अध्यात्म की अलग मार्केट बनाते हैं डेरे

निशा शर्मा

गुरमीत सिंह उर्फ बाबा राम रहीम जेल में दुष्कर्म के जघन्य अपराध की सजा काट रहा है। मामला यहीं खत्म नहीं होता। गुरमीत सिंह के सिरसा डेरे से लगातार खुलासे हो रहे हैं। कई सौ हथियार बरामद किए गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि लाखों लोग ऐसे बाबाओं की बातों या बहकावे में कैसे आ जाते हैं। यह जानने के लिए हमने पटियाला स्थित गुरु गोबिंद सिंह डिपार्टमेंट आॅफ रिलीजियस स्टडीज, पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गुरमीत सिंह सिद्धू से बातचीत की जिन्होंने स्टडी आॅफ रिलीजन पर रिसर्च किया है।

उन्होंने ओपिनियन पोस्ट को बताया कि पंजाब में दो तरह के डेरे हैं- एक जो सिख धर्म का प्रसार करते हैं तो दूसरे जो अपनी विचारधारा (आइडियोलॉजी) का प्रसार करते हैं। डेरों का प्रसार हरित क्रांति के बाद काफी तेजी से हुआ। उसके बाद अध्यात्म को इस तरह से प्रचारित प्रसारित किया गया कि उसकी भी एक मार्केट बन गई। साधु संतों ने लोगों की व्यक्तिगत भावनाओं से उसे जोड़ना शुरू कर दिया। गुरुद्वारों, मंदिरों में आध्यात्मिक शांति के लिए सिर्फ पंडित या ग्रंथी थे। ऐसे में समाज में एकता के तौर पर बिना जाति धर्म के डेरों की स्थापना शुरू हुई। डेरों की अपनी विचारधारा है पर धर्म या जाति का बंधन नहीं है। सिख, हिंदू या मुस्लिम कोई भी किसी डेरे का अनुयायी बन सकता है। उसे अपनी मूल पहचान छोड़ने की जरूरत नहीं है। डेरों में लोंगों की भाषा में उन्हें रास्ता दिखाने वाले गुरु बनते गए। आध्यात्मिक तत्व की जगह व्यक्तिगत तौर से लोगों की समस्याओं को सुनने के लिए गुरु की व्याख्या होने लगी। लोगों की समस्याओं का पूंजीवाद और समाजवाद से कोई समाधान नहीं मिला।
पंजाब में आर्थिक व सामाजिक भेदभाव किसी से छिपा नहीं है। सामंतवाद इस क्षेत्र में शुरू से रहा है जो दलित और ओबीसी समाज के प्रति उदार रवैया नहीं रखता था। ऐसा नहीं है कि परंपरा खत्म हो गई है। आज भी पंजाब और हरियाणा में ये परंपरा देख सकते हैं।
समाज में सम्मानजनक स्थान ही नहीं बल्कि कई ऐसे पहलू हैं जिनकी वजह से लोग इन डेरों की तरफ रुख करते गए। पहला और बड़ा पहलू व्यक्तिगत तौर पर जुड़ना है। वहीं दो मुख्य बातें हैं जिनकी वजह से लोग इनसे अभी भी जुड़ रहे हैं या लाखों की संख्या में जुड़े हैं।
1दौड़ती भागती दुनिया में लोगों को मानसिक शांति चाहिए, जो डेरों ने उनकी समस्या सुनकर ही उपलब्ध करा दी, क्योंकि यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके तहत कोई भी इंसान अपनी बात या समस्या अगर किसी से कहता है और अगर उसका समाधान मिल जाता है तो उसे मानसिक शांति मिल जाती है। प्रोबेबिलिटी के आधार पर देखा जाए तो सलाह से ही 50% समस्या का समाधान हो जाता है। जैसे किसी ने कहा हमें बेटा चाहिए, तो डेरों के बाबा उन्हें उपाय बताएंगे। अगर उन्हें बेटा हो गया तो वह अनुयायी हो जाएंगे। यही नहीं, अपने साथ दूसरों को भी जोड़ेंगे। अगर बेटा नहीं हुआ तो दूसरा बाबा ढूंढेंगे या दूसरे उपाय की तलाश करेंगे जिससे उन्हें शांति मिले। इस थ्योरी के हिसाब से इन जगहों पर हर वर्ग के लोग आते हैं। गरीब और अमीर। आज के समय में कोई कितना भी अमीर क्यों न हो, कोई कितना भी गरीब क्यों न हो, हर किसी के पास अपनी समस्याएं हैं। ऐसे में लोगों को सलाह की जरूरत पड़ती है।
2किसी भी धर्म में आप देखेंगे तो मन की शांति पाने के लिए धर्मात्मा (धर्म को मानने वाले) लोग सत्य के मार्ग पर चले हैं, उन्होंने कई कुर्बानियां दी हैं। जैसे-घर छोड़ा, पैसे का त्याग किया, सादा जीवन जिया। लेकिन आज के समय में पैसे की दौड़ में भागती दुनिया के लिए ऐसा करना मुश्किल है। आज लोगों को मानसिक शांति की जरूरत ज्यादा है। ऐसे में लोग पैसों को डेरों में दान कर सोचते हैं कि उन्होंने पुण्य कमा लिया। ऐसे में वे अपनी सहूलियत और धार्मिक काम दोनों को साथ-साथ करते हैं और मेहनत भी नहीं करनी पड़ती। ऐसे में इन डेरों में वे लोग भी आते हैं जो धनवान हैं या पढ़े लिखे हैं।
पंजाब में डेरों के फैलने का एक कारण आतंकवाद और ड्रग्स की समस्या भी है, जिसके चलते लोगों ने इनकी शरण लेनी शुरू की। डेरों ने समाज की भलाई जैसे कार्य शुरू किए, नशे की समस्या से जूझते लोगों के परिवारों व लोगों में आत्मविश्वास जगाया। इन डेरों में आज भी शराब व अन्य नशों के खिलाफ फरमान जारी किया जाता है। बड़ी संख्या में लोगों ने इन डेरों से जुड़ने के बाद नशा छोड़ दिया। साथ ही डेरों ने अपने शिक्षण व सेहत संस्थान स्थापित किए। गरीब और दलित वर्ग के बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। इन कार्यों से भी इन डेरों का प्रभाव पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में बढ़ा।
एक अध्ययन के मुताबिक, पंजाब में छोटे-बड़े, सिख और गैर सिख नौ हजार डेरे हैं। इनमें करीब तीन सौ प्रमुख डेरे हैं, जिनका प्रभाव पंजाब ही नहीं, आसपास के इलाकों में भी है। इनमें से सबसे बड़े बारह डेरे ऐसे हैं जिनके समर्थकों की संख्या लाखों में है। पंजाब और हरियाणा की सरजमीं पर फलने फूलने वाले डेरों में प्रमुख डेरे- राधास्वामी, सच्चा सौदा, निरंकारी, नामधारी, दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, डेरा संत भनियारावाला, डेरा सचखंड और डेरा बेगोवाल आदि शामिल हैं। इन डेरों की शाखाएं सूबे के सभी जिलो में हैं। कई डेरे तो देश के विभिन्न शहरों से लेकर विदेशों में भी स्थापित हो चुके हैं। सूबे में कुछ डेरे ऐसे हैं, जो एक ही धर्म के साथ जुड़े हैं। जैसे-रविदासियों का है। इस संदर्भ में कुछ प्रमुख डेरों पर एक नजर डालते हैं।

डेरा सच्चा सौदा
शाह मस्ताना महाराज ने 1948 में डेरा सच्चा सौदा की स्थापना की। 1960 में इसे संभाला शाह सतनाम महाराज ने और 1990 में गद्दी पर बैठा राम रहीम। सिरसा में बसे मुख्य डेरे के अलावा अकेले इसी शहर के आसपास सच्चा सौदा के 10 से 12 डेरे हैं। कुरुक्षेत्र, कैथल, हिसार, अंबाला, फतेहाबाद, जींद, करनाल जैसे शहरों में डेरा का खासा असर माना जाता है। सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों की संख्या करीब चार करोड़ मानी जाती है, जो कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व दिल्ली में हैं। पंजाब की सियासत के गढ़ मालवा की 35 सीटों पर डेरे का काफी प्रभाव है। 2007 में डेरे ने कांग्रेस को समर्थन दिया और बाद में बीजेपी को।

राधास्वामी डेरा
बाबा जरनैल सिंह ने 1891 में राधास्वामी डेरे की स्थापना की थी। यह डेरा हमेशा से सियासत से दूर रहा। समर्थकों की बड़ी संख्या के बावजूद डेरा चुनावों पर हमेशा मौन रहा। ब्यास स्थित राधास्वामी डेरे का दोआबा और माझा क्षेत्रों में मजबूत आधार है। पंजाब ही नहीं, कई राज्यों से लेकर विदेशों तक डेरे के समर्थक फैले हुए हैं। पंजाब ही नहीं, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में सभी जिलों में इनके सत्संग घर बने हुए हैं। पंजाब-हरियाणा के ज्यादातर डेरों के उलट राधास्वामी ब्यास के अनुयायी, बड़े लोग हैं। बड़े यानी रईस, इज्जतदार, रसूख वाले, पढ़े लिखे और सबसे बड़ी बात ऊंची जातियों वाले हैं। कहा यह भी जाता है कि कहीं न कहीं यह कांग्रेस के लिए मददगार था। होशियारपुर से कांग्रेस उम्मीदवार मोहिंदर सिंह केपी भी इस डेरे के समर्थक हैं। पर 2012 में कुछ कारणों से डेरे के संबंध अकालियों से भी जुड़ गए। कैबिनेट मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया की पत्नी डेरे के पूर्व प्रमुख चरन सिंह के परिवार से हैं।

डेरा सचखंड
जालंधर के बल्लन गांव के पास बसा है डेरा सचखंड बल्लन। इसे डेरा रविदासिया दा नाम से भी जाना जाता है। 15वीं सदी में हुए संत रविदास, भक्ति आंदोलन के अगुवा में से एक माने जाते हैं। साथ ही इन्होंने छुआछूत के खिलाफ अपनी रचनाओं से समाज में अलख जगाई। कहा जाता है कि बिरादरी के सभी फैसले यहीं से होते हैं। हालांकि डेरे का दोआबा में खासा प्रभाव है। डेरे ने वाराणसी में गुरु रविदास के जन्मस्थान पर धार्मिक स्थल का निर्माण कराया है। हर साल रविदास जयंती पर बड़ी तादाद में श्रद्धालुओं को वाराणसी ले जाया जाता है। इसके अलावा जहां भी रविदास बिरदारी के लोग ज्यादा हैं, वहां डेरे का प्रभाव भी है। डेरा हमेशा से शांतिप्रिय रहा है। पर 2009 में विएना में डेरा प्रमुख संत निरंजन दास जी पर हमला हुआ और उनके निकटतम सहयोगी संत रामानंद दास जी की मौत हो गई। उसके बाद डेरा समर्थकों ने जालंधर और आसपास के इलाकों में जम कर तांडव किया। डेरे ने किसी खास पार्टी के बजाय बिरादरी के उम्मीदवारों को तरजीह दी है।

निरंकारी
निरंकारी गुट इनमें सबसे बड़ा माना जाता है। हर साल इनका दिल्ली में विशाल समागम होता है। समागम के लिए दिल्ली में एक विशाल भूभाग है जहां तीन दिनों के लिए एक पूरा शहर सज जाता है। दो साल पहले निरंकारी प्रमुख बाबा हरदेव सिंह की एक दुर्घटना में मौत हो गई।

दिव्य ज्योति जागृति संस्थान (नूरमहल)
जालंधर के पास नूरमहल स्थित संस्थान का प्रभाव पंजाब ही नहीं, देश के कई हिस्सों में है। विदेशों में भी इसकी शाखाएं हैं। संस्थान की ओर से कई समाजसेवी कार्य किए जाते हैं। जेलों में कैदियों के लिए भी संस्थान की ओर से प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। यह संस्थान और इसके प्रमुख आशुतोष महाराज हमेशा कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं। लुधियाना में संस्थान के कार्यक्रम को लेकर काफी विवाद हुआ था। कांग्रेस और भाजपा नेताओं का इस जगह से जुड़ाव दिखता रहा है। संस्थान की वेबसाइट के मुताबिक 1983 में जब पंजाब आतंकवाद से जूझ रहा था, आशुतोष महाराज ने संस्थान की नींव रखी और ब्रह्मज्ञान के जरिये लोगों को जाग्रत किया। मीडिया रिपोर्टों की मानें तो आशुतोष महाराज का असली नाम महेश कुमार झा है और वह बिहार से पंजाब आकर बसे। बीते करीब साढ़े तीन साल से आशुतोष महाराज का शव डीप फ्रीजर में रखा है जिसे भक्त गहरी समाधि मानते हैं।

भनियारावाला डेरा
अपने को बाबा कहने वाले प्यारा सिंह भनियारा, रूपनगर जिले में भनियारा संप्रदाय चलाते हैं। उन पर एक विवादित किताब भवसागर ग्रंथ लिखने का आरोप है, जिसमें उनके चमत्कारों का वर्णन है। सिख संप्रदाय के लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के कारण 2001 में इस किताब पर रोक लगा दी गई थी। उनको गिरफ्तार भी किया गया था। इसको लेकर कई हिंसक घटनाएं भी राज्य में घटी थीं।

संत रामपाल
इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद रामपाल धर्मगुरु बना। एक शख्स की मौत के मामले में उन्हें 2014 में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन गिरफ्तार करने में पुलिस के पसीने छूट गए थे। फिलहाल वह जेल में है। रामपाल खुद को कबीरपंथी संप्रदाय से जोड़ता है। इस शख्स पर हिंसा में शामिल होने और कोर्ट की अवमानना का केस चल रहा है। 2014 में जब पुलिस बरवाला आश्रम में उन्हें पकड़ने गई तो इनके अनुयायी और पुलिस में हिंसक भिड़ंत हो गई थी।
उल्लेखनीय है कि सभी डेरे ऐसे नहीं हैं जैसा डेरा सच्चा सौदा निकला है। सभी में विपुल धन-संपत्ति इकट्ठा होने के कारण इस प्रकार के विचलन की संभावना जरूर है जैसा विचलन गुरमीत सिंह राम रहीम में देखने को आया। उम्मीद की जानी चाहिए कि लोग डेरा सच्चा सौदा के प्रकरण से कुछ जरूर सीखेंगे।

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