कांग्रेस का पलड़ा भारी

डॉ. शफीक आलम
Fri, 17 May, 2019 14:04 PM IST

नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों के लिए तीन चरणों में मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. अब सबको 23 मई का इंतजार है, जब चुनाव के नतीजे घोषित होंगे. यूं तो राज्य में बहुजन समाज पार्टी ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं और अजीत जोगी उनका समर्थन कर रहे हैं, लेकिन एक-दो सीटों को छोडक़र यहां मुकाबला दो पक्षीय है, जिसमें एक तरफ कांग्रेस है और दूसरी तरफ भाजपा. कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए राज्य की 90 सीटों में से 68 पर जीत दर्ज की थी. जबकि 15 सालों से सत्ता पर आसीन भाजपा 15 सीटों पर सिमट गई थी. यह राज्य में कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी, वहीं भाजपा की सबसे बड़ी पराजय. ऐसे में सबके मन में सवाल यह है कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में जो कारनामा अंजाम दिया था, क्या उसे वह लोकसभा चुनाव में भी दोहरा पाएगी या फिर भाजपा अपना खिसकता हुआ आधार संभालने में कामयाब हो जाएगी?

 छत्तीसगढ़ में पिछले तीन लोकसभा चुनावों से लगातार भाजपा का स्कोर 10-1 रहा है यानी राज्य की 11 सीटों में से 10 पर वह काबिज रही है, जबकि एक सीट कांग्रेस के हिस्से में गई है. लेकिन, इस बार परिस्थितियां अलग हैं. यदि इस चुनाव में भी विधानसभा चुनाव वाला वोटिंग पैटर्न चला होगा, तो भाजपा का स्कोर 1-10 भी हो सकता है. यदि विधानसभा चुनाव के नतीजों को लोकसभा के नतीजों में बदल कर देखा जाए, तो कांग्रेस को 10 सीटों और भाजपा को केवल एक सीट पर बढ़त मिलती दिख रही है. इस बात का अंदाजा पार्टी नेतृत्व को भी है. लिहाजा, राज्य की सियासी बिसात पर उसने पहले ही दिन से अपनी चालें दुरुस्त करने की कवायद शुरू कर दी थी. पार्टी ने सबसे पहले अपने सभी निवर्तमान सांसदों के टिकट काट दिए, यहां तक कि उसने पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह और केंद्रीय मंत्री विष्णु देव साय को भी नहीं बख्शा. जाहिर है, यह बहुत बड़ा जोखिम था. भाजपा हर कीमत पर अपना नुकसान कम करना चाहती थी, इसलिए उसने यह कदम सत्ता विरोधी लहर थामने और जातीय समीकरण दुरुस्त करने के लिए उठाया, लेकिन टिकट कटने से नाराज सांसदों ने दबे सुर में ही सही, अपना विरोध जरूर जाहिर किया. कुछ नामों पर राज्य के वरिष्ठ नेताओं ने भी आपत्ति जताई. मिसाल के तौर पर बस्तर के सांसद दिनेश कश्यप की जगह बैदराम कश्यप को उम्मीदवार बनाने के फैसले पर रायपुर में कई लोगों की भवें तन गई थीं. उसी तरह जांजगीर की सांसद कमला देवी पाटले के पुत्र प्रदीप पाटले ने अपनी फेसबुक पोस्ट में 10 सांसदों का दर्द जाहिर किया. उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह पर निशाना साधते हुए लिखा कि विधानसभा चुनाव की हार का ठीकरा सांसदों के सिर फोड़ा जा रहा है, जबकि हार के असल जिम्मेदार को चुनाव अभियान की जिम्मेदारी देकर सम्मानित किया गया. हालांकि, चुनाव संपन्न हो गया है, लेकिन भाजपा की अंदरूनी उठापटक अभी तक जारी है.

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जहां तक कांग्रेस का सवाल है, तो उसने अपनी चालें बड़ी सावधानी से चलीं. कांग्रेस ने सबसे पहले राज्य की चार आदिवासी बहुल सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की और बस्तर, रायगढ़ एवं सरगुजा में अपने निवर्तमान विधायकों को टिकट दे दिया, जबकि चौथी सीट कांकेर में एक नए चेहरे बिरेश ठाकुर पर विश्वास जताया. गौर करने वाली बात यह है कि इन आदिवासी संसदीय क्षेत्रों पर राज्य के गठन के बाद से लगातार भाजपा का कब्जा रहा है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 29 सीटों में से 25 पर कब्जा जमाने में कामयाब रही, जबकि भाजपा को केवल तीन सीटें मिलीं और अजीत जोगी की पार्टी जेसीसी (जे) को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा. शायद इसी वजह से जोगी ने लोकसभा चुनाव में न उतरने का फैसला लिया. जाहिर है, कांग्रेस लोकसभा में भी वैसा ही प्रदर्शन जारी रखना चाहती है. इसी क्रम में उसने अपने चुनावी वादे के मुताबिक, 10 साल पहले टाटा स्टील के लिए अधिग्रहीत की गई 1765 हेक्टेयर जमीन उनके असल मालिकों को लौटा दी और उनसे मुआवजे की राशि भी वसूल नहीं की. आदिवासी क्षेत्रों में यह विधानसभा चुनाव का एक बड़ा मुद्दा था, जिसने वहां हवा का रुख कांग्रेस की ओर मोड़ दिया. प्रदेश में भाजपा की हार की एक वजह किसान भी थे. किसानों की कर्ज माफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी बड़े मुद्दे थे. चुनाव के बाद भूपेश बघेल सरकार ने 16 लाख से अधिक किसानों के अल्पकालीन कृषि कर्ज माफ करने के साथ-साथ धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर 2,500 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया. नतीजतन, इस साल धान की रिकॉर्ड खरीद हुई. इसी तरह तेंदू पत्ता संग्रहण दर 2,500 रुपये से बढ़ाकर 4,000 रुपये मानक बोरा कर दिया गया. इन सबसे किसानों एवं आदिवासियों के बीच बघेल सरकार की लोकप्रियता बढ़ी है, जिसका फायदा कांग्रेस को मिल सकता है. लेकिन, बस्तर के बैलाडीला पहाडिय़ों में अडानी समूह को लौह अयस्क और कोरबा के गिधमुरी एवं पतुरिया में कोयला खनन की स्वीकृति से कांग्रेस को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है.

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एक दिलचस्प बात यह है कि कुछ महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ की तरह राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी जीत का स्वाद चखा था, लेकिन फिलहाल वहां भाजपा अच्छी स्थिति में आ गई है और अंदाजा लगाया जा रहा है कि उक्त दोनों राज्यों में उसे कांग्रेस से अधिक सीटें मिलेंगी. अब सवाल यह उठता है कि आखिर क्या वजह है कि भाजपा छत्तीसगढ़ में राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरह अपनी स्थिति नहीं सुधार पाई? सबसे पहली वजह यह है कि रमन सिंह सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर काम कर रही थी. दूसरी वजह मुख्यमंत्री रमन सिंह खुद हैं. हालांकि, उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली दुरुस्त कर गरीबों को एक रुपये किलो की दर से चावल बंटवाया, लेकिन बाद में इस योजना में एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ. राज्य का मुखिया होने के नाते हार की जिम्मेदारी अपने सिर लेने के बजाय रमन सिंह पार्टी कार्यकर्ताओं को ही लाइन हाजिर करने लगे. भाजपा की दुर्गति के पीछे रमन सरकार की नया रायपुर जैसी कुछ अलोकप्रिय परियोजनाएं, नक्सलवाद की समस्या से निपटने में नाकामी और किसानों की अनदेखी जैसी वजहें भी शामिल हैं.

छत्तीसगढ़ में यदि भाजपा राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरह वापसी नहीं कर पा रही है, तो उसकी एक बड़ी वजह मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सोशल इंजीनियरिंग है. साल 2013 में दरभा घाटी में हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेता मारे गए थे. उसके बाद पार्टी की कमान भूपेश बघेल को सौंपी गई. बघेल ने कमान संभालते ही अजीत जोगी को अलग-थलग कर किसानों, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं आदिवासियों के बीच पार्टी की स्थिति मजबूत की. वह खुद प्रदेश के एक बड़े ओबीसी चेहरे बनकर उभरे. इसी वजह से कांग्रेस ने उन्हें उत्तर प्रदेश में अपना जातीय समीकरण ठीक करने के लिए मैदान में उतारा.

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कुल मिलाकर देखा जाए, तो यह कहा जा सकता है कि प्रदेश में कांग्रेस का पलड़ा भारी है. हालांकि, भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा और पाकिस्तान पर हमले को चुनावी मुद्दा बनाया, लेकिन ये मुद्दे शहरी क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ पाए. ग्रामीण क्षेत्रों के असल मुद्दे कृषि, रोजगार और नक्सलवाद रहे. इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का रुझान कांग्रेस की तरफ अधिक दिखा. यदि कांग्रेस विधानसभा चुनाव में मिला अपार जन समर्थन बरकरार रखने में कामयाब रही होगी, तो छत्तीसगढ़ के नतीजे 10-1 के साथ उसके हक में आ सकते हैं.

 

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