मनरेगा में 500 करोड़ का घोटाला- झारखंड के अफसर खा गए तालाब और सड़क

उदय चंद्र सिंह
झारखंड के अधिकारी और इंजीनियर पिछले आठ साल में 500 करोड़ रुपये के सड़क, तालाब और भवन खा गए। यह सब हुआ महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट (मनरेगा) की आड़ में। 2007 से लेकर अब तक बिना जमीनी विकास के कागजों पर ही योजनाएं बनती रहीं और पैसे की बंदरबांट होती रही। चाईबासा में 150 करोड़, चतरा में 110 करोड़, गोड्‌डा में 80 करोड़, रांची, गुमला, खूंटी में 90 करोड़ और रामगढ़ में 60 करोड़ रुपये का हिसाब-किताब नहीं मिल रहा है। ग्रामीण विकास विभाग के राज्य मनरेगा कोषांग की जांच रिपोर्ट में इस बात का पता चलने के बाद झारखंड का सियासी पारा गरमाया हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार, आठ वर्षों में अधिकारियों और इंजीनियरों ने मिलकर मनरेगा में 500 करोड़ रुपये का घोटाला कर डाला। मस्टर रोल, एमबी बुक और स्टीमेट सरकार को नहीं सौंपना इस घोटाले का पुख्ता सबूत है। अफसरों व इंजीनियरों ने सड़क, तालाब, कुआं व चेक डैम आदि बनाने के नाम पर पहले एडवांस एलॉटमेंट कराया और फिर कागज में ही योजनाओं को पूरा दिखा कर राशि हड़प ली। घोटाले से संबंधित कई पत्र व फाइलें अब गायब हैं। मसलन, चाईबासा में 2011 में डुमरीता आरईओ से दो किमी सड़क बननी थी। इसके लिए 13.78 लाख रुपये का आवंटन हुआ। कागजों पर सड़क बन गई लेकिन धरातल पर वो आज भी गायब है। इसी तरह चाईबासा के ही मनोहरपुर प्रखंड में सामुदायिक भवन के निर्माण के लिए 5.36 लाख रुपये का आवंटन किया गया। कागज में जिस जगह सामुदायिक भवन खड़ा दिखाया गया है वहां परती जमीन है।

आरोपों के घेरे में अफसर

सात जिलाधिकारी – एमपी मिश्रा ,आरएस वर्मा, एमपी सिन्हा, सुनील कुमार, के श्रीनिवासन, बीके मुंडा, ए सिद्दीकी पी
सात डीडीसी – गोसाई उरांव, राम बच्चन राम, सुरेश प्रसाद वर्मा, विष्णु कुमार, आभा कुसुम, बाल कृष्ण मुंडा, चंद्रशेखर प्रसाद
नौ डायरेक्टर – गोसाई उरांव, एसके किस्पोट्‌टा, पी उरांव, अवधेश उपाध्याय, एनकेपी सिंह, कामेश्वर प्रसाद, दिलीप तिर्की, बीके मुंडा, नरूल होदा
पांच एक्जीक्यूटिव इंजीनियर – नंद किशोर प्रसाद, विजय कुमार दास (दो कार्यकाल), लेवा मिंज, रामाशीष राम और जगदीश साह
चार असिस्टेंट इंजीनियर – पंकज कुमार झा, महेश प्रसाद, विशाल खलखो, प्रेम कुजूर
पांच कर्मचारी – रामाकांत प्रधान, आशुतोष गोराई, के किशोर, हरी पुरती, एके मिश्रा

वैसे झारखंड में मनरेगा में भ्रष्टाचार का मामला कोई नया नहीं है। मनरेगा के 10 साल पूरे हो गए हैं। इस दौरान सूबे को उपलब्धि कम और बदनामी ज्यादा झेलनी पड़ी है। मनरेगा में गड़बड़झाला के मामले में झारखंड देश के शीर्ष पांच राज्यों में शुमार है। झारखंड से केंद्र को 140 शिकायतें मिली है। ताजा घोटाले में आईएएस अफसर से लेकर क्लर्क तक शामिल हैं। राज्य मनरेगा कोषांग के विशेष कार्य पदाधिकारी दिवाकर चंद्र झा ने जांच रिपोर्ट में कहा है कि मस्टर रोल, एमबी बुक व स्टीमेट सरकार को नहीं सौंपना इस बात का पुख्ता सबूत है कि एडवांस राशि का गबन हुआ है। उन्होंने डीएम, डीडीसी, डायरेक्टर, एक्जीक्यूटिव इंजीनियर, असिस्टेंट इंजीनियर और कर्मियों को दोषी ठहराया है।

नियमों को दरकिनार कर अफसरों ने ना तो कैश बुक में हिसाब की एंट्री कराई और फिर कैश बुक का मेंटेनेंस मनरेगा योजना से अलग व्यक्तियों से कराया गया। इतना हीं नहीं एनआरईपी व इंजीनियर दफ्तर में मस्टर रोल, मापी पुस्तिकाएं, निर्गत पंजी और मूवमेंट रजिस्टर भी मेंनटेन नहीं किया गया। जिलाधिकारी के आदेश दिए जाने के बावजूद जॉब कार्ड, निबंधित पंजी एवं मस्टर रोल संबंधित प्रखंड विकास पदाधिकारियों या प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारियों से प्राप्त नहीं हुआ। और तो और एक्जीक्यूटिव इंजीनियरों ने सीधे जूनियर इंजीनियरों और एजेंटों को काम के लिए एडवांस में करोड़ों रुपये दे दिए। जूनियर इंजीनियरों के प्रभार में न तो कैश बुक होता है न ही तिजोरी। इसके बावजूद करोड़ों एडवांस लेकर निजी खाते में रखा और सरकार को इस राशि पर मिलने वाले ब्याज का नुकसान पहुंचाया।

MNAREGA2झारखंड विधानसभा में यह मुद्दा उठा तो विपक्ष की चिंता इस बात पर थी कि इस मामले में सिर्फ छोटे अफसरों पर हीं क्यों कार्रवाई हो रही है। आईएएस और दूसरे बड़े अफसरों पर क्यों नहीं। विधानसभा में इस मुद्दे को उठा चुके झारखंड मुक्ति मोर्चा के दशरथ गगराई कहते हैं कि छह आईएएस अफसरों, 17 जेएसएस और छह कार्यपालक अभियंता के खिलाफ दोष साबित हो चुका है तो फिर सरकार कार्रवाई के लिए किस बात का इंतजार कर रही है। साफ है कि रघुवर दास सरकार दोषियों को बचा रही है। लेकिन झारखंड के मुख्यमंत्री विपक्ष के इन आरोपों से सहमत नहीं हैं। विधानसभा में इस मुद्दे पर विपक्ष के हंगामे के बाद सरकार की तरफ से ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा के दिए जवाब से जब विपक्ष संतुष्ट नहीं दिखा तो खुद मुख्यमंत्री को भरोसा देना पड़ा कि इस मामले में जो भी दोषी होगा उसे बख्शा नहीं जाएगा।मजेदार तथ्य यह है कि विधानसभा में हंगामे के बावजूद विभागीय सचिव को अभी इस घोटाले के बारे में पूरी जानकारी ही नहीं है। ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव एनएन सिन्हा कहते हैं कि चाईबासा में मनरेगा योजनाओं में गड़बड़ी हुई है। जांच भी हुई है और कार्रवाई का आदेश भी। लेकिन यह मामला पूरी तरह से मेरी जानकारी में नहीं है। दूसरी तरफ ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ मुंडा यह मानने को तैयार नहीं हैं कि यह घोटाला पिछले आठ साल से चल रहा है। उनके अनुसार यह मामला वर्ष 2012 से चल रहा है। विभागीय जांच भी चल रही है और आरोपी डीएम, डीडीसी और निदेशक के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। वो विपक्ष के इन आरोपो को सिरे से खारिज करते हैं कि सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई हो रही है ।

मुंडा के अनुसार, चतरा जिले में तीन इंजीनियरों को निलंबित कर विभागीय कार्रवाई और पैसों की वसूली हो रही है। गोड्डा के डीएम और डीडीसी के खिलाफ 35 लाख रुपये के गबन मामले में भी विभागीय कार्रवाई की जा रही है। कार्यपालक अभियंता की पेंशन राशि से 25 फीसदी की कटौती और सहायक अभियंताओं पर अभियोजन की स्वीकृति दी गई है।

सरकार बेशक कार्रवाई की बात कह रही हो लेकिन इस मुद्दे पर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सुझावों में दम नजर आता है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि 12 फीसदी ब्याज सहित असमायोजित अग्रिम एवं प्रतिवेदित गबन की राशि दोषी दाधिकारियों के वेतन सहित अन्य स्रोतों से वसूल की जाए।

मनरेगा के लिए दस सालों में आठ लोग शहीद

झारखंड में मनरेगा में फैले भ्रष्टाचार को खत्म कराने में आठ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इनमें से सात लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई। वहीं एक कार्यकर्ता ने सरकारी अधिकारियों की कमीशनखोरी से तंग आकर आत्मदाह कर लिया। सोशल वर्कर ललित मेहता की हत्या पलामू के कांडा घाटी के जंगल में कर दी गई थी। उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत मनरेगा के भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए सोशल आॅडिट रिपोर्ट की मांग की थी।

साल 2008 में हजारीबाग जिले में सरकारी कर्मियों से तंग आकर तापस सोरेन ने सरेआम आत्मदाह कर लिया। गिरीडीह में ठेकेदारों ने भाकपा माले नेता कामेश्वर यादव की हत्या कर दी। पलामू के तुरिया मुंडा, जग्गू भुईयां, शिव शंकर साव, हजारीबाग के सुबल महतो व लातेहार के नियामत अंसारी की भी बेरहमी से हत्या कर दी गई। वैसे भी केंद्र की निगाह में झारखंड के मजदूर सबसे सस्ते हैं। इसीलिए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने यहां मनरेगा मजदूरों की मजदूरी सिर्फ 162 रुपये प्रतिदिन तय की है। हरियाणा के मजदूरों के लिए यह राशि सबसे अधिक 250 रुपये प्रतिदन है। वैसे झारखंड में अकुशल मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 178 रुपये प्रतिदिन तय है। ऐसे में कोई क्यों मनरेगा में रोजगार तलाशेगा। 36 लाख परिवारों में सिर्फ 11 लाख परिवार ने ही मनरेगा में काम मांगा।

 

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