‘नेपोटिज़्म रॉक्स’ पर हम सुर्खियां बनाते हैं या फिर सिर्फ तालियां बजाते हैं…

ओपिनियन पोस्ट
Tue, 18 Jul, 2017 19:15 PM IST

निशा शर्मा।

आइफ़ा, न्यूयार्क में कईं बड़ी हस्तियों के बीच सम्पन्न हो गया। लेकिन खत्म होते होते एक शब्द नेपोटिज़्म को फिर से हवा दे गया। जिस हिसाब से भारतीय सिनेमा तकनीक की दुनिया में काफी आगे निकल गया है। उसी हिसाब से नेपोटिज्म की दुनिया से भी उसे आगे निकलने की जरुरत है। नोपोटिज्म भारतीय सिनेमा में एक ऐसी बहस है, जो होनी बड़ी जरुरी है। नेपोटिज़्म अंग्रेजी का शब्द है जिसका अर्थ होता है भाई-भतीजावाद। यह वो शब्द है जिसका वर्चस्व भारतीय सिनेमा में पहले से ज्यादा गहरा नजर आता है। यह एक ऐसा शब्द है जिसके इर्द-गिर्द आज हमारी फिल्म इंडस्ट्री घूमती है, लेकिन कभी जिसका जिक्र नहीं होता, बस फुसफुसाहट होती है। वह शब्द जिसे पहली बार कंगना ने करण जौहर के खिलाफ़ आज से करीब पांच महीने पहले उन्ही के शौ ‘कॉफी विद करण’ में इस्तेमाल किया था। जिसके बाद करण तनतनाए जरुर थे, लेकिन वाह वाही कंगना बटौर गई थी। मामला उछला जरुर था, पर शांत हो गया था।

हालांकि सच कहें तो यह मामला बाहर से शांत -सा दिखा लेकिन शांत हुआ नहीं था। कंगना के कहे शब्द  ‘करण जौहर नेपोटिज़्म को बढ़ावा देते हैं’ ऐसे शब्द थे जिन्हें करण पांच महीने तक नहीं भुला पाए, अगर वह इन शब्दों को नहीं भुला पाए तो जानिये यह शब्द किस नींव को हिला रखने का मादा रखते हैं, क्योंकि यह शब्द अभी भी करण जौहर को चुभ रहे हैं।

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यह शब्द तीख़े और गहरे थे क्योंकि पांच महीने बाद आइफ़ा समारोह में फिर गूंजे… ‘नेपोटिज़्म रॉक्स’। एक ही स्वर में तीन बड़े कलाकार नेपोटिज़्म रॉक्स कहते सुनाई देते हैं। यह बड़े कलाकार नेपोटिज़्म रॉक्स कहकर क्या जताना चाहते हैं, क्या ऐसा बिल्कुल नहीं है या फिर हां यही है। हम ही इस चमचमाती दुनिया के बादशाह हैं।

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नेपोटिज्म रॉक्स कहने वाले इन तीनों कलाकारों में वरुण धवन, सैफ़ अली खान और करण जौहर थे। यह ऐसे नाम हैं जिन्होंने सिनेमा जगत में जगह बनाने के लिए बहुत संघर्ष नहीं किया है, सिनेमा जिन्हे परोसा हुआ मिला है, जिनकी सिनेमा के हिसाब से परवरिश हुई है, जिसके लिए बड़े नाम आंटी-अंकल के इर्द-गिर्द घूमते हैं।

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गौर फरमाइयेगा, वरुण धवन जाने माने फिल्म निर्देशक/निर्माता डेविड धवन के बेटे हैं जिन्हें सिनेमा विरासत में मिला है। करण जौहर (जिसे आधुनिक सिनेमा में रोमांस का राजा कहा जाता है) ने जिन्हें अपनी फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर में लॉन्च किया था। हालांकि किसी टैलेंट को यहां तक पहुंचने में अपनी जिन्दगी के कई साल गवाने पड़ते हैं, खुद को साबित करने के लिए अपने प्रोर्टफोलियो लेकर निर्देशक/निर्माताओं के लगाने पड़ते हैं, जो वरुण धवन ने नहीं किया। वरुण ने इतना जरुर किया कि गोविंदा को बचपन से एक्टिंग करते देखा, डांस फलेक्सिबिलिटी को जाना और जाना की मेहनत किस ओर करनी है। वरना एक उम्र तक हमारी संघर्षरत पीढ़ी दिशा ही ढूंढती रह जाती है।

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सैफ अली खान मशहूर अदाकारा शर्मिला टैगोर के बेटे हैं, जिनके नाम का सिक्का सिनेमा जगत में कई दशकों तक चला। कई बड़े निर्देशक, सिनेमा परिवार उनके करीबी हैं, दौलत जिनको दहेज में नहीं बल्कि पुश्तैनी मिली जिसका फायदा सैफ़ को मिलता रहा। सैफ अली खान के पीछे सिर्फ मां शर्मिला टेगौर का नाम नहीं है, उनकी मां ने अगर सिनेमा में शोहरत पाई है, तो पिता क्रिकेट जगत के नामी खिलाड़ी रहे। सैफ को करियर के तौर पर हमेशा दो ऑप्शन मिले, अगर वह खिलाड़ी नहीं बन पाए तो अभिनेता होंगे। जिसके लिए फिल्मों में रोल देने के लिए शर्मिला टेगौर का बेटा होना काफी था…आज वह जिस मुकाम पर हैं उसके पीछे फिल्मी हस्तियों का बड़ा हाथ है, चाहे फिर वह शर्मिला टेगौर हो या अमृता सिंह हो ।

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 करण जौहर जो इस कंट्रोवर्सी का बड़ा हिस्सा हैं उनका तो आधार ही नेपोटिज़्म है। करण हिन्दी सिनेमा में नामी प्रोड्यूसर रहे यश जौहर के बेटे हैं। यश जौहर ने 1976 में धर्मा प्रोडक्शन बनाया था जिसकी बागडोर बाद में करण जौहर ने संभाली। धर्मा प्रोडक्शन के जरिये करण को सिनेमा और सिनेमाई पर्दा जागीर में ही मिला। बचपन में जहां आम बच्चे सिनेमा हॉल नहीं देख पाते ऐसे में उन्होंने अमिताभ बच्चन की अग्निपथ को शूट होते अपने पिता के साथ अपने प्रोडक्शन हाउस के लिए देखा। karan-johar-7592

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करण की माता हीरु जौहर बीआर चोपड़ा और यश चोपड़ा की बहन थी। ये दो नाम फिल्म और टेलीविज़न जगत की बड़ी हस्तियों में आज भी शामिल हैं। इन दोनों ने अपनी बहन के इकलौते बेटे को सिनेमा की सीढ़ियां चढ़ने में खूब मदद की। करण जब सिनेमा जगत में कदम रख रहे थे तो उन्हे सलाह देने वालों में बड़ा नाम मामा यश चोपड़ा का था। यश चोपड़ा को रोमांस का किंग कहा जाता था, जिसके नक्शे कदम पर अब करण चल रहे हैं।johar_0_0 यश चोपड़ा से मिलने तक के लिए उनके स्टूडियो यशराज के बाहर सिनेमा में अपना भविष्य तलाशने वाले हजारों लोगों का हुजूम रहता था। ऐसे में करण जौहर को नेपोटिज़्म का फायदा मिलना शुरु हो चुका था क्योंकि वह उन आम लोगों में से नहीं थे जो यशराज स्यूटियो के बाहर लाइन में खड़े होते थे, वह उनमें से थे जिन्हे उनकी सलाह मिलती थी और वह उनके दिखाये गए रास्ते पर चलते थे। नेपोटिज़्म ने करण को सिर्फ राह ही नहीं दिखाई बल्कि उनकी उंगली पकड़कर उसे सफलता की सीढियां भी चढ़ाई। देश के जाने माने बैनर के तले करण ने अपने ममेरे भाई आदित्य चोपड़ा की फिल्म दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे के लिए अस्सिट किया। यह फिल्म आज भी सिनेमा के इतिहास में सबसे सफल फिल्मों में अव्लव में है। उसके बाद क्या था उनके पास सिनेमा जगत वो सब बड़े नाम थे जनकी बदौलत फिल्में हिट ही नहीं सुपरहिट रहीं। यश चोपड़ा को पिता के तौर पर देखने वाले शाहरुख खान, काजोल करण के लिए काम करने को तैयार थे। करण जौहर ने अपनी पहली फिल्म कुछ-कुछ होता है अपने बैनर धर्मा प्रोडक्शन के तहत बनाई। यह वो बैनर था जो उन्हें अपने पिता यश जौहर से विरासत में मिला था। फिल्म कुछ कुछ होता को मामा यश चोपड़ा की कंपनी यशराज बैनर ने डिस्ट्रीब्यूट किया। उस समय यह वह पहली भारतीय कंपनी थी जो दुनिया में भारतीय फिल्मों का डिस्ट्रीब्यूशन करती थी, इस कंपनी को अपनी फिल्म के ड्रिस्ट्रीब्यूश के लिए लेना हर किसी के बस की बात नहीं लेकिन करण को यह सुविधा उपलब्ध रही।

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वही करण जो कदम दर कदम नेपोटिज़्म के सहारे आगे बढ़े हैं वह खुद को टेलैंट के जरिये इस मुकाम पर बताते हैं तो हंसी ही नहीं आती बल्कि उन लोगों के लिए यह गाली भी लगती है जो उन सब चीजों को पाने के लिए कठिन मेहनत कर सिनेमा में मुकाम पाना चाहते हैं।हालांकि करण यह कतई नहीं मानना चाहते कि नोपोटिज़्म उनकी जड़ों में है, जिन जड़ो को वह आलिया भट्ट, वरुण धवन, सिद्दार्थ मल्होत्रा, जाहनवी कपूर जैसे चेहरों के जरिये पसार रहे हैं। दरअसल,, नेपोटिज़्म सिनेमा जगत में एक रीत की तरह हैं जिसके जरिये ही राजकपूर के परिवार की चौथी पीढ़ी सिनेमा जगत में सक्रीय है, देयोल और अमिताभ बच्चन की तीसरी पीढ़ी फिल्मों में आ रही है, आप ढूंढेंगे तो और नाम भी आपको मिलेंगे।

ऐसे में जो नए लोग सिनेमा के पर्दे पर खुद को देखना चाहते हैं उनकी राह कंगना रनौत जैसे कलाकारों की राह की तरह कठिन ही नहीं नामुमकिन भी हो जाती है। जिन्हें कोई सलाह तक देने वाला नहीं मिलता। एक गलत सलाह जिनके भविष्य को गर्त में पहुंचा देती है। ऐसा हजारों में से एक होता है जो शाहरुख़ खान बनता है, वरना एक प्लेटफार्म पाने के लिए ही एक कलाकार को कई तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं। हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचा शख्स किसी फिल्म में किसी भी तरह का सीन पाने के लिए तैयार हो जाता है। अगर आईफ़ा में तीन कलाकारों का एक लड़की के सवाल के जवाब में किया गया व्यवहार ठीक है, तो सोच लेना चाहिये कि उन कलाकारों के भविष्य के साथ क्या होता होगा जिनका या तो फिल्म इंडस्ट्री में कोई गॉड फादर नहीं है या किसी खान के कैंप का वह हिस्सा नहीं हैं या वह नेपोटिज़्म की श्रेणी में नहीं आते तो उनका इसी तरह (जैसे कंगना रनौत का मजाक उड़ाया गया) नेपोटिज़्म रॉक्स के तहत मजाक उड़ाया जाता है जिस पर हम या सुर्खियां बनाते हैं या सिर्फ तालियां बजाते हैं।

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