अल्पसंख्यक मामलों के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) मुख्तार अब्बास नकवी  ने ओपिनियन पोस्ट से समान नागरिक संहिता समेत अयोध्या और कश्मीर मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने साफ संकेत दिए कि समान नागरिक संहिता इस बार जरूर लागू होगी। कश्मीर मुद्दे को भी सरकार के बचे तीन साल के कार्यकाल में निपटाने का भरोसा दिया। अयोध्या मामले में उन्होंने कहा, सुप्रीम कोर्ट जो फैसला देगी वह मान्य होगा। वहीं कांग्रेस पर सीधा निशाना साधते हुए कहा, पूर्व सरकार करती रही सेकुलरिज्म की सियासत।

समान नागरिक संहिता, कश्मीर और अयोध्या-इन तीन अनसुलझे मुद्दों को सुलझाने का वादा आपकी सरकार ने किया था। पहले वादे की तरफ आपने एक कदम बढ़ा दिया है। क्या लगता है? इस बार यह अंजाम तक पहुंचेगा?
समान नागरिक संहिता कोई राजनीतिक घोषणा पत्र का हिस्सा नहीं है बल्कि यह संवैधानिक प्रावधान है। अनुच्छेद-44 में साफ लिखा है कि देश के हर हिस्से में हर नागरिक के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का स्टेट प्रयास करेगा। हम संविधान के दायरे में रहते हुए प्रयास कर रहे हैं। एकेडमिक डिस्कशन चल रहा है। मुझे लगता है कि इस बार यह मुद्दा सुलझ जाएगा। इस बार निष्कर्ष जरूर निकलेगा।

मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग कह रहा है कि पर्सनल लॉ को खत्म करने की मुहिम का हिस्सा है यूनिफार्म सिविल कोड।

देखिए यहां यह स्पष्ट कर दूं कि सबके धार्मिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे। धार्मिक मसले पर्सनल लॉ में ही रहेंगे। सामाजिक, आर्थिक और कानूनी मुद्दों के लिए यूनिफार्म सिविल कोड होगा।

महिलाओं के लिए बराबरी की बात कर रहे मुस्लिम महिला संगठन भी समान नागरिक संहिता के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि पर्सनल लॉ का कोडिफिकेशन हो। समान नागरिक संहिता लागू करना हमारे पर्सनल लॉ पर हमला है?

हमें उनके विरोध से कोई आपत्ति नहीं है। चर्चा चल रही है। देश की जनता तय करेगी कि पक्ष सही है या विपक्ष। पर्सनल लॉ 1937 से जस का तस है। सौ साल से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसलिए थोड़ा कट्टर रवैया है। मगर जब कॉमन लॉ के फायदे सबको महसूस होंगे तो जो लोग जेंडर जस्टिस के पक्ष में हैं वे इसके पक्ष में हो जाएंगे। हमें लगता है कि जल्द ही विधि आयोग अपनी रिपोर्ट सौंप देगा। फिर हम आगे बढ़ेंगे। हां, जबरन किसी पर कॉमन लॉ नहीं थोपा जाएगा।

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कश्मीर मुद्दा क्या अब भी आपकी प्राथमिकता में है? क्या अभी तक इस पर कुछ चर्चा हुई है। कोई रणनीति बनी है?
कश्मीर के मुद्दे पर सर्वसहमति की जरूरत है। अनुच्छेद 370 जिन परिस्थितियों में लगा था, हमें खुले दिमाग से यह चर्चा करने की जरूरत है कि इसका कितना फायदा हुआ, कितना नुकसान? लोगों के बीच चर्चा हो, कश्मीर और लेह-लद्दाख के लोगों के बीच चर्चा कराई जाए। आकलन करना चाहिए कि इसका वहां की जनता को फायदा हुआ या नुकसान।

क्या आप जनमत की बात कर रहे हैं? यह चर्चा कब से शुरू होगी? कोई विचार विमर्श इस पर हुआ है?
नहीं, जनमत नहीं, लोगों के बीच चर्चा होनी चाहिए। अभी इस पर कोई बात नहीं हुई है। मगर हां, आगे इस पर चर्चा होगी।

भाजपा की सरकार सबका साथ सबका विकास नारे के साथ सत्ता में आई। क्या अल्पसंख्यकों, खासतौर पर मुस्लिमों के लिए सरकार ने वाकई कुछ कदम उठाए हैं। रोजगार जैसे मसले पर क्या कोई बढ़त आपको दिखी है?

अल्पसंख्यक समुदाय खासतौर पर मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा तबका बेरोजगार है, गरीबी रेखा के नीचे है। और यकीन मानिए गरीबी रेखा के नीचे लाने में मोदी जी का कोई हाथ नहीं है। यह उन लोगों की देन है जो दशकों तक सरकार में रहे। सेकुलरिज्म की सियासत करते रहे। जिन्होंने सेकुलरिज्म के नाम पर अल्पसंख्यकों का ‘सियासी शोषण’ किया है। हम अल्पसंख्यकों के सशक्तीकरण को औपचारिकता के रूप में नहीं देखते हैं, बल्कि इसे अपने दायित्व के रूप में देखते हैं। आप अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट देखें। नौकरियों में अल्पसंख्यकों का प्रतिशत बढ़ा है। पहले 6.34 प्रतिशत था। दो साल में यह बढ़कर 8.74 प्रतिशत हुआ है। अभी संसद में लिखित जवाब भी हमने इस पर दिया है।

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बिहार में चुनाव हुए, असम में चुनाव हुए। लेकिन टिकट बंटवारे में मुस्लिमों की संख्या न के बराबर रही, क्यों? भाजपा मुस्लिम समुदाय को साथ लेकर नहीं चलना चाहती क्या?
मैं भी मुस्लिम हूं, शाहनवाज जी भी मुस्लिम हैं। ऐसा नहीं है। काबिल उम्मीदवारों की हमें भी तलाश है। मिलेंगे तो उनका पार्टी में स्वागत है।

तो क्या काबिल मुस्लिम उम्मीदवार मिलना वाकई बहुत मुश्किल है?
(मुस्कराते हुए) नहीं, बिल्कुल नहीं। हम तलाश कर रहे हैं। मुस्लिम नेता बहुत काबिल हैं। इसके कई उदाहरण मौजूद हैं।

उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या कुछ मुस्लिम उम्मीदवार पार्टी की तरफ से उतारने की तैयारी है?
अभी कुछ नहीं कह सकते। पार्टी इस पर निर्णय लेगी।

अयोध्या भाजपा का सबसे महत्वकांक्षी मुद्दा रहा है। क्या लगता है यह मुद्दा सुलझेगा?

यह मामला कोर्ट में सबजुडिस है। हाईकोर्ट ने फैसला दिया था। उसको चुनौती दी गई। अब सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट जो फैसला देगा, उसे सभी पक्षों को मानना चाहिए।

क्या सरकार कश्मीर का मुद्दा बचे तीन साल के कार्यकाल में सुलझा पाएगी?
हां। मुझे लगता है कि हम सुलझा लेंगे। इसी कार्यकाल में हम इस मसले को निपटा देंगे।