राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय में समाहित पृष्ठभूमि और विशेष पीठ के फैसले पर भी एक नजर डालते हैं।
यह विवाद पहली बार 1855 में उस समय सुर्खियों में आया जब अयोध्या में करीब 500 वर्ग गज की इस जमीन को लेकर वहां सांप्रदायिक दंगा हुआ। कहते हैं कि दंगे के बाद ही विवादित स्थल से सटी भूमि पर र्इंट की दीवार खड़ी करके इसे विभाजित किया गया था। जहां तक इस विवाद के न्यायिक संज्ञान में आने का सवाल है तो यह मामला पहली बार जनवरी, 1885 में अदालत में पहुंचा था। यह वाद महंत जन्म स्थान, महंत रघुबर दास ने 29 जनवरी, 1885 को काउन्सिल में भारत के सचिव के खिलाफ दायर किया था जिसमें मोहम्मद असगर ने एक अर्जी में खुद को बाबरी मस्जिद का मुतवल्ली बताते हुए इस वाद में पक्षकार बनाने का अनुरोध किया था।
यह वाद अयोध्या में स्थित चबूतरा जन्म स्थान पर मंदिर निर्माण की अनुमति और उनकी इस कवायद में प्रतिवादी को दखल देने से रोकने के अनुरोध के साथ दायर किया गया था।
इस मामले में फैजाबाद की अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि मंदिर निर्माण की अनुमति देने का मतलब वहां पर हमेशा के लिए दंगों की नींव डालना होगा। इसलिए अदालत ने महंत रघुबर दास का वाद खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ दायर अपील पर फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने 18 मार्च 1886 को अपना फैसला सुनाया था लेकिन इससे पहले न्यायाधीश ने 17 मार्च को विवादित स्थल का दौरा किया था।
न्यायालय ने हालांकि इस फैसले में संबंधित पक्षों को यथास्थिति रखने का आदेश दिया लेकिन इसमें यह भी लिखा था, ‘यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दुओं द्वारा विशेषरूप से पवित्र मानी जाने वाली इस भूमि पर मस्जिद का निर्माण किया गया परंतु यह घटना 356 साल पहले हुई थी। अब किसी भी समाधान के लिए बहुत अधिक देर हो चुकी है और सिर्फ यही करा जा सकता है कि सभी पक्ष यथास्थिति बनाए रखें।’ अदालत के इस फैसले के बाद तनातनी के बावजूद 22 दिसंबर, 1949 तक विवादित स्थल पर यथास्थिति बनी रही लेकिन इसके बाद एक घटना के साथ ही यह विवाद फिर शुरू हो गया था। दिलचस्प बात यह है कि भूमि को इस तरह से विभक्त करने का निष्कर्ष एक अप्रैल, 1950 को दीवानी न्यायाधीश द्वारा पहले वाद में नियुक्त कमिश्नर शिव शंकर लाल द्वारा तैयार नक्शे के आधार पर निकाला गया था। उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार मुस्लिम पक्षकारोंं ने इन नक्शों में दर्शाए गए परिमाप पर कोई आपत्ति नहीं की थी लेकिन उनकी आपत्ति कमिश्नर द्वारा अपनी रिपोर्ट में विभिन्न हिस्सों को दिये गए नामों पर थी, मसलन- सीता रसोई, भण्डार, हनुमान गढ़ी आदि। इन आपत्तियों को पहले वाद में 20 नवंबर, 1950 के आदेश में शामिल भी किया गया।
उच्च न्यायालय ने वाद की सुनवाई के निष्कर्ष के सार में कहा:
मस्जिद के रूप में विवादित ढांचे का निर्माण बाबर द्वारा या उसके आदेशों के तहत किया गया था।
किसी भी प्रत्यक्ष साक्ष्य से यह साबित नहीं हुआ कि निर्मित हिस्से सहित विवादित परिसर बाबर के थे या उस व्यक्ति के थे जिसने मस्जिद का निर्माण किया या जिसके आदेश के तहत इसका निर्माण किया गया था।
मस्जिद के निर्माण के लिए किसी मंदिर को नष्ट नहीं किया गया था।
मंदिरों के अवशेषों पर मस्जिद का निर्माण किया गया था जो मस्जिद के निर्माण से काफी समय पहले से ही खंडहर के रूप में बिखरे हुए थे और उनकी कुछ सामग्री का इस्तेमाल मस्जिद निर्माण में किया गया था।
मस्जिद का निर्माण होने से पहले काफी लंबे समय से हिन्दुओं का यह विश्वास था कि इतने विशाल क्षेत्र में, जिसके कुछ विवादित हिस्से के एक छोटे भाग में भगवान राम का जन्म स्थान है। हालांकि यह विश्वास इतने विशाल क्षेत्र के किसी छोटे विशिष्ट क्षेत्र से संबंधित नहीं है जिसमें विवादित परिसर बना हुआ है।
मस्जिद निर्माण के कुछ समय बाद ही हिन्दुओं ने, विवादित परिसर में भगवान राम के जन्म स्थल या वह स्थान जहां पर जन्म स्थान स्थित है, पहचान करना शुरू कर दिया।
1855 से भी काफी पहले राम चबूतरा और सीता रसोई अस्तित्व में आ गई थी और हिन्दू उनकी पूजा करते थे। यह बहुत ही अनोखी और अप्रत्याशित स्थिति थी कि चाहरदीवारी और मस्जिद परिसर के भीतर हिन्दुओं के धार्मिक स्थल थे जिनकी मस्जिद में मुसलमानों की नमाज के साथ ही पूजा अर्चना होती थी।
इस सार के मद्देनजर तो विवादित पूरा परिसर ही हिन्दुओं और मुसलमानों के संयुक्त कब्जे में था।
हालांकि दोनों पक्ष हिन्दू और मुसलमान सुविधा की खातिर विवादित परिसर के अलग अलग हिस्से पर काबिज थे और उनका उपयोग कर रहे थे।
दोनों ही पक्ष अपना मालिकाना हक साबित करने में विफल रहे, अत: साक्ष्य कानून की धारा 110 के अनुसार संयुक्त कब्जा होने के आधार पर दोनों को संयुक्त कब्जाधारक घोषित किया जाता है।
1949 से कुछ दशक पहले हिन्दुओं ने मस्जिद के मध्य गुंबद के नीचे के स्थान (जहां इस समय अस्थाई मंदिर है) को ही भगवान राम का जन्म स्थान मानना शुरू कर दिया।
मस्जिद के मध्य गुंबद के नीचे पहली बार 23 दिसंबर, 1949 को भोर पहर में मूर्तियां रखी गई थीं।
उपरोक्त तथ्यों के मद्देनजर दोनों पक्षों को विवाद में घिरे पूरे परिसर का संयुक्त रूप से मालिक और कब्जेदार घोषित किया जाता है और इस संबंध में इस शर्त के साथ प्रारंभिक डिक्री पारित की जाती है कि अंतिम डिक्री तैयार करने के चरण में वास्तविक बंटवारा करते समय मध्य गुंबद के नीचे का हिस्सा, जहां इस समय अस्थाई मंदिर है, हिन्दुओं के हिस्से में आवंटित किया जाएगा।

READ  कुमार विश्वास और सीएम अरविंद केजरीवाल के बीच बढ़ रही हैं दूरियां