संध्या द्विवेदी 

 दंगल फिल्म में एक डायलॉग है, ‘ सामने वाले को दांव दिखाओ दूसरा और मारो दूसरा।’ उत्तर प्रदेश चुनाव में कुछ ऐसा ही दांव मुलायम सिंह यादव ने भी चला है। बाप-बेटे की रोमांचक सियासी लड़ाई ने सबको हैरान कर दिया। लगा अब पार्टी दो-फाड़ हो ही जाएगी। कम से कम सियासी तौर पर तो बाप-बेटे एक दूसरे से दूर हो ही जाएंगे। सांस रोके बैठे न जाने कितने लोग, अपलक इस ऐतिहासिक घटना के गवाह बनने को तैयार ही बैठे थे। पर, आखिर में पार्टी नहीं बंटी।

मुलायम सिंह यादव यहीं पर नहीं रुके उन्होंने अखिलेश यादव को मुस्लिम विरोधी तक करार दे दिया। सुनने वालों को लगा नेता जी अखिलेश से नाराज हैं। पर यह भी उनका एक दांव ही था। नेता जी के इस बयान पर समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता कमाल फारुखी ने कुछ सवाल पूछे, उन्होंने कहा ‘मुलायम सिंह यादव से पूछिए कि अगर अखिलेश मुस्लिम विरोधी नेता हैं तो फिर क्या वह मुस्लिम हितैषी नेता हैं? मुजफ्फरनगर दंगों में मुलायम सिंह यादव ने दंगा पीड़ित मुस्लिम समुदाय के लिए क्या किया? दादरी कांड में अखलाक के घर जाकर कभी अफसोस जताया? जिया-उल-हक की हत्या पर उन्होंने कोई सख्त स्टैंड लिया? लेकिन आज वो अखिलेश को मुस्लिम विरोधी बताकर खुद को मुस्लिम हितैषी बता रहे हैं।

कमाल फारुखी के यह सवाल मायने रखते हैं क्योंकि मुजफ्फरनगर दंगों की कवरेज के दौरान दंगा पीड़ितों ने समाजवादी पार्टी से मेरे सामने खुलकर नाराजगी जताई थी। उन्हें अखिलेश यादव से ज्यादा उम्मीद मुलायम सिंह यादव से थी। मुआवजे और राहत कार्य को लेकर सवाल उठाए थे। लोगों ने आरोप लगाए थे कि प्रशासन उन पर जबरदस्ती हिंसाग्रस्त गांवों में लौटने के लिये दबाव बना रहा है। शरणार्थी कैंप में नेता जी ने जाकर लोगों का हालचाल तक नहीं लिया। अखलाक और जिया-उल हक के मामले में भी समाजवादी पार्टी की दूरी सबको साफ दिखी। तो एक बात तो साफ है कि मुस्लिम हितैषी का चोला पहने नेता जी खुद कितना मुस्लिमों के हमदर्द हैं यह कम से कम सियासत की समझ रखने वालों को पता है।

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 फिर इस बयान के मायने क्या हैं? साफ है वह चाहते हैं कि लोगों के बीच यह संदेश न जाए कि दरअसल यह बाप बेटे की नूराकुश्ती थी! जिसे जनता असली दंगल समझ रही थी। पर पब्लिक है यह सब जानती है! यह कहना अभी ठीक नहीं है, चुनावी नतीजे ही बताएंगे की पब्लिक कितना जानती है? बहरहाल इस लड़ाई में बाप और बेटे दोनों योद्धा के रूप में उभरे। नेता जी पार्टी को बचाना चाहते थे और अखिलेश अपना वर्चस्व साबित करना चाहते थे। देखने वालों को तो यही लगा कि नेता जी ने पार्टी बचाने के लिए बेटे से भी लोहा लिया। मतलब साफ है ‘ नेता जी को सिम्पैथी मिली तो अखिलेश एक जुझारु नेता के रूप में स्थापित हुए।

थोड़ा पीछे जाइये विरोध के बावजूद अखिलेश को मुख्यमंत्री पद का दावेदार नेता जी ने ही बनाया था। और आज देखिए इस सियासी दंगल में जब अखिलेश विजयी हो कर निकले तो नेता जी का यह आंकलन भी सही भी साबित हो गया कि अखिलेश ही उनके उत्तराधिकारी हैं। नेता जी यह फैसला भी आज बिल्कुल सही साबित हो गया। अब नेता जी मन ही मन कह रहे होंगे कि मैं न कहता था कि अखिलेश सपा में सियासी रण के माहिर हैं। इस लड़ाई में दरकिनार हुए तो शिवपाल और अमर सिंह। लेकिन पिक्चर अभी खत्म नहीं हुई है। अखिलेश यादव का सबसे ताजा बयान कि नेता जी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा, इस बात का संकेत है कि नेता जी अखिलेश यादव के लिए जमकर चुनाव प्रचार करेंगे।