ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य कार्रवाई का खतरा

डॉ. शफीक आलम
Fri, 08 Feb, 2019 15:17 PM IST

बगदाद और बसरा स्थित अपने राजनयिक ठिकानों के नजदीक हुई आतंकी वारदातों के बाद ईरान के प्रति अमेरिका की नजरें कुछ तिरछी हो गई हैं. शायद यही वजह है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के विकल्प तलाशे जा रहे हैं. अगर ऐसा हुआ यानी सैन्य कार्रवाई अथवा आर्थिक प्रतिबंध जैसी स्थिति पेश आई, तो ईरान के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है. 

iran economical restrictionईरान में इस्लामिक क्रांति की 40वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारियों के बीच यह खबर आई कि ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल सितंबर में बगदाद और बसरा स्थित अपने राजनयिक ठिकानों के नजदीक हुई दो आतंकी वारदातों के बाद ईरान पर सैन्य कार्रवाई के लिए पेंटागन से विकल्प तलाशने को कहा था. अमेरिकी अखबार ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ के खुलासे के मुताबिक, व्हाइट हाउस की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने जिस गंभीरता से ईरान पर हमले के विकल्प तलाशने को कहा था, उसने रक्षा एवं गृह मंत्रालय के अधिकारियों को हैरान कर दिया था. जाहिर है, ईरान पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई दोनों देशों के बीच एक बड़े संघर्ष का कारण बनेगी, साथ ही पहले से अस्थिरता से जूझ रहे इस पूरे क्षेत्र में सशस्त्र संघर्ष का एक नया दौर शुरू हो जाएगा.

ईरान पर सैन्य कार्रवाई की संभावनाएं तलाश करने का यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है, जब अमेरिका ईरान के विरुद्ध एक व्यापक क्षेत्रीय गठजोड़ बनाने और उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने के लिए लगातार प्रयासरत है. इसी क्रम में पिछले दिनों गृह मंत्री माइक पोम्पियो ने नौ खाड़ी देशों (जॉर्डन, इराक, मिस्र, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब एवं ओमान) का दौरा किया. इस सात दिवसीय दौरे में पोम्पियो ने ईरान के खिलाफ वारसव (पोलैंड) में होने वाले मंत्री स्तर के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का खाका पेश किया. इसके अलावा उन्होंने ईरान के खिलाफ इजराइल-अरब सहयोग पर जोर देते हुए कतर एवं अन्य पड़ोसी देशों के रिश्तों में आए गतिरोध खत्म करने पर भी जोर दिया. हालांकि, इस दौरे के बीच में जब पत्रकारों ने उनसे ईरान पर हमले के लिए पेंटागन से मांगी गई जानकारी के विषय में पूछा, तो उन्होंने उस पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया, लेकिन यह जरूर कहा कि ट्रंप प्रशासन ने मध्य-पूर्व के अपने एजेंडे को उच्च वरीयता दे रखी है.

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अमेरिका-ईरान दुश्मनी

दरअसल, अमेरिका और ईरान की दुश्मनी 16 जनवरी 1979 को रजा शाह पहलवी को अपदस्थ करने, ईरान को इस्लामिक गणराज्य घोषित करने और उसी साल अमेरिकी दूतावास बंधक कांड के बाद शुरू हो गई थी. उसके बाद ईरान को इराक के साथ तकरीबन एक दशक तक युद्ध करना पड़ा. उस युद्ध में भी, जिसे इराक-ईरान युद्ध के नाम से जाना जाता है, अमेरिका ने इराक का साथ दिया था. उस युद्ध के खात्मे के बाद ईरान ने शाह युग में शुरू हुए अपने परमाणु कार्यक्रम को रूस और चीन की मदद से पुन: जागृत किया. इस बार ईरान ने इस कार्यक्रम में यूरेनियम संवर्धन को भी शामिल किया. यूरेनियम संवर्धन से परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं, जिसे लेकर अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं इतनी बढ़ गईं कि अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले की योजना तक बना डाली थी. ईरान ने भी कहा कि जिस देश को बेस बनाकर उस पर हमला होगा, वह उस देश पर जवाबी हमला करेगा. साथ ही ईरान ने यह भी चेतावनी दी कि जो भी देश अमेरिका का सहयोग करेगा, वह उसे पेट्रोलियम सप्लाई बंद कर देगा. उस दौरान इजराइल ने भी ईरान पर रक्षात्मक (प्री-एमपटिव) हमले की चेतावनी दी थी. गौरतलब है कि इजराइल के खिलाफ सक्रिय शिया मिलिशिया हिजबुल्लाह को ईरान समर्थन देता रहा है, जिसे लेकर अमेरिका और इजराइल उससे नाराज हैं. वहीं इराक में अमेरिकी मौजूदगी के दौरान ईरान अपने शिया मिलिशियाओं के साथ हमेश सक्रिय रहा. शिया मिलिशिया बगदाद के ग्रीन जोन, जहां अमेरिकी दूतावास है, को राकेट और मोर्टार से हमेशा निशाना बनाते रहे. वहीं 2007 और 2011 के दौरान सक्रिय रहे दो ईरान समर्थित शिया मिलिशिया ग्रुप असाइब अहलल-हक और कताएब हिज्बोल्लाह ने पिछले चार सालों में अपना प्रभाव काफी बढ़ा लिया है. इन संगठनों ने धमकी दे रखी है कि अगर अमेरिकी सैनिकों को इराक में कहीं भी तैनात किया गया, तो वे उन्हें अपना निशाना बनाएंगे.

इस्लामिक क्रांति के 40 साल

ईरान में इस्लामिक क्रांति की वर्षगांठ एक से 11 फरवरी तक मनाई जाती है. इस उत्सव को दस दिवसीय फजर उत्सव भी कहते हैं. बीती 16 जनवरी को ईरान ने इस्लामिक क्रांति के 40 साल पूरे कर लिए. इसी दिन 1979 को ईरान के अंतिम बादशाह रजा शाह पहलवी ने देश छोड़ा था और फिर लौट कर वापस नहीं आ सके थे. हालांकि, फजर उत्सव के अवसर पर ईरानी हुकूमत ने 500 से अधिक विकास योजनाओं की घोषणा करने वाली है, लेकिन आर्थिक प्रतिबंध से जूझ रही मौजूदा सरकार के समक्ष कई चुनौतियां हैं. पहली चुनौती युवाओं को शांत रखने की है. पिछले साल की शुरुआत में ईरान की सडक़ों पर छात्रों एवं बेरोजगार नौजवानों के विरोध प्रदर्शन ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. उस विरोध प्रदर्शन के बाद बंद कमरों में चली अदालती सुनवाई के दौरान कई वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों को कैद की सजाएं सुनाई गई हैं. वहीं ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार महिलाओं ने तेहरान की सडक़ों पर अपने हिजाब उतार कर प्रदर्शन किया. ऐसे समय में, जब 2015 के बहुराष्ट्रीय परमाणु समझौते के कारण कट्टरपंथियों की आलोचना का सामना कर रहे राष्ट्रपति हसन रूहानी की लोकप्रियता अपने सबसे निचले स्तर पर है, ये सारी बातें ईरान के लिए खतरे की घंटी हैं.

 

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शिया-सुन्नी खाई और ईरान

जहां तक अरब देशों का ईरान से संबंधों का सवाल है, तो शिया बाहुल्य ईरान के प्रति सुन्नी अरब शासकों की आशंकाएं (शिया-सुन्नी की ऐतिहासिक दुश्मनी से इतर) शाह युग से चली आ रही हैं. दरअसल, अमेरिका ने शाह युग में ईरान को अरब देशों के ‘अभिभावक’ देश की तरह खड़ा किया था. लेकिन शाह को अपदस्थ किए जाने के बाद हालात ऐसे बदले कि फिर ईरान और अमेरिका कभी करीब नहीं आ सके. दूसरी ओर खाड़ी युद्ध में सद्दाम हुसैन के खात्मे और अरब स्प्रिंग के बाद मध्य-पूर्व में ईरान की ‘दखलंदाजी’ (शिया विद्रोहियों की पुश्त्पनाही) और ईरानी परमाणु कार्यक्रम के बाद शिया बाहुल्य ईरान और सुन्नी बाहुल्य अरब देशों में तनाव बढऩा लाजिमी था. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पर दबाव बनाने के लिए सऊदी अरब ने यहां तक कह दिया कि अगर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक नहीं लगाई गई तो वह भी परमाणु हथियार बनाएगा. यही नहीं, ईरान द्वारा पेश खतरे के मद्देनजर सऊदी अरब और अन्य अरब देशों ने इजराइल के साथ अपने रिश्ते सुधारने की कवायद शुरू कर दी है. इसी क्रम में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ओमान का दौरा किया. अमेरिका के गृह मंत्री माइक पोम्पियो की ईरान के खिलाफ इजराइल-अरब सहयोग की बात को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

अमेरिका की आक्रामक नीति

जानकारों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका के पूर्व राजदूत जॉन बोल्टन जबसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने हैं, उन्होंने ईरान पर पोम्पियो की आक्रामक नीति को और अधिक विस्तार दिया है. दरअसल, 2015 में अपने एक लेख में बोल्टन ने लिखा था कि ईरान अगर अमेरिका के सहयोगियों के लिए खतरा बनता है, तो उस पर बमों की बारिश की जानी चाहिए. अपने इस विचार को आगे बढा़ते हुए बोल्टन ने बगदाद और बसरा स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के नजदीक किए गए हमलों के बाद कहा कि अगर ईरान प्रोक्सी ताकतों के जरिये अमेरिकी हितों पर हमला करेगा, तो वह हमारी जवाबी कार्रवाई से बच नहीं सकेगा. यानी अमेरिका अपने हमले का विकल्प खुला रखेगा. बोल्टन के इस बयान और ईरान के परमाणु कार्यक्रम संबंधी 2015 के बहुपक्षीय समझौते से अमेरिका को अलग करने के डोनाल्ड ट्रंप के फैसले के बाद भारत और यूरोपीय देशों की चिंताएं बढ़ गई थीं. इस पर फिलहाल विराम लगाने के लिए ट्रंप ने बाद में इन देशों को आश्वस्त किया था कि वह मध्य-पूर्व में किसी नए संघर्ष की शुरुआत नहीं करेंगे. लेकिन, अब सवाल यह उठता है कि अगर ईरान भी 2015 के समझौते से खुद को अलग कर ले और अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम फिर से शुरू कर दे, तो क्या होगा, क्योंकि इस समझौते से अमेरिका के अलग हो जाने के बाद ईरान को वह आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा, जिसकी उसे उम्मीद थी.

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