नई दिल्ली। आमतौर पर कुश्‍ती को महिलाओं के लिए खास चुनौती का खेल माना जाता है, लेकिन इसी खेल में हरियाणा की पहलवान साक्षी मलिक ने एक नया रिकॉर्ड बनाया है। उनकी वजह से भारत के लिए रियो ओलंपिक में पदक का सूखा खत्म हो गया है। साक्षी ने महिला फ्रीस्टाइल के 58 किलोग्राम वर्ग में कांस्‍य पदक जीतकर भारत को रियो में पहला पदक दिलाया। उसने साढ़े सात घंटों के अंदर पांच फाइट पूरी की और इनमें से चार में जीत दर्ज की। कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक से पहले किसी भी महिला पहलवान ने ओलंपिक में पदक नहीं जीता था।

साक्षी ने जो चार मुकाबले जीते उनमें आखिरी के पलों में उन्होंने विरोधी पहलवान को चारों खाने चित किया। पूरे देश को गौरवान्वित करने वाली साक्षी रियो आने से पहले ही कह चुकी थी कि वह पदक जीतने के लिए जान लगा देगी और उसके मुकाबले देखकर आपको भी उसकी बातों पर यकीन हो जाएगा। साक्षी के पहलवानी में आने के पीछे उनके दादा जी का बड़ा हाथ है। साक्षी ने खुद बताया है कि उनके दादा जी पहलवान थे और उनके मेडल देखकर ही उनका मन इस खेल में आने के लिए करने लगा। हालांकि साक्षी की शुरुआत आसान नहीं थी और उन्हें इस मुकाम तक पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। साक्षी के बताया कि मुश्किल समय में उनके परिवार ने उनका पूरा साथ दिया और हमेशा उनका मनोबल बढ़ाया।

ओलंपिक में पदक जीतने वाली साक्षी पहली भारतीय महिला पहलवान भी बन गई हैं। उनसे पहले किसी भी महिला पहलवान ने ओलंपिक में पदक नहीं जीता है। वहीं कुल मिलाकर कुश्ती में यह भारत का चौथा पदक है। के.डी. जाधव ने 1952 में कांस्‍य पदक जीता था। इसके बाद 2012 ओलंपिक में सुशील कुमार ने सिल्वर और योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता था। ओलंपिक खेलों में यह किसी महिला द्वारा जीता गया चौथा पदक है। साक्षी से पहले कर्णम मल्लेश्वरी (वेटलिफ्टिंग), एम.सी. मैरीकॉम (बॉक्सिंग), सायना नेहवाल (बैडमिंटन) में कांस्‍य पदक जीत चुकी हैं।

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साक्षी इससे पहले 2014 ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेलों में भी भारत को पदक दिला चुकी हैं। उन्होंने भारत के खाते में रजत पदक डाला था। इसके अलावा उन्होंने 2015 सीनियर एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में भारत को कांस्‍य पदक दिलाया था। कुश्ती में घुसने के लिए साक्षी ने लड़कों से भी कुश्ती लड़ी है। उन्हें शुरुआती दौर में सामाजिक दबाव का भी सामना करना पड़ा कि लड़कियां पहलवानी नहीं करती हैं। लेकिन इस दौरान उन्हें अपने घरवालों का साथ मिला और साक्षी ने सारी आलोचनाओं को पीछे छोड़ते हुए कुश्ती के दांव-पेंच कोच ईश्वर दाहिया से सीखे। 2002 में उन्होंने दाहिया के अंडर कोचिंग शुरू की।