प्रदीप सिंह।

दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजे में भाजपा की जीत बड़ी है या आम आदमी पार्टी की हार। भाजपा के पक्ष में इस समय पूरे देश में हवा चल रही है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों पर भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के बाद भाजपा एक के बाद एक जीत दर्ज कर रही है। इसलिए भाजपा की जीत प्रत्याशित थी। एक ही सवाल था कि क्या एमसीडी पर भाजपा के दस साल के शासन के बाद दिल्ली का मतदाता किसी और को आजमाना चाहेगा। उसके सामने दो विकल्प थे। एक सनातन कांग्रेस और दूसरा, पहली बार निगम चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी। दो साल पहले ही दिल्ली के लोगों ने आम आदमी पार्टी को उम्मीद से और अब कह सकते हैं कि हैसियत से ज्यादा समर्थन दिया। दिल्ली में मिले जनादेश से अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने मान लिया कि अब पूरा देश उनको स्वीकार करने को तैयार है। सो केजरीवाल दिल्ली को भूल गए और पंजाब, गोवा और गुजरात में पैर पसारने की कोशिश करने लगे। उन्हें लगने लगा कि बस उनके जाने की देर है, जिस राज्य में जाएंगे लोग हाथों हाथ लेंगे। राजनीतिक महत्वाकांक्षा होने में कोई बुराई नहीं है। पर वास्तविकता को ताक पर रखकर अंधे कुएं में छलांग लगाने का जो नतीजा होता है वही केजरीवाल के साथ हो रहा है। आधी छोड़ पूरी को धावे आधी मिले न पूरी पावे। केजरीवाल को लगा कि दिल्ली तो जेब में है उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है। बात यहीं तक रहती तो शायद गनीमत होती। उन्होंने एक नई राजनीतिक संस्कृति ईजाद की जिसमें किसी संवैधानिक संस्था या उस पर बैठे किसी व्यक्ति के साथ मर्यादित व्यवहार करने की मनाही है। देश में बोलने की आजादी है। केजरीवाल और उनके साथियों का मानना है कि उन्हें गाली देने और बेबुनियाद आरोप लगाने का मौलिक अधिकार भी मिला हुआ है।

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इस चुनाव के नतीजे से मतदाता ने राजनीतिक दलों और नेताओं को एक बार फिर संदेश दिया है कि वह जिसे सिर माथे बिठाती है, निराश होने पर उसे रौंद भी सकती है। इसलिए लक्ष्मण रेखा न लांघें। इसलिए दिल्ली नगर निगम चुनाव में भाजपा की जीत पर आम आदमी पार्टी की हार हावी है। आम आदमी पार्टी की हार जनतंत्र के स्वास्थ्य के लिए शायद जरूरी थी। जब एक निर्वाचित मुख्यमंत्री अपने ही राज्य के लोगों को धमकी देता है कि उसके विरोधी दल को वोट दिया तो बीमारी से अपने बच्चों की मौत के जिम्मेदार खुद होगे तो समझ लेना चाहिए कि बीमारी गंभीर है। पिछले दो सालों में केजरीवाल का जैसा राजनीतिक पतन हुआ है शायद ही किसी नेता का हुआ हो। सिर्फ चार साल पहले केजरीवाल जो कहें उस पर लोग भरोसा करने को तैयार थे। अचानक रातोंरात वे एक राष्ट्रीय राजनीतिक विकल्प नजर आने लगे। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी कहने लगे कि हमें आम आदमी पार्टी से कुछ सीखना चाहिए। ममता बनर्जी से लेकर नीतीश कुमार तक उनके साथ आने को बेताब दिखने लगे। दो साल में ही आम आदमी पार्टी का शिराजा बिखर गया। अरविंद केजरीवाल की किसी बात पर अब दिल्ली का मतदाता भरोसा करने को तैयार नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि राजनीति और शासन का तरीका बदलने के वादे के साथ आई पार्टी के लोग सत्ता में आकर खुद ही बदल गए। वे अपनी विशिष्टता की बात भूलकर जिन राजनीतिक दलों को भ्रष्ट बताकर आए थे, उन्हीं से अपनी तुलना करने लगे। इसलिए केजरीवाल अभी दिल्ली की गद्दी पर भले ही काबिज हों, दिल्ली की जनता के मन से उतर गए हैं।

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नगर निगम चुनाव की हार आम आदमी पार्टी के लिए चुनाव में हार जीत की सामान्य घटना नहीं है। इस नतीजे ने पार्टी के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर दिया है। कोई राजनीतिक विश्लेषक दावे के साथ नहीं कह सकता कि यह सरकार अपना निर्वाचित कार्यकाल पूरा करेगी। पार्टी में विरोध के स्वर उठने शुरू हो गए हैं। पार्टी से निकल कर गए नेताओं के हमले तेज हो गए हैं। छब्बीस अप्रैल (दिल्ली नगर निगम चुनाव के नतीजे का दिन) के बाद केजरीवाल पार्टी के निर्विवाद नेता नहीं रह जाएंगे। आने वाले दिनों में उनसे सवाल पूछे जाएंगे। सवाल पूछने की बारी इस बार उनके ही साथियों की होगी। उनके इक्कीस विधायकों की सदस्यता का मामला चुनाव आयोग के पास है। उनकी सदस्यता रद्द हो गई तो पार्टी में भगदड़ मचना तय है। यह केजरीवाल का बोया है जो वे आज काट रहे हैं। उनके सामने अब दो ही विकल्प हैं। एक, अपनी नकारात्मक राजनीति को छोड़कर उस रास्ते पर चलें जिसका लोगों से वादा किया था। दूसरा विकल्प उन्हें राजनीतिक वनवास की ओर ले जाता है। मतदाता ने उन्हें गोवा, पंजाब और अब दिल्ली में बता दिया है कि उसे उनकी राजनीतिक शैली पसंद नहीं है। वे सुधरने को तैयार नहीं थे तो मतदाता ने उन्हें दिल से उतार दिया है। आम लोगों के मन में जगह बनाने के लिए किसी राजनीतिक दल या नेता के लिए पहली आवश्यकता विश्वसनीयता अर्जित करने की होती है। दूसरी चीज होती है साफ नीयत। केजरीवाल के मामले में लोगों की नजर में उनकी विश्वसनीयता और नीयत दोनों ही संदिग्ध हो गई हैं।