हिन्दी से इश्क करते रहना- आशीष चौधरी

हिन्दी में नित नए पाठक जुड़ रहे हैं। नित नए लेखक आ रहे हैं। इन लेखकों के पास उस तरह से नाम भले ना हो जैसा कि हिन्दी के लेखकों के पास एक अरसे पहले हुआ करता था, लेकिन इनके पास हिन्दी में करने के लिए काम बहुत है। आशीष चौधरी उन लेखकों में से एक हैं जिन्हे पढ़ने वालों की तादाद लंबी हैं। जो काम के साथ नाम भी कमा रहे हैं। प्रेम, इश्क, मोहब्बत शब्द इनकी लेखनी में भरपूर हैं, शायद यही वजह है कि युवा पीढ़ी इन जैसे लेखकों से जुड़ रही है और हिन्दी के पाठको में दिन ब दिन इजाफा हो रहा है। हजारों की संख्या में पढ़े जाने वाले युवा लेखक हिन्दी को अपनी लेखनी का माध्यम क्यों बनाते हैं इसकी पड़ताल के लिए लेखक आशीष चौधरी से बात की निशा शर्मा ने

लेखक बनने का सपना था या लिखने लगे और हो गए लेखक। 

सपना तो सुपर कमांडो ध्रुव बनने का था, जो बाद में कैप्टन जैक स्पैरो पर आकर ठहरा। वैसे बरसों पहले एक बात मालूम हो गई थी कि एक ही काम है जो मैं सीख सकता हूं और वो है कहानी सुनाने का। बस तब से लगातार सीख रहा हूं। लेखक बनने की प्रक्रिया में हूं। 

लेखक जो लिखता है वह किसी ना किसी से प्रेरित होता है, आप किससे प्रेरित होकर लिखते हैं। 

हर आदमी चेहरे पर एक कहानी छापे घूम रहा है। बस उसे पढ़ने की फिराक में रहता हूं। बचपन से लेकर अब तक बहुत शहर बदले हैं। बहुत स्कूल बदले, काॅलेज बदले। किराए के घर बदले। इसी सफर में बहुत किरदार मिलते गए, जो अब लिखते हुए बहुत काम आते हैं। अच्छा लिखने के लिए बहुत अच्छा पढ़ना ज़रूरी है। न भी पढ़ो तो आब्जर्वेशन बहुत जरूरी है। मैं लिखने से कुछ महीने पहले पढ़ना बंद कर देता हूं। 

आपकी कहानियों में मोहब्बत के किस्से हैं। यह आपके खुद के हैं या सिर्फ कल्पना।

देखिये जिसे हम कल्पना कहते हैं वो भविष्य का सच है। मेरे किस्सों में जो मोहब्बत है वो सब कहीं ना कहीं मेरे सामने से गुजरी है। मैं नीरस इंसान हूं, आसानी से मोहब्बत होती नहीं। इसलिए अधिकतर किस्से उधारी के हैं। 

लिखने के लिए हिंदी भाषा को चुना जबकि हिंदी के लेखकों को पढ़ने वालों की संख्या सीमित है। 

हिंदी मेरे बचपन की भाषा है, मेरी नानी की भाषा है, बचपन वाली कहानी की भाषा है। मैं इसमें खुद को बिना किसी बनावटीपन के व्यक्त कर पाता हूं। मुझे बचपन में किसी ने नहीं पूछा बेटा तुम्हारी नाॅजी कहां है? पापा की पहली डांट हिंदी में थी, और स्कूल भी हिंदी मीडियम ही था। तो कुल मिलाकर संस्कार हिंदी के रहे। अब आपका यह कहना कि हिंदी कम लोग पढ़ते हैं तो, मैं असहमत हूं। मेरी किताब हज़ारों ने पढ़ी। रोज़ नए पाठक जुड़ रहे हैं। और अगर आपका कथन अंग्रेजी के पाठकों की तुलना में कमतरी की ओर इशारा कर रहा है तो हां यह सही है। पर अब बाजार बदल रहा है। हिंदी अब इन है, कूल है। 

लिखते वक्त डर नहीं लगा कि किताब बिकेगी भी या नहीं, कोई छापेगा भी या नहीं। 

बिल्कुल नहीं। अपने आप पर भरोसा होना चाहिए। मैंने अपनी पहली किताब 2007 में लिखी थी। लेकिन उसे छापने के लिए कहीं नहीं गया। इसे लिखना खुद को व्यक्त करना था। फिर 2015 में मैंने इसे पब्लिश कराने के बारे में सोचा। और खुशकिस्मती से पहले ही पब्लिशर ने हां बोल दिया। मुझे नहीं लगता कि हिंद युग्म के अलावा कोई प्रकाशक इसे छापने का जोखिम लेता।

 भविष्य में खुद को कहां देखते हैं, एक लेखक के तौर पर या कुछ और। 

लिखना शौक के तौर पर शुरू किया था। अब सिर्फ यही करता हूं। हालांकि तमन्ना है कि एक स्टोरी टेलर के तौर पर जाना जाऊं। फिर कहानी लिख कर सुनाऊं या फिल्म बनाकर। 

नया क्या लिख रहे है

इस सवाल का पहले सवाल के बाद से इंतज़ार था। अपनी अगली किताब पर काम कर रहा हूं। इसी साल के अंत तक संभवतः चाहने वालों के हाथ में होगी। दरअसल थोड़ा आलसी हूं इसलिए वक्त लग गया। वैसे भी मोहब्बत वाली कहानी जितनी देर तक पके उतना ज्यादा स्वाद देती है। इसके अलावा एक टीवी सीरियल लिख रहा हूं, जल्द ही प्रसारित होगा। बाकी इस साल एक नाटक भी लिस्ट में है।

आपसे किसी ने कभी पूछा है कि लिखते हो ये तो अच्छी बात है, पर करते क्या हो!

नहीं। मैंने लेखन को ही अपना पेशा बनाया। और जब पेशे से पैसा आने लगे तो कोई कुछ नहीं पूछता। मैं पिछले बारह सालों से सिर्फ लिख कर या अपने लिखे हुए को फिल्मा कर ही कमा रहा हूं। इसके अलावा और कुछ नहीं करता। यह सिर्फ एक नकारात्मक सोच है कि हिंदी राइटिंग में पैसे नहीं है। बहुत हैं, इतने कि आप अंग्रेजी में गिनने लगेंगे। फिलहाल बीबीसी के साथ क्रिएटीव राइटर के तौर पर जुड़ा हूं।

घर की तरफ से केाई दबाव नहीं था, डाॅक्टर इंजीनियर वाला ?

शुरू में था। पापा न्यायिक सेवा में हैं, आस पड़ौस में सब कानून वाले थे। और मैं कानून को अपने हाथ में नहीं लेना चाहता था। हालांकि यह बात पापा जानते थे। इसलिए कभी दबाव नहीं डाला। कभी यह नहीं पूछा कि कितना कमाते हो और ना ही कि कहां काम करते हो। बस अब भी इतना ही पूछते हैं, खुश तो हो ना !

अपनी पहली किताब के बारे में बताइये?

कुल्फी एंड कैपुचीनो, नाम है इस किताब का। जवानी, दो्स्ती, प्रेम, बंधन और कंफ्यूजन की कहानी है। मुझे लगता है कि कई बार हम लिखते हुए कहानी पर हावी हो जाते हैं। और अपनी बौद्धिकता को कहानी पर लादकर उसकी पसलियां तोड़ देते हैं। मेरी कहानी का नायक अनुराग है और वो ही अपनी कहानी सुनाता है। इसमें आशीष चौधरी कहीं नहीं है। जो है अनुराग है।

पाठकों को लगता है कि आप ही अनुराग है?

इसे ही मैं लेखन की सफलता मानता हूं। हालांकि मैं इससे इन्कार नहीं करता लेकिन हां में गर्दन भी नहीं हिलाता।

अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए क्या करते हैं?

अच्छी बात यह है कि अब सोशल मीडिया है। पाठकों से सीधे संपर्क में रह सकते हैं। फूल और कांटें सब यही हैं, अब कयामत के दिन का इंतज़ार नहीं करना होता। रोज़ दिन का एक घंटा मैं पाठकों के आए मेल्स और सोशल मीडिया पर आए संदेशों के जवाब देने के लिए अलग से निकालता हूं।

 आप अपने पढ़ने और चाहने वालो से क्या कहना चाहेंगे।

 बस हिंदी से इश्क करते रहना।

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