क्‍या अभद्र टिप्‍पणी का मुद्दा विधानसभा चुनाव तक जीवित रह पाएगा?

ओपिनियन पोस्ट
Thu, 21 Jul, 2016 20:18 PM IST

वीरेंद्र नाथ भट्ट

लखनऊ। जिस फुर्ती के साथ बहुजन समाज पार्टी ने दया शंकर सिंह की टिप्पणी को मुद्दा बनाया उसने 2002 की उस घटना की याद दिला दी, जब मायावती ने प्रतापगढ़ जिले के कुंडा विधान सभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह ‘राजा भैय्या’ के खिलाफ कार्रवाई की थी। भाजपा के समर्थन से मायावती  गठबंधन  सरकार की मुखिया थीं और राजा भैय्या ने समाजवादी पार्टी के तत्कालीन महामंत्री अमर सिंह के साथ राज भवन जाकर गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने का पत्र राज्यपाल को सौंपा था। सरकार के बहुमत पर मंडराते खतरे को देख मायावती ने राजा भैय्या के खिलाफ घेरेबंदी शुरू कर दी। बुंदेलखंड क्षेत्र के विधायक बुन्देला को धमकाने के आरोप में लखनऊ के हजरतगंज थाने में मुकदमा दर्ज कर राजा भैय्या को  नवम्बर 2002 में गिरफ्तार कर लिया गया और एक महीने बाद जनवरी 2003 में उनके पिता  राजा उदय प्रताप सिंह और भाई अक्षय प्रताप सिंह को गिरफ्तार कर तीनो लोगों पर आतंवादी विरोधी कानून पोटा लगा दिया गया। पूरे प्रदेश में राजपूत राजनीति में उबाल आ गया, लेकिन मायावती को इस राजनीति में अपने भविष्य की राजनीति दिख रही थी।

मायावती ने उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख सवर्ण जातियों ब्राह्मण और राजपूत के मध्य सत्ता संघर्ष और अंतर्विरोध को अपने राजनीतिक लाभ के लिए भुनाने की पृष्‍ठभूमि तैयार करनी शुरू कर दी। अगस्त 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने आगरा के ताज हेरिटेज कॉरिडोर में घोटाले की सीबीआई जांच के बाद घोटाले में नाम आने के बाद मायावती को  मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद जन्म हुआ मायावती के नए सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला यानी `सर्व समाज’  जिसके तहत ब्राह्मणों को पार्टी से जोड़ने का अभियान छेड़ दिया गया और नारा दिया गया, ‘हाथी नहीं गणेश है,  ब्रह्मा विष्णु महेश है’.  हाथी बसपा का चुनाव चिन्ह है।

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2007 के विधान सभा चुनाव में मायावती को सोशल इंजीनियरिंग की नई रणनीति का भरपूर लाभ मिला और उत्तर प्रदेश के इतिहास में कांग्रेस और भाजपा के बाद किसी तीसरे दल ने विधान सभा में पूर्ण बहुमत हासिल किया। 2012 के विधान सभा चुनाव में सपा ने इस   इतिहास को दोहराया और पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। 2014 के लोक सभा चुनाव में 1989 के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश से बसपा को एक भी सीट नहीं मिली और भाजपा को  उत्तर प्रदेश की कुल 80 सीटों में 71 और उसके सहयोगी दल अपना दल को दो सीट पर विजय प्राप्त हुई। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव अब दूर नहीं है और मायावती के सितारे  गर्दिश में दिख रहे हैं। बसपा की वरिष्ठ नेता मायावती पर गंभीर आरोप लगा कर पार्टी छोड़ रहे हैं और यह लगभग मान लिया गया है कि बसपा को 2017 में ब्राह्मण वर्ग का समर्थन मिलना मुश्किल है। कांग्रेस की एक ब्राह्मण शीला दीक्षित को अपना मुख्यामंत्री पद का चेहरा घोषित किये जाने से मायावती की मुश्किलों में इजाफा ही हुआ है। भाजपा के पूर्व नेता दया शंकर सिंह की कथित अपमानजनक टिप्पणी को मुद्दा बना कर मायावती 2017 में अपने खोये हुए अच्छे दिनों को वापस पाने में जी जान से जुट गई हैं। अब केवल यह देखना शेष है कि क्या मायावती इस मुद्दे को 2017 के विधान सभा चुनाव तक ज़िंदा रख पाती हैं। एक राजनीतिक विश्‍लेषक का मत है, ‘डिजिटल युग में मुद्दों की सेल्‍फ लाइफ बहुत कम होती है।‘

 

 

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