं? पूरी रकम उस पर यूं लुटा दूं?’ भइया लाल का प्रतिवाद जारी था. मैंने समझाया, शांति के लिए इस देश ने न जाने कितनी कुर्बानियां दे डालीं और आपको अपना बोनस ज्यादा प्यारा लगता है! अनुज होने के नाते और घर की कलह खत्म करने की खातिर मेरी सलाह मानिए और इस संशोधित सूत्र वाक्य को गांठ बांध लीजिए, यत्र पत्नी पूज्यंते, रमंते तत्र शांति. आप क्या ख्याल है!

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