हमने व्यवस्था बदली है, जिसका फायदा लंबे समय तक होगा : एसपी सिंह

ओपिनियन पोस्ट
Mon, 04 Feb, 2019 13:47 PM IST

किसी भी राष्ट्र की दिशा और दशा बदलने के लिए युवा शक्ति को जागृत करना बहुत जरूरी है. युवाओं के भीतर परिवर्तन की अपार संभावनाएं होती हैं. अगर युवा शिथिल हो गए, तो समाज शिथिल हो जाएगा और फिर देश के विकास का पहिया भी रुक जाएगा. लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति एसपी सिंह ने छात्र केंद्र्रित व्यवस्था अपना कर कई ऐसे परिवर्तन किए, जो उच्च शिक्षा में सुधार का मार्ग प्रशस्त करते हैं. पेश है, एसपी सिंह के साथ लखनऊ विश्वविद्यालय में किए गए सुधारों और उसके फायदों पर राजीव कुमार की बातचीत के प्रमुख अंश…

mp singhलखनऊ विश्वविद्यालय का कुलपति बनाए जाने के बाद आपकी पहली प्राथमिकता क्या थी?

मेरा मानना है कि कॉलेज या विश्वविद्यालय में किसी भी शिक्षक या प्रशासक की पहली और आखिरी प्राथमिकता छात्र होने चाहिए. वैसे तो बड़े पदों पर बैठे सभी लोग यही बात कहते हैं कि ऐसा होना चाहिए या फिर ऐसा किया जाना चाहिए. लेकिन, मैं समझता हूं कि जिसे करना चाहिए, अगर वही लोग यह बोलें कि किया जाना चाहिए, तो फिर करेगा कौन. इसलिए सबसे पहले मैंने ‘किया जाना चाहिए’ की धारणा तोड़ी. मैंने वे काम करने शुरू किए, जो ‘किया जाना चाहिए’ के नाम पर सालों से अटके पड़े थे. इसके साथ-साथ मैंने अपने 42 सालों के अनुभवों का इस्तेमाल करके छात्रों की ऊर्जा बेवजह नष्ट करने की प्रवृत्ति में सुधार की शुरुआत की. मेरी पहली और आखिरी प्राथमिकता छात्र हैं और वे यहां बेहतर शिक्षा पाने के लिए आते हैं, बेवजह के कामों में अपनी ऊर्जा बर्बाद करने के लिए नहीं. इसलिए उन्हीं को ध्यान में रखकर मैंने सारे सुधार किए हैं.

विश्वविद्यालय में सुधार की शुरुआत आपने कैसे की?

सबसे बड़ी बात तो यह है कि सुधार अगर सतत न हो, तो उसका कोई फायदा नहीं होता. इसलिए सुधार व्यवस्था में होना चाहिए, ताकि उसका फायदा लंबे समय तक होता रहे. एक ऐसी व्यवस्था बन जाए, जो स्वत: स्फूर्त बदलाव लाती रहे. इसी को ध्यान में रखते हुए मैंने सुधार की शुरुआत की. इसके लिए मैंने सबसे पहले पाठ्यक्रम में सुधार की ओर ध्यान दिया. कॉलेज में छात्र पढऩे के लिए आते हैं, लेकिन अगर पढ़ाई सही तरीके से न हो, तो शिक्षेत्तर गतिविधियों की ओर उनका ध्यान ज्यादा खिंचने लगता है. इसी के मद्देनजर मैंने सबसे पहले पाठ्यक्रम को थोड़ा आसान किया. उसे कई हिस्सों में बांटकर हरेक हिस्से को पूरा करने के लिए एक समय निश्चित किया. किस विषय के किस टॉपिक पर कितने लेक्चर हो सकते हैं और यह काम कितने समय में पूरा किया जा सकता है, इसकी रूपरेखा तैयार की. उसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अब छात्रों को भी यह पता लगने लगा कि उनका पाठ्यक्रम कब खत्म होगा और किस टॉपिक को कब पढ़ाया जाएगा. इससे शिक्षकों और छात्रों, दोनों के लिए लक्ष्य निर्धारित हो गया. दोनों को निर्धारित अवधि में पाठ्यक्रम पूरा करने की जिम्मेदारी मिल गई, जिसका बेहद सकारात्मक प्रभाव पड़ा.

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कॉलेज की शिक्षा किताब आधारित बनती जा रही है. छात्रों के हाथों में सर्टिफिकेट तो होता है, लेकिन व्यवहारिक ज्ञान नहीं. इस पर आपका क्या कहना है?

यह सच है कि शिक्षा प्रणाली समय के अनुकूल होनी चाहिए और इसके लिए निरंतर बदलाव की जरूरत होती है. अपने 42 सालों के करियर में मैंने इसे काफी करीब से देखा है और हर जगह कुछ न कुछ सुधार किए. यहां भी मैंने पाठ्यक्रम को वर्तमान समय की जरूरतों के अनुसार बनाया. पाठ्यक्रम के सैद्धांतिक हिस्सों के साथ-साथ व्यवहारिक हिस्सों पर भी जोर दिया. हर पाठ्यक्रम में 20 प्रतिशत अंक व्यवहारिक शिक्षा के लिए रखे. हर छात्र को अपने प्रोजेक्ट के लिए क्षेत्र में जाने को कहा गया. सरकारी योजनाओं के साथ इसे लिंक किया जाता है. छात्र क्षेत्र में सर्वे करके अपने प्रोजेक्ट के ऊपर रिपोर्ट तैयार करते हैं, जिससे उन्हें सैद्धांतिक के साथ-साथ व्यवहारिक शिक्षा भी प्राप्त होती है. राजनीति विज्ञान के छात्र को वर्तमान राजनीति के बारे में जानने और समझने का मौका मिलता है. इसी तरह अर्थशास्त्र का कोई छात्र अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बारे में पढ़ रहा है, तो उसे गांवों में जाकर वहां की अर्थव्यवस्था समझने का मौका मिलता है. इसलिए हमने पाठ्यक्रम का व्यवहारिक पक्ष मजबूत करके शिक्षा को वर्तमान समय के अनुकूल बनाने की पूरी कोशिश की है.

परीक्षा प्रणाली को लेकर काफी शिकायतें रहती हैं. प्रश्नों से लेकर जांच प्रणाली की अनियमितताओं तक पर सवाल उठते रहे हैं. इस व्यवस्था में सुधार के लिए आपने क्या किया है?

मैंने इस पहलू के ऊपर काफी काम किया है. पाठ्यक्रम में सुधार के साथ-साथ उसके परिणाम जानने का सबसे बड़ा साधन परीक्षा होती है. आपने छात्रों को क्या दिया है, इसकी जांच का यही एक माध्यम है. हमने इसके लिए प्रश्न के पैटर्न में परिवर्तन करने के साथ-साथ परिणामों की पारदर्शिता के ऊपर भी एक योजना बनाई और उसे कार्यान्वित किया. सबसे पहले प्रश्नों का प्रारूप बदलने की जरूरत थी, ताकि सही समझ का पता चल सके. इसके लिए हमने प्रश्न का प्रारूप विश्लेषणात्मक बनाया, जिससे छात्र मुद्दे के सारे पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी रख सकें. जांच प्रणाली को वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी बनाने के लिए कदम उठाए गए. छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच संबंधी शिकायतें दूर करने के लिए हमने एक पारदर्शी व्यवस्था स्थापित की. अगर कोई छात्र अपने अंक से संतुष्ट नहीं है, तो आरटीआई के माध्यम से वह अपनी कॉपी मांग सकता है. हम उसे जांची गई कॉपी दे देते हैं. इसके लिए उसे आने की जरूरत भी नहीं है, हम उसकी ई-मेल आईडी पर कापी भेज देते हैं. इसके बाद भी अगर वह असंतुष्ट है, तो दोबारा जांच की मांग कर सकता है. कुछ फैकल्टी, जहां छात्रों की संख्या कम है, वहां तो हमने सारी कॉपियां ऑनलाइन कर दी हैं, ताकि छात्र वहीं देख सकें और अगर वे जांच से संतुष्ट नहीं हैं, तो दूसरे परीक्षक से जांच कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं. यही नहीं, हमने शीर्ष स्थान लाने वाले छात्रों की कॉपियां सार्वजनिक करने की व्यवस्था की. उनकी एक हार्ड कॉपी लाइब्रेरी में रखने की व्यवस्था कर दी. इससे दो तरह के फायदे होते हैं. पहला यह कि दूसरे छात्रों को प्रेरणा मिलती है कि ऐसा लिखने पर इतने अंक मिल सकते हैं और दूसरा यह कि जांच में गड़बडिय़ां रोकना आसान हुआ. अब कॉपी जांचने वाले शिक्षक भी किसी तरह का पक्षपात करने से डरते हैं कि सारे लोग देख लेंगे कि किस तरह के उत्तर के लिए इतने अंक दिए गए हैं. इससे परीक्षा और जांच प्रणाली में पारदर्शिता आई है, जिससे छात्रों का विश्वास बढ़ा और पढ़ाई के प्रति उनकी रुचि भी बढ़ी.

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रोजगार परक पाठ्यक्रमों की दिशा में क्या काम किए गए? 

हमने कुछ ऐसे पाठ्यक्रम शुरू किए हैं, जिन्हें कॉरपोरेट सेक्टर की आवश्यकताओं के अनुसार डिजायन किया गया है, ताकि उन्हें पूरा करने के बाद नौकरी मिलने की प्रबल संभावना रहे. हमने जियोलॉजिकल एक्सप्लोरेशन फॉर माइनिंग नामक एक पाठ्यक्रम शुरू किया. यह एक साल का डिप्लोमा कार्यक्रम है, जिसमें 20 छात्रों ने प्रवेश लिया था. आपको बता दें कि उन सभी बीस छात्रों को विदेशों में नौकरी मिल गई. दरअसल, सामान्य तौर पर हम लोग अपना पाठ्यक्रम तैयार करते हैं और छात्रों को पढ़ाते हैं. उनमें से अच्छे छात्रों को कॉरपोरेट सेक्टर वाले अपने यहां नौकरी के लिए बुला लेते हैं. उसके बाद उन्हें अपनी आवश्यकता के अनुसार प्रशिक्षण देना पड़ता है यानी पैसा देकर वे प्रशिक्षण देते हैं. इसलिए हमने सोचा कि क्यों न उन्हीं से पाठ्यक्रम तैयार कराया जाए, ताकि यहां से निकलने के बाद छात्रों को किसी और प्रशिक्षण की जरूरत न रहे. यह प्रयोग सफल रहा और देखिए, अभी बीस में से बीस लोगों को विदेशों में नौकरी मिल गई. इसी तरह का एक कोर्स ओएनजीसी के सहयोग से कराने जा रहे हैं. इसके लिए ओएनजीसी के साथ एमओयू किया जा चुका है. वे सौ प्रतिशत प्रशिक्षण देंगे और नौकरी भी. इसके साथ-साथ हमने स्किल डेवलपमेंट एंड प्लेसमेंट सेल बनाया है, जिसके माध्यम से दो साल के अंदर हमने करीब 7,500 बच्चों को नौकरी दिलवाई.

यह युग तकनीकों का है. आपने इसका कितना इस्तेमाल किया और उससे क्या फायदा हुआ?

आजकल तकनीक का उपयोग आम बात हो गई है, लेकिन उसका बेहतर उपयोग करना बहुत जरूरी है. हमने इसका भरपूर इस्तेमाल किया. इसके माध्यम से छात्रों के समय, ऊर्जा और धन की बचत की. पहले परीक्षा के लिए फॉर्म भरना पड़ता था. पहले फॉर्म के लिए लाइन में खड़े रहो, फिर उसे जमा करो, उसके बाद एडमिशन कार्ड के लिए लाइन लगाओ जैसी बड़ी थकाऊ व्यवस्था थी. हमने यह खत्म कर दिया. अब छात्रों को एडमिशन के बाद कुछ नहीं करना होता है. हमने एडमिशन फॉर्म से ही परीक्षा का फॉर्म बना दिया. इसी डाटा बेस से हमने एडमिट कार्ड भी बना दिया. एडमिट कार्ड के साथ ही हमने परीक्षा की तारीख भी डाल दी. अब छात्रों को परीक्षा के लिए फॉर्म भरने, एडमिट कार्ड लेने, तारीख देखने आदि की चिंता नहीं रही. उन्हें एक ही जगह सारी सुविधाएं मिल गईं. इसके अलावा हमने पहली बार 650 कंप्यूटर की एक साइबर लाइब्रेरी बनवाई, जिसके पासवर्ड कॉलेजों के पास भी हैं. हमने यूनिवर्सिटी डाटा रिसोर्स सेंटर बनाया, जिसमें सारे छात्रों के ब्लड ग्रुप की जानकारी है. कभी किसी को ऐसी जरूरत हो, तो इसका इस्तेमाल आसानी से कर सकते हैं. देखिए, हमारी यूनिवर्सिटी बहुत बड़ी है. इसमें 22,000 छात्र तो केवल कैंपस के अंदर हैं. यहां 23 छात्रावास हैं, जिनमें करीब दस हजार बच्चे हमेशा बने रहते हैं. यही नहीं, 180 कॉलेज इससे संबद्ध हैं, जिनमें करीब एक लाख 75 हजार छात्र पढ़ाई करते हैं. इस तरह सभी को एक साथ इन सुधारों का फायदा मिल रहा है.

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इतने सारे सुधारों के लिए धन की व्यवस्था कहां से करते हैं?

वैसे तो इन सुधारों के लिए बहुत ज्यादा पैसों की जरूरत हुई नहीं, बल्कि कई कामों से तो पैसे बचे ही. उन्हीं बचे हुए पैसों का इस्तेमाल हमने दूसरी जगहों पर किया. हमने वित्तीय अनुशासन स्थापित किया. जो गलत पैसे खर्च हो रहे थे, उसे रोका. इस तरह पूरी यूनिवर्सिटी में एक साल में करीब आठ करोड़ रुपये की बचत हुई. इससे हमने कई इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किए. पिछले कई सालों से कक्षाएं नहीं बनी थीं, हमने करीब 72 कक्षाएं बनवाईं.

क्या आपको लगता है कि अभी बहुत सारे काम बाकी हैं?

बिल्कुल, अभी तो बहुत काम बचे हैं. मेरे कार्यकाल में अब केवल छह-सात महीने बचे हैं. लेकिन, लगता है कि जो बदलाव मैं करना चाहता हूं, उसके लिए काफी समय चाहिए. हालांकि, मैं अपने काम से काफी संतुष्ट हूं और जो व्यवस्था मैंने बनाई है, वह तो अब निरंतर चलती रहेगी. बहुत सारे काम बचे हुए हैं और समय बहुत कम है. देखते हैं, कितना हो सकता है.

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