लैंड बिल पर केंद्र की रणनीतिक पलटी

ओपिनियन पोस्ट
Tue, 15 Sep, 2015 16:16 PM IST

देश की बात/ मृत्युंजय कुमार/

भूमि अधिग्रहण बिल पर मोदी सरकार का कदम विपक्ष के साथ साथ भाजपा के लोगों को भी चौंका गया। बीते सत्र में सदन में कोहराम के दौरान सरकार ने जो रवैया अपनाया था, उससे कहीं नहीं लग रहा था कि इस पर ज्यादा समझौते की गुंजाइश है। उस दौरान भाजपा के कई सांसद भी सरकारी पक्ष के व्यवहार को अहंकारपूर्ण मान रहे थे। हमलोगों से अनौपचारिक बातचीत के दौरान उनका स्पष्ट मानना था कि जब राज्यसभा में हम अपने बूते इसे पास करा नहीं सकते तो फिर इसे लेकर बदनामी क्यों झेली जा रही है। बार बार भाजपा सांसदों को कहा जा रहा था कि इस मसले पर दबाव में न दिखें और बिल के फायदे जोर शोर से गिनाते रहें। संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू लगातार कांग्रेस नेताओं का उपहास उड़ा रहे थे। कांग्रेस यह मानकर चल ही रही थी कि इस बिल पर सरकार अड़ी रहेगी और सोनिया राहुल गांधी मोदी को किसान विरोधी कहते रहेंगे। पर मन की बात में प्रधानमंत्री ने 31 अगस्त के बाद इस अध्यादेश को न बढ़ाने की बात कही तो सबका अकचकाना स्वाभाविक था। विपक्ष ने एक सुर से कहा कि यह हमारे विरोध का नतीजा है। पर क्या यह पूरी तरह सही होगा? अगर सिर्फ यही कारण होता तो यह दबाव सत्र के दौरान ज्यादा दिख रहा था। बिल पार्लियामेंट्री कमेटी के पास पहले ही चला गया था। फिर अचानक सरकार ने ये फैसला क्यों लिया?

दो बड़े कारण थे। एक बिहार चुनाव में विपक्ष की रणनीति। दूसरा बिल के सकारात्मक पहलुओं को ठीक से प्रस्तुत न कर पाने की अक्षमता। भाजपा के प्रवक्ता और मंत्री मीडिया में बिल को लेकर न तो आलोचकों को चुप कर पा रहे थे और न ही अपनी बात रख पा रहे थे। इस सच को मोदी भी स्वीकार कर चुके थे। संभवत इसीलिए उन्होंने कहा कि मैंने देखा कि इतने भ्रम फैलाए गए, किसानों को भयभीत कर दिया गया। इसका मतलब साफ था कि उनके योद्धा किसानों के मन तक अपनी बात पहुंचाने  असमर्थ साबित हो रहे थे। दूसरी ओर बिहार के चुनावी मैदान में महागठबंधन के नेताओं ने इस मसले को केंद्र में रखकर मोदी पर हमले की तैयारी की थी। पूरे चुनाव में इस बिल के बहाने मोदी को किसान विरोधी और कारपोरेट समर्थक बताने के लिए प्रचार अभियान तैयार हो चुका था। उधर भाजपा खेमें के कुछ रणनीतिकारों का मानना था कि इस बिल से तात्कालिक तौर पर कोई फायदा नहीं होने जा रहा। बल्कि चुनाव में और नुकसान होगा। अध्यादेश न बढ़ाने के फैसले से विपक्ष की तैयारी बेकार हो जाएगी और उसे नए अस्त्र ढूंढने में समय लगेगा। अगला सत्र चुनाव के बाद होगा तब तक के लिए किसान विरोधी होने के ठप्पे से पार्टी बच जाएगी और नुकसान जितना हो चुका था उससे आगे नहीं बढ़ पाएगा। हालांकि पीएम के इस कदम को किसान हितैषी बता रहे पार्टी प्रवक्ताओं को इस सवाल से काफी दिक्कत होगी कि अगर ये फैसला किसान हितैषी है तो पहले का फैसला क्या था?

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एक और कारण था। जब लैंड बिल के प्रारूप पर विचार हो रहा था तब कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने विकास कार्यों में भूमि अधिग्रहण की दिक्कतों की बात की थी। इसमें भाजपा के मुख्यमंत्री भी शामिल थे। बाद में कांग्रेस ने ही संसद में विरोध का नेतृत्व संभाल लिया था और उसके मुख्यमंत्री भी इस पर चुप्पी साधे रहे। अब केंद्र ने खुद को पीछे हटाकर राज्यों के उपर अपना कानून बनाने का जिम्मा डालकर उन्हें फंसा दिया है। इसीलिए अध्यादेश न बढ़ाने की घोषणा के दिन केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र सिंह ने कहा कि अब देखते हैं कि राज्यों की कांग्रेस की सरकारें विकास कार्यों के लिए कितने प्रतिशत सहमति का कानून बनाते हैं।

सच तो यह है कि यह मसला अभी खत्म नहीं हुआ है, सिर्फ टला है। अगले सत्रों में बिहार के चुनाव परिणाम के बाद इस पर विपक्षी खेमे में फूट पड़ सकती है। अगर भाजपा की सरकार बनती है तो कुछ दल कांग्रेस का साथ छोड़कर केंद्र सरकार के साथ सहयोग का रास्ता तलाशेंगे और उनके सुझाए कुछ संशोधन मानकर उन्हें यह रास्ता उपलब्ध करा दिया जाएगा या फिर राज्यसभा में अपने सदस्यों की संख्या बढ़ने का इंतजार किया जाएगा। मन की बात में इसीलिए मोदी ने कहा कि इस पर सरकार का मन खुला है। किसानों के हित में किसी भी सुझाव को में स्वीकार करने के लिए तैयार हूं।

 

 

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