गोरक्षा और दलित

बनवारी

गुजरात के उना की घटनाओं ने गोरक्षा आंदोलन का असामाजिक चेहरा उजागर कर दिया है। वह अब गोरक्षा और गोसेवा का सामाजिक और रचनात्मक आंदोलन नहीं रह गया है, जो स्वरूप उसे गांधी जी ने दिया था। अब उसमें जातीय विद्वेष और सांप्रदायिक वैमनस्य की भावना वाले कुछ हिंसक और उत्पाती तत्व भी सम्मिलित हो गए हैं। उन्हें अपनी इन हिंसक प्रवृत्तियों के वीडियो बनाकर उन्हें सोशल मीडिया पर प्रचारित करने में न संकोच होता है और न भय। उन्हें लगता है कि गोरक्षा के नाम पर कोई भी बर्बरता बरती जा सकती है। गोरक्षा के नाम पर की जा रही ऐसी हिंसक घटनाएं किसी एक राज्य या राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं हैं। गोरक्षा एक देशव्यापी अभियान है। इसमें सभी वर्गांे और जातियों के लोग सम्मिलित हैं।

भारत में गोरक्षा और गोसेवा को सदा एक पवित्र और पुण्यदायी कार्य के रूप में देखा जाता रहा है। इसलिए गोसेवा और गोरक्षा के काम की कुछ सहज मर्यादाएं होनी चाहिए। ये मर्यादाएं निश्चित करने का काम गोरक्षा के उत्साही आंदोलनकारियों पर नहीं छोड़ा जा सकता। गोरक्षा के नाम पर बल प्रयोग की छूट किसी को नहीं दी जा सकती। यह जिम्मेदारी स्थानीय पंचायतों और नगर परिषदों पर डाली जानी चाहिए कि वे गोरक्षा आंदोलन की मर्यादाएं निश्चित करें। वे इस बात पर निगाह रखें कि गऊ को लेकर भारतीय समाज में जो श्रद्धा की भावना है, उसकी आड़ लेकर इस काम में असामाजिक तत्व सम्मिलित न हो जाएं। लेकिन पिछले कुछ दशक में गोरक्षा समितियों की बाढ़ आ गई है और उनमें सब तरह के लोग सम्मिलित हो गए हैं। वे भी जो सच्ची भावना से गोसेवा और गोरक्षा के काम में शामिल हुए हैं और ऐसे लोग भी जिन्हें किसी काम में हिंसा और उत्पात से कोई परहेज नहीं है।

उना में की गई बर्बरता के विरोध में अहमदाबाद से लेकर दिल्ली की संसद तक आवाज उठी। गुजरात में एक दलित आंदोलन आरंभ हो गया। गुजरात में दलित जातियों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। वे राज्य की कुल जनसंख्या का मात्र सात प्रतिशत हैं। उन्हें कभी बड़ी राजनीतिक चुनौती की तरह नहीं देखा गया। लेकिन उना जैसी घटनाओं से राज्य के प्रशासन और शासक पार्टी दोनों पर भी अनेक सवाल उठे। गोरक्षा आंदोलन के प्रति भाजपा की सामान्यत: जो सहानुभूति रहती है, उसके कारण भी राज्य की भाजपा सरकार और पार्टी दोनों को कठघरे में खड़ा किया गया। आनंदीबेन पटेल ने भले ही दलित आंदोलन के दबाव में इस्तीफा न दिया हो, उनके नेतृत्व पर शंकाएं उठीं। इन सब परिस्थितियों को भांपकर उन्होंने समय रहते मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। क्योंकि वर्ष के अंत में 75 वर्ष पूरे करने के बाद जब उन्हें हटना पड़ता, तब तक उनके नेतृत्व पर और दाग-धब्बे लग सकते थे। गुजरात की घटनाओं की सबसे अधिक प्रतिक्रिया उत्तर प्रदेश में हुई, जहां दलित जातियों की संख्या गुजरात से कहीं अधिक है और एक दलित नेता के रूप में मायावती अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में बराबर की शक्ति हैं। मुख्यत: उत्तर प्रदेश के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गोरक्षा आंदोलन में घुस आए असामाजिक तत्वों के प्रति इतनी सख्त टिप्पणी करनी पड़ी।

लेकिन उना की घटनाओं से भारतीय राजनीति में जो उबाल आया दिख रहा है, वह अधिक समय रहने वाला नहीं है। इससे पहले भी ऐसी घटनाएं हुई हैं और उनकी सीमित और तात्कालिक प्रतिक्रिया होती रही है। पर कुछ समय बाद हर घटना भुला दी जाती है, चाहे वह कितनी ही बर्बर और ग्लानिकारक क्यों न हो। उना की घटना का प्रभाव भी अधिक समय तक रहेगा, यह दिखाई नहीं देता। गुजरात में ही स्वयं नरेंद्र मोदी के शासन काल में 2012 में तीन दलितों की हत्या पर कुछ बवंडर उठा था। घटना की जांच के लिए सरकार ने एक समिति तक गठित की थी। आज तक उस समिति की रिपोर्ट सामने नहीं आई। इसलिए इस समस्या से जुड़े सभी पहलुओं पर अलग और गंभीरता से विचार करने और उनका हल निकालने की आवश्यकता है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि गोसेवा और गोरक्षा आंदोलन का स्वरूप क्या हो। उसके साथ ही यह देखना आवश्यक है कि क्या इस आंदोलन से किसी जाति या समुदाय के प्रति अन्याय होने की आशंका है। गोरक्षा आंदोलन से जिन जातियों और समुदायों की सुरक्षा को खतरा पैदा होता है, उन्हें किस तरह के संरक्षण की आवश्यकता है। उसके बाद इस बड़े प्रश्न को हल करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए कि हम अपने समाज में निचली जातियों के प्रति होने वाले भेदभाव और उत्पीड़न को कैसे समाप्त कर सकते हैं। इसी तरह हम गोरक्षा जैसी समस्याओं के बहाने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो खाई पैदा हो जाती है, उसे पाटने के लिए क्या करें। इस सबके अलावा हमें उन वर्गांे को शांत और मर्यादित करने के बारे में भी सोचना पड़ेगा जो पश्चिमी तर्कवाद के प्रभाव में मूल भारतीय आस्थाओं को आहत करने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे लोगों ने ही उन गैर-जिम्मेदार लोगों को पनपाया है जो सामाजिक आस्था के नाम पर हिंसक प्रतिक्रिया के लिए उतावले रहते हैं।
यह सब जानते हैं कि गोवध को भारत में सदा पातक माना जाता रहा है। गोरक्षा हमारे समाज की मूल आस्था रही है। अपनी इस आस्था के द्वारा हम पशु मात्र के प्रति समाज में आत्मभाव पोषित करते आए हैं। महात्मा गांधी जब निलहो के विरुद्ध अपने पहले आंदोलन के लिए बिहार के चंपारण पहुंचे थे तो उन्होंने गाय के प्रति आम भारतीयों की श्रद्धा देखी थी। उसके बाद गोसेवा भी उनके आंदोलन का मुख्य भाग हो गई थी। उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को केवल राजनीतिक नहीं रहने दिया था। उसे रचनात्मक सामाजिक कामों से जोड़ दिया था। इन कामों में गोसेवा, हरिजन उद्धार और हिन्दू-मुस्लिम एकता तीनों को एक जैसा स्थान दिया गया था। गांधीजी अपने इन सभी रचनात्मक आंदोलनों में कोई भेद नहीं देखते थे। उनके लिए सभी सभ्यतागत प्रश्न थे। उन्हें देश की राजनीतिक स्वतंत्रता की सार्थकता इन सभी उद्देश्यों की सिद्धि में दिखाई देती थी।

महात्मा गांधी के जीवन काल में ही इन रचनात्मक आंदोलनों के प्रति उनके और जवाहर लाल नेहरू के मतभेद सामने आ गए थे। जवाहर लाल नेहरू राजनीतिक स्वतंत्रता से अधिक कुछ देखना समझना नहीं चाहते थे। इसलिए गांधीजी की मृत्यु के बाद कांग्रेस ने इन सब रचनात्मक आंदोलनों से अपना पल्ला झाड़ लिया। कांग्रेस के नेतृत्व में सभी दलों के लिए राजनीति वोट बैंक की राजनीति हो गई। सबसे पहले कांग्रेस ने ब्राह्मण, हरिजन, आदिवासी और मुसलमानों को मिलाकर चुनाव जीतने का एक गणित तैयार किया। फिर कांग्रेस की देखादेखी सभी दल सभी जातियों और वर्गों को वोट बैंक के रूप में देखने लगे। इससे यह लाभ तो हुआ कि छोटी से छोटी जाति को राजनीति की मुख्यधारा में आने का मौका मिल गया। लेकिन सत्ताकामी राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए केवल इतना पर्याप्त नहीं था। उन्होंने जातीय विभाजन और विद्वेष को बढ़ाकर बड़े वोट बैंक खड़े करने की कोशिश की। दलित आंदोलन इसी की उपज है। दलित आंदोलन के द्वारा निचली जातियों को एकजुट करने की कोशिश खूब हुई, उससे कांशीराम जैसे नेता भी पैदा हुए, लेकिन अब तक यह आंदोलन समाज पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाया है।

उना जैसी घटनाओं के दौरान गोरक्षा और दलित आंदोलन को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की कोशिश की जाती है। लेकिन उसको कोई अधिक समर्थन नहीं मिल पाता क्योंकि दलित जातियों में भी गऊ के प्रति वैसी ही श्रद्धा रही है, जैसी दूसरी जातियों में है। ऊंची जातियों के लोग मरे पशुओं की चमड़ी उतारने के काम में लगी जातियों के किसी व्यक्ति पर गोरक्षा के नाम पर जब कोई अत्याचार कर देते हैं तो इसकी कुछ प्रतिक्रिया होती है। उना के उत्पीड़न का विरोध कर रहे दलित नेताओं ने मरे पशुओं की खाल न उतारने का जो आह्वान किया है, उसका कुछ दिन प्रभाव भले हो, वह अधिक दिन नहीं रह पाएगा। इन कामों में लगे लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारे बिना उनसे ऐसे किसी राजनीतिक प्रतिरोध की आशा नहीं की जा सकती।

ऊंची जातियों के लोग नीची जातियों के प्रति जो भेदभाव बरतते हैं, वह इस समस्या की जड़ में है। ऊंच-नीच की कुछ भावना जातियों के बीच ही नहीं किसी एक जाति के भीतर के विभिन्न कुलों के बीच भी बरती जाती दिखाई देती है और शादी ब्याह के समय वह दिख जाती है। लेकिन निचली जातियों को हीन दृष्टि से देखना हिन्दू जाति का कलंक है। उसका मूल कारण इन जातियों के व्यवसाय के प्रति शौच-अशौच की भावना थी, लेकिन रूढ़ होकर वह मानव गरिमा का उल्लंघन करने वाली हो गई है। कोई व्यवसाय मनुष्य को हीन नहीं बनाता, इस भावना को पूरे समाज में डालने का एक अभियान आरंभ होना चाहिए था। हमारे बहुत से धार्मिक नेता भी इस काम में जुट जाते। लेकिन महात्मा गांधी के बाद भारतीय समाज की मूल समस्याओं की तरफ ध्यान देने वाला कोई नेता नहीं निकला। हम हर समस्या को राजनीतिक फायदे, नुकसान की दृष्टि से ही देखते हैं। समाज के व्यापक हित में उसका हल निकालने का प्रयत्न नहीं करते।

गोरक्षा अब एक संवैधानिक व्यवस्था है। इसलिए जो लोग गोरक्षा और दलित-आदिवासी या अल्पसंख्यकों के हितों की दुहाई देकर राजनीतिक द्वंद्व पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे भी उतनी ही सख्ती से निपटा जाना चाहिए, जितनी शक्ति से गोरक्षा के नाम पर पनप रहे असामाजिक तत्वों से निपटा जाना है। कर्नाटक में जो लोग बीफ फेस्टिवल आयोजित करने में लगे थे, वे भी वैसी ही कुत्सित बुद्धि का प्रदर्शन कर रहे थे जैसी बुद्धि उना के उपद्रवियों में दिखाई देती है। भारत में कुछ क्षेत्रों में ऐसे समुदाय रहे हैं, जिनका आहार बीफ है। लेकिन उनकी दुहाई देकर आप समाज के बहुलांश की आस्था से नहीं खेल सकते। गोरक्षा कोई पुरानपंथी धारणा नहीं है, वह भारत की सभ्यतागत निष्ठा है। जैसा कि गांधीजी ने कहा था, वह समूचे पशु जगत के प्रति हमारी दृष्टि स्थिर करती है। हमारे यहां सभी शाकाहारी नहीं हैं। पर दुनिया के दूसरे लोगों की तरह हम पशु-पक्षियों को केवल आहार की दृष्टि से नहीं देखते। समूची सृष्टि में ईश्वरत्व देखने वाली यह एक ऊंची दृष्टि है, उससे हमने एक उन्नत सभ्यता का निर्माण किया है। आज जो लोग पश्चिम के तर्कवादी अंधविश्वासों में फंसे हैं, उनके आधार पर हम अपनी सभ्यतागत दृष्टि को नहीं छोड़ सकते। 

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