नगा उग्रवादियों के खिलाफ सेना की कार्रवाई के मायने

 अभिषेक रंजन सिंह, नई दिल्ली।
पिछले दिनों नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आॅफ नगालिम के खापलांग गुट के उग्रवादियों के खिलाफ हुई सेना की बड़ी कार्रवाई ने एक बार फिर यह साबित किया है कि पूर्वोत्तर में उग्रवाद की समस्या को हल्के में नहीं लिया जा सकता। कार्रवाई म्यांमा सीमा के नजदीक हुई और इसमें कई उग्रवादी मारे गए। यों उग्रवादी गुट का दावा है कि सेना के तीन जवान भी मारे गए, पर सेना ने इससे साफ इनकार किया है। भारत-म्यांमा सीमा से कोई पंद्रह किलोमीटर दूर लंगखू गांव के पास भारतीय सैनिकों पर उग्रवादियों के हमले के बाद सेना ने यह कार्रवाई की। इससे पहले, जून 2015 में खापलांग गुट के उग्रवादियों के खिलाफ सेना ने बड़ी कार्रवाई की थी।
जून 2015 में नगा उग्रवादियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए अपनी सीमा के उल्लंघन का म्यांमा ने विरोध किया था। शायद यही वजह होगी कि इस बार उस हद तक जाने से बचा गया या वैसा कोई दावा नहीं किया गया। एनएससीएन के खापलांग गुट की गिनती पूर्वोत्तर के सबसे खतरनाक हथियारबंद गुटों में होती रही है। 1980 में एनएससीएन के गठन के कुछ साल बाद, टी मुइवा और इसाक चिसी स्वू से अनबन के चलते खापलांग इससे अलग हो गए और उन्होंने अपना अलग गुट एनएससीएन (खापलांग) बना लिया। वर्ष 1997 में केंद्र के साथ शांति वार्ता में दोनों गुट शामिल हुए। इसाक-मुइवा गुट के संघर्ष विराम समझौते पर हस्ताक्षर करने के चार साल बाद खापलांग गुट ने भी इस तरह का समझौता स्वीकार कर लिया। पर मार्च 2015 में खापलांग गुट ने शांति समझौते को धता बता कर ‘आजादी के लिए युद्ध’ की घोषणा कर दी। इसी के कुछ दिनों बाद उसने मणिपुर में बीएसएफ के काफिले को निशाना बनाया था। अगस्त 2015 में केंद्र ने जहां इसाक-मुइवा गुट के साथ समाधान की रूपरेखा तलाशने का करार किया, वहीं इसके एक महीने बाद खापलांग गुट को पांच साल के लिए प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया।

 

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