शराबबंदी का स्याह पहलू

ओपिनियन पोस्ट
Wed, 06 Jun, 2018 15:15 PM IST

प्रियदर्शी रंजन

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कुछ दिनों पूर्व राजधानी पटना में कहा था कि अगर लाइट बंद करके जूस पिएंगे तो शराब जैसी फीलिंग आएगी। इस बयान के कुछ दिनों बाद बिहार दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री ने खुशी से लबरेज होते हुए कहा, ‘शराब पर प्रतिबंध के बाद राज्य में माहौल अच्छा हुआ है। लोग डर रहे थे कि शराबबंदी से राज्य के खजाने को भारी चपत लगेगी लेकिन उलटे बिहार के लोगों के 10 हजार करोड़ रुपये बचे। अब इस पैसे का इस्तेमाल लोग अपने जीवन को सुधारने में लगा रहे हैं।’ उनके इस बयान ने मीडिया में काफी सुर्खियां बटोरी और आंकड़ों के माध्यम से यह बताया गया कि शराबबंदी के दो वर्ष बाद बिहार में कितना कुछ बदल गया है। राज्य में हर तरह के अपराध में कमी आई है, घरेलू हिंसा का आंकड़ा घट गया, सड़क दुर्घटनाओं में कमी आई है। दरअसल, सरकारी आंकड़ों में शराबबंदी के दो साल शानदार रहे हैं।
आंकड़ों के मुताबिक दो वर्ष में दूध-दही की मांग में 18 फीसदी का इजाफा हुआ है। रसगुल्ले की बिक्री 50 फीसदी बढ़ गई तो उपभेक्ता उत्पादों की मांग में 30 फीसदी जबकि टीवी, फ्रिज, और वाशिंग मशीन की बिक्री में 35 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया है। रेडीमेड कपड़ों की बिक्री 50 फीसदी और गहनों की बिक्री 15 फीसदी बढ़ी है। इसके अलावा दोपहिया वाहनों की बिक्री में 23 फीसदी की तेजी आई है। दूसरी तरफ राज्य में अपराध के मामले 30 फीसदी तक कम हुए हैं। हत्या के मामलों में 22 फीसदी और डकैतियों के मामलों में 23 फीसदी की कमी आई है। सड़क दुर्घटनाओं के मामले तो 35 फीसदी घटे हैं।
बावजूद इसके, राजनीतिक पंडित व सामाजशास्त्री शराबबंदी के दो साल पर मिलीजुली प्रतितक्रिया दे रहे हैं। विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने तो सत्ता में आने पर शरबबंदी का नफा-नुकसान समझाते हुए शराबबंदी कानून में बदलाव लाने तक का वादा कर दिया है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नीतीश कुमार शराबबंदी के फायदों को दिन के उजाले में देखना चाहते हैं लेकिन जब इससे होने वाले नुकसान की बात आती है तो लाइट बंद कर देना चाहते हैं। मगध विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफेसर विनोद कुमार का मानना है कि जिन आंकड़ों के सहारे नीतीश कुमार शराबबंदी की सफलता की कहानी बयां कर रहे हैं वही आंकड़े उसकी असफलता का भी हाल बता रहे हैं। बकौल विनोद कुमार, ‘सरकार का दावा है कि शराब न पीने की वजह से राज्य में विभिन्न तरह की वस्तुओं की मांग बढ़ी है। लेकिन उन्हीं आंकड़ों की मानें तो शराबबंदी से पहले चार साल में बिहार में हर वर्ष दैनिक उपभोग व खाने-पीने की वस्तुओं की मांग 20 से 25 फीसदी बढ़ रही थी। वर्ष 2015-16 में गाड़ियों की बिक्री में दस फीसदी बढ़ोतरी हुई थी और इस वर्ष भी उतनी ही है।’ राजनीतिक जानकार व द हिंदू अखबार के संपादक अमरनाथ तिवारी के मुताबिक, ‘सरकार के तमाम दावों के बावजूद राज्य में शराब उपलब्ध है जिसे लोगों को पहले से अधिक कीमत पर खरीदना पड़ रहा है। राज्य में शराब मिलने की वजह से ही दो वर्ष में एक कानून के तहत लाखों लोग जेल भेज दिए गए। सरकार कुछ आंकड़ों के माध्यम से अपनी विफलता छुपा रही है। आलम यह है कि राज्य की कुल 58 जेलों जिनकी कुल क्षमता 38 हजार कैदियों की है, अब वहां जगह नहीं बची है। यही कारण है कि राज्य सरकार ने कैदियों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए कई जिलों में नई जेलों के निर्माण की स्वीकृति दी है।’
सरकार के दावों के मुताबिक शराबबंदी राज्य के घर-घर में खुशहाली लेकर आई है। जबकि विपक्ष का आरोप है कि सराकरी दावे खोखले हैं। नशाबंदी के नाम पर लोगों को जेल भेजा रहा है। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि सूबे में हर जगह चोरी-छिपे शराब उपलब्ध है। जो ज्यादा पैसे देने को तैयार हैं उन्हें घर बैठे शराब मिल रही है। पुलिस वाले तक शराब के अवैध कारोबार में मददगार साबित हो रहे हैं। पिछले दो वर्षों में शराबबंदी कानून के उल्लंघन के मामले में करीब 1.06 लाख एफआईआर दर्ज हुर्इं जिनमें 1.27 लाख लोग गिरफ्तार कर जेल भेजे गए। अब यह किसी से छिपा नहीं है कि अवैध शराब का कारोबार प्रदेश में संगठित रूप से फलफूल रहा है। पहले शराब अधिकृत दुकानों पर मिला करती थी, अब महज एक फोन कॉल पर उसकी होम डिलीवरी हो रही है। माफिया के लिए शराब का धंधा सोने का अंडा देने वाली मुर्गी जैसा बन गया है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि शराबबंदी के तमाम फायदों के बीच इसका दूसरा पहलू अंधकारमय है जिसे सरकार छिपाए रखना चाहती है।

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बढ़ा नकली व जहरीली शराब
का कारोबार
दरअसल, शराबबंदी के बावजूद बड़े पैमाने पर शराब का पकड़ा जाना ही कहानी का दूसरा पहलू बयां कर रहा है। राज्य में भले ही बाहर से शराब की आपूर्ति बंद हो मगर नकली शराब की पैकिंग और सप्लाई का धंधा जोर पकड़ रहा है। शराबबंदी से पहले भी बिहार में नकली शराब का बोलबाला रहा है। जिन ब्रांडों की डुप्लीकेसी का चलन जोरों पर रहा है उनमें अधिकांश वे हैं जिनकी एक बोतल की कीमत एक हजार रुपये के अंदर है। इनमें रॉयल स्टैग ब्रांड प्रमुख है। जहां से भी शराब बरामद हुई है वहां अन्य ब्रांड के साथ रॉयल स्टैग की बोतलें भी बरामद की गर्इं। हाल ही में पटना से सटे दानापुर के दियरा इलाके में नकली शराब बनाने के कारोबार का भंडाफोड़ एसएसपी मनु महाराज ने किया था। पुलिस को भी संदेह है कि जिस तरह से रॉयल स्टैग की बोतलें बरामद हो रही हैं, कहीं न कहीं इसका निर्माण किया जा रहा है। शराब पर जिस तरह की सख्ती शहरी इलाकों में है वैसी ग्रामीण इलाकों में देखने को नहीं मिलती। दियरा इलाकों में शराब को स्टोर किया जा रहा है। जंगली इलाकों में भी महुआ धड़ल्ले से बनाया जा रहा है। राज्य में जारी पंचायत चुनाव में जिस तरह से वोटरों को लुभाने के लिए शराब बांटी जा रही है उससे भी यह साबित हो रहा है कि ग्रामीण इलाकों में सख्ती नहीं है और इसका अवैध उत्पादन राज्य में ही किया जा रहा है।
राज्य में जहरीली शराब का कारोबार भी फलफूल रहा है जिससे आए दिन बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है। पिछले दो साल में जहरीली शराब से मरने वालों की संख्या सौ के पार हो गई है। अकेले गोपालगंज कांड में 23 लोगों की सामूहिक मौत जहरीली शराब की वजह से हुई। खगड़िया में चार महादलितों की मौत की वजह जहरीली शराब ही बनी। छपरा के बनियापुर प्रखंड के हाफिजपुर गांव में भी जहरीली शराब की वजह से सामूहिक मौत हो चुकी है। नो अल्कोहल संगठन के अध्यक्ष प्रवीण मिश्रा की मानें तो जहरीली शराब से मौत के मामले में प्रशासन की ओर से पर्दा डालने की कोशिश खूब हो रही है। गोपालगंज, खगड़िया, पटना या छपरा ही नहीं राज्य के सभी जिलों में जहरीली शराब की वजह से मौतें हुई हैं। इनमें कुछ मामले प्रकाश में आ गए तो बडेÞ पैमाने पर इस तरह के मामलों को दबा दिया गया। बेतिया शहर के जगजीवन नगर में आयोजित एक शादी में चार महादलितों की मौत इसका उदाहरण है। कुछ इसी तरह से प्रशासन ने पटना सिटी के रिकाबगंज से सटे शरीफगंज मुहल्ले के कांड पर पर्दा डाला। दो लोगों की मौत के बाद परिजनों ने पुलिस में जो प्राथमिकी दर्ज कराई उसमें मौत की वजह जहरीली शराब बताई मगर बाद में पटना के एसएसपी मनु महाराज के सामने परिजन पलट गए। उन्होंने मौत के लिए बीमारी को वजह बताया। कानूनी मामलों के जानकार सुदर्शन कुमार बताते हैं कि ऐसी घटना को बीमारी में ही समेट दिया जा रहा है। चूंकि ऐसे अधिकतर मामलों में प्रभावित लोग निचले तबके के होते हैं तो प्रशासन मृत व्यक्तियों के परिजनों से आसानी से यह लिखवा लेता है कि मृत व्यक्ति न शराब पीए हुए था और न कभी पीता था। ऐसा संभवत: सुशासन की छवि को बचाए रखने और बीमारी से मौत के दावे की कलई खुल जाने के बावजूद परिजनों के लिखित बयान को बचाव का आधार बनाने के मकसद से किया जा रहा है।

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पुलिस वालों की कमाई का जरिया
शराबबंदी के बाद पुलिस महकमे का भ्रष्टाचार जोर पकडेÞगा, इसकी आशंका कानून लागू होते समय ही जताई गई थी जो सच साबित हो रही है। शराबबंदी से पुलिकर्मियों की कमाई बढ़ गई है। भ्रष्ट पुलिस वालों की संख्या में पिछले दो सालों में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी हुई है जिनमें सिपाही से लेकर एसएसपी तक शामिल हैं। इसका बड़ा उदाहरण हैं मुजफ्फपुर के निलंबित एसएसपी विवेक कुमार। उनके मुजफ्फरपुर स्थित सरकारी आवास के अलावा दिल्ली, पटना व यूपी के सहारनपुर के पैतृक आवास समेत अन्य ठिकानों पर विजिलेंस की जांच के बाद यह बात सामने आई कि विवेक कुमार की आमदनी शराबबंदी के बाद काफी बढ़ गई थी। उन पर हरियाणा के शराब माफिया से साठगांठ के भी आरोप हैं। इसी तरह 28 मार्च, 2017 को पटना जिले के गौरीचक थाना के मुंशी पंकज सिंह का शराबी को छोड़ने की एवज में मोटी रकम लेते हुए एक वीडियो वायरल हुआ था जिसके बाद उसे निलंबित कर दिया गया। पटना के ही बेउर थाने पर शराब माफिया से साठगांठ करने का आरोप लगा जिसके बाद थाने के सभी कर्मियों को निलंबित कर दिया गया था। वर्ष 2017 में ही सीवान जिले के दरौंदा थाना के एएसआई अमित कुमार को इसी मामले में निलंबित किया गया था। आंकड़ों की बात करें तो अब तक दो सौ से अधिक पुलिसकर्मियों पर शराब की गाज गिर चुकी है। जब्त की गई शराब की थानों में पहरेदारी में नाकाम रहने वाले करीब सवा सौ पुलिस अधिकारियों व जवानों पर गाज गिर चुकी है। इसके बावजूद पुलिसकर्मियों की शराब के अवैध कारोबारियों से मिलीभगत के आंकड़ों में कोई कमी नहीं आ रही है।
पड़ोसी राज्य हुए गुलजार
शराबबंदी कानून लागू होने के बाद इस कारोबार से जुड़े तकरीबन दो लाख लोग बेरोजगार हो गए थे। तब सरकार की ओर से यह दावा किया गया था कि ऐसे लोगों को रोजगार मुहैया कराया जाएगा। लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी उनके लिए अब तक सरकार की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की गई है। सरकार ने तब बेरोजगार हुए लोगों से कहा था कि वे दूध के कारोबार से जुड़ें। सरकार ने इसके लिए आवेदन भी मंगवाया था मगर आवेदन उतनी संख्या में नहीं आए जिसकी उम्मीद थी। जो आवेदन आए भी, उनके लिए सरकार अब तक रोजगार का इंतजाम नहीं कर पाई है। शराब से रोजगार पाने वाले एक युवक गोपाल का कहना है कि जब से यह कारोबार बंद हुआ है उसके लिए अपने पांच सदस्यीय परिवार के लिए रोटी का जुगाड़ कर पाना संभव नहीं हो पा रहा है। गोपाल ने दुग्ध कारोबार के लिए आवेदन भी दिया था जिसका कोई जवाब अब तक नहीं मिला है। गोपाल ने बताया कि उसके कई और साथी जो इस कारोबार से रोजगार पाते थे अब दूसरे राज्यों में पलायन कर चुके हैं। मैं कुछ दिनों तक और इंतजार करूंगा, इसके बाद भी रोजगार नहीं मिला तो दूसरे राज्य में चला जाऊंगा। ऐसे युवाओं को बिहार से सटे दूसरे राज्य रास आ रहे हैं।
दरअसल, जब से शराबबंदी हुई है बार्डर इलाकों में शराब की खपत कई गुना बढ़ गई है। खासकर झारखंड में। झारखंड में शराब की खपत में दो लाख लीटर की बढ़ोतरी हुई है। खासकर बिहार के नवादा जिले से सटे झारखंड के कोडरमा का हाल बयां करने लायक है। पटना-रांची मुख्य मार्ग पर स्थित होने और जिला मुख्यालय होने के बाद भी कोडरमा में ऐसी चहल-पहल कभी नहीं रही जैसी अब रहती है। बिहार के शराबियों ने बुझे-बुझे से रहने वाले इस शहर को गुलजार कर दिया है। यहां हमेशा उत्सव का माहौल रहता है। यहां के छोटे-बड़े होटल बिहार के अतिथियों से ही अटे रहते हैं। सड़क किनारे के लाइन होटल (ढाबा) पर भी बिहार नंबर की गाड़ियों की लंबी कतार देखी जा सकती है। झारखंड के बडेÞ शराब व्यवसायी आदित्य जायसवाल का कहना है कि बिहार में शराब पर पाबंदी के बाद झारखंड में हाइवे पर मौजूद होटलों व शराब के ठेकों का कारोबार बढ़ा है। कमोबेश यही हाल बिहार से सटे उत्तर प्रदेश के जिलों का भी है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और बलिया जैसे जिलों में शराब की बिक्री में काफी बढ़ोतरी हुई है।

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गरीबों के गले की फांस
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी का ऐलान करते वक्त कहा था, ‘इससे सबसे अधिक फायदा गरीबों को होगा। मजदूरी करने वालों को पैसे की बचत होगी जिससे उन्हें दो जून की रोटी के लिए मुहाल नहीं होना पड़ेगा। दिहाड़ी मजदूर दिन में जो कमाता है उसका 80 फीसदी शाम को शराब और इससे जुड़ी चीजों पर खर्च कर देता है।’ नीतीश के इस दावे पर कोई संदेह नहीं था। लेकिन शराबबंदी के दो वर्ष बीत जाने के बाद भी शराब गरीबों के गले की फांस बनी है। कभी शराबबंदी का समर्थन करने वाले बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी भी अब इसकी मुखालफत कर रहे हैं। उनका कहना है, ‘पुलिस गरीबों को सता रही है। इस कानून के तहत हिरासत में लिए गए लोगों में तीन चौथाई गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले हैं। इस कानून की खामियां गरीबों के लिए जंजाल बन चुकी हैं।’ पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी मानते हैं कि शराबबंदी कानून की वजह से राज्य के गरीब परेशान हैं। इस कानून की फिर से समीक्षा होनी चाहिए। पिछले वर्ष हिरासत में लिए गए 72 हजार लोगों में से 60 हजार गरीब थे।
गरीबों के एक बड़े तबके का मानना है कि शराबबंदी कानून की जद में आने से उन्हें कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाना पड़ रहा है जिसमें उनका हजारों खर्च हो रहा है। जेल जाने के चलते उनका परिवार भूखे रहने को बेबस है। हालांकि शराब पीकर पकड़े जाने वालों में बड़े तबके के लोग भी शामिल हैं लेकिन उन्हें जमानत पर खर्च होने वाले पैसे या उनके जेल में होने की स्थिति में परिवार के भूखे रहने की चिंता नहीं है। सरकार का मानना है कि शराब से गरीबों का नुकसान हो रहा है और वे पीना छोड़ दें। जबकि शराब नहीं छोड़ पाने का मनोवैज्ञानिक पहलू दूसरा है। साइकेट्रिस्ट डॉ. सत्यजीत सिंह का मानना है कि सरकार का शराब छुड़ाने का यह तरीका ठीक नहीं है। अचानक शराब नहीं छूट सकती। अचानक शराब छोड़ने से शराबियों की मानसिक और शारीरिक हालत पर असर पड़ता है। पिछले दो साल के आंकड़ों से साफ है कि जो पीने के आदी थे उनका पीना अब भी जारी है।

शराब बंद तो दूसरे नशे में तेजी
शराबबंदी के चलते नशेड़ियों ने दूसरे नशीले पदार्थों का ज्यादा सेवन करना शुरू कर दिया है। नशामुक्ति केंद्रों में मरीजों की बढ़ती संख्या इसकी तस्दीक करती है। नशामुक्ति केंद्रों में आने वाले मरीजों में शराब सेवन करने वाले से अधिक अन्य नशाओं के मरीज हैं। ऐसे मरीजों की संख्या 80 से 90 फीसदी तक है। पटना स्थित दिशा केंद्र की अंडर सेक्रेटरी राखी शर्मा बताती हैं, ‘शराबबंदी कानून लागू होने के बाद हमारे केंद्र में हर महीने करीब 150 मरीज आते थे। लेकिन अब ये संख्या 200 से 225 तक पहुंच गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें 80 फीसदी लोग गांजा, भांग, ब्राउन शुगर, व्हाइटनर, डेंडराइट आदि का सेवन करने वाले हैं। इससे भी चिंताजनक यह है कि अधिकांश मरीजों की उम्र 16 से 25 साल के बीच है।’
सभी तरह के नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाले आॅल इंडिया यादव महासंघ के अध्यक्ष अजय यादव का कहना है, ‘शराब का अन्य विकल्प आसानी से प्रदेश में उपलब्ध हैं। प्रतिबंध के बावजूद गांजा, चरस, अफीम जैसे नशीले पदार्थों का सूबे में धड़ल्ले से उपयोग होता है। कड़े कानून के बाद भी प्रशासन का इस पर नियंत्रण नहीं है। सरकार भी इस बात को स्वीकार करती है कि पहले से प्रतिबंधित नशीले पदार्थों का सेवन चोरी-छिपे ही सही, प्रचलन में है। आए दिन गांजा तस्करों का पकड़ा जाना इस बात का बड़ा सबूत है।’ एक सर्वे के मुताबिक राज्य का 10 में से चार व्यक्ति प्रतिबंधित नशा का सेवन करता है। एक अनुमान के मुताबिक राज्य में हर महीने 60 टन गांजा की खपत है जिसका अधिकांश हिस्सा नेपाल व बांग्लादेश के रास्ते तस्करी कर लाया जाता है। गांवों में तो लोग गांजा उगाते भी हैं। 

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