गांव-गरीब की सुध लेने वाला बजट

प्रदीप सिंह
Sat, 10 Mar, 2018 13:31 PM IST

प्रदीप सिंह/संपादक/ओपिनियन पोस्ट

आम बजट वैसे तो केंद्र सरकार की आमदनी और खर्च का सालाना लेखा जोखा होता है। इसके बावजूद हर साल लोगों को बजट का इंतजार और उम्मीद रहती है। बड़ी उत्सुकता रहती है कि किसे क्या मिलेगा। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद यह पहला और वित्त मंत्री अरुण जेतली का पांचवां बजट था। माना जा रहा है कि मोदी सरकार के इस कार्यकाल का यह आखिरी पूर्ण बजट था। जीएसटी लागू होने के बाद सारे अप्रत्यक्ष कर उसमें समाहित हो गए इसलिए पहली बार ऐसा हुआ कि अखबारों और टीवी चैनलों को यह दिखाने का मौका नहीं मिला कि क्या महंगा हुआ और क्या सस्ता हुआ। फिर भी वित्त मंत्री का बजट भाषण काफी लम्बा था। देश और दुनिया में, जिसकी भी, भारतीय अर्थव्यवस्था में रुचि है, सबकी नजर इस बात पर थी कि बजट में किसानों और बेरोजगारों के लिए क्या होगा। देश में किसानों की खस्ता हालत अर्थव्यवस्था ही नहीं राजनीतिक व्यवस्था भी बिगाड़ रही थी। कम से कम सत्तारूढ़ दल के लिए। तमाम तरह की अटकलें थीं। कोई कह रहा था चुनावी बजट होगा तो कोई इसे एनडीए का आखिरी बजट बता रहा था। ऐसे भी लोग थे जिनको भरोसा था कि वित्त मंत्री आर्थिक सुधार के एजेंडे से हटे बिना समस्याओं का हल खोजने की कोशिश करेंगे। जिसको जो भी उम्मीद रही हो पर विपक्ष को उम्मीद नहीं थी कि यह बजट कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में इतनी अधिक राशि (करीब साढ़े चौदह लाख करोड़ रुपये) का आवंटन करेगा।

आजादी के बाद से सभी सरकारों ने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की है। इसके बावजूद कि देश की दो तिहाई आबादी कृषि पर ही निर्भर है। इसके भी बावजूद कि कृषि सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र है। बातें सभी बड़ी बड़ी करते रहे पर किया किसी ने कुछ नहीं। 2004 में यूपीए के पहले बजट में पी चिदम्बरम ने सिंचाई और भंडारण के विकास के लिए जो वादे किए थे उनका आधा भी पूरा होता तो किसानों का यह हाल नहीं होता। उस समय की घोषित या शुरू की गई योजनाएं अब प्राथमिकता के आधार पर पूरी की जा रही हैं। सरकारें समर्थन मूल्य और कर्ज माफी को ही किसानों के हर मर्ज की दवा मानती रही हैं। कोई इस बात पर गौर करने के लिए तैयार नहीं था कि बम्पर पैदावार हो और बाजार भाव समर्थन मूल्य से नीचे चला जाय तो किसान क्या करे। क्योंकि सरकार के भी खरीद की एक सीमा होती है जो कुल पैदावार का केवल बीस फीसदी होती है। इस बजट में किसान की न केवल इस समस्या को दूर करने बल्कि पशुपालन, मछली पालन और दूसरे गैर कृषि साधनों से आमदनी बढ़ाने के अवसर भी मुहैया कराए गए हैं। देश के विभिन्न राज्यों में कुछ जिलों में किसी एक वस्तु की पैदावार ज्यादा होती है। उसका उन्हें उचित मूल्य मिले इसके लिए उद्योगों की तरह ही खेती के भी क्लस्टर बनेंगे। पशुपालन और मछली पालन करने वाले और मछुआरों को पहली बार किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा दी गई है। रोजगार के नए अवसर पैदा करने की दृष्टि से तीन क्षेत्र बहुत अहम हैं। इनमें पहले स्थान पर खेती किसानी है। इसके बाद छोटे और मझोले उद्योग हैं। तीसरे स्थान पर इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र है। इस बजट में इन तीनों क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया है। छोटे और मझोले उद्योगों के कॉरपोरेट टैक्स को एक झटके में ही तीस से पच्चीस फीसदी कर दिया गया है। ढाई सौ करोड़ सालाना का व्यापार करने वाली इकाइयों को इसका फायदा मिलेगा। इसमें देश के निन्यानबे फीसदी उद्योग आ जाते हैं। इसी तरह इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में राजमार्गों के अलावा बंदरगाह, भारत माला, सागर माला जैसी परियोजनाओं के लिए बड़ा आवंटन हुआ है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को व्यापक बनाया गया है और अब गांव के अंदर और गांव से बाजार तक सड़क बनाने का भी काम होगा।

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वित्त मंत्री अरुण जेतली के बजट में जिस योजना की पूरे देश में सबसे ज्यादा चर्चा है वह है, दस करोड़ परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना। यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना है। इसके तहत करीब पचास करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा मिलेगी। एक परिवार को हर साल पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा मिलेगा। इस पर करीब बारह हजार करोड़ रुपये खर्च आएगा। जिसका साठ फीसदी केंद्र और चालीस फीसदी राज्य सरकार देगी। यह योजना ठीक से लागू हो गई तो देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे गरीब आदमी को इलाज के लिए जीवन भर की पूंजी नहीं लगानी पड़ेगी। इस योजना के लागू होने के बाद स्वास्थ्य सेवा और स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे का विस्तार होगा। इस एक योजना से मोदी सरकार की गरीब की चिंता करने वाली सरकार होने का दावा और पुख्ता हुआ है। इस योजना के संबंध में विपक्ष की सारी आलोचना इस बात पर टिकी है कि सरकार इसे लागू करने के लिए पैसा कहां से लाएगी। इस बजट में मध्य वर्ग को उसकी उम्मीद से बहुत कम मिला है। इसके बावजूद कि वह सबसे ज्यादा टैक्स देता है। यहां तक प्रोफेशनल व्यवसायियों के वर्ग से भी ज्यादा। वित्त मंत्री के पास आयकर छूट में कटौती की गुंजाइश नहीं है। इसके अलावा पांच लाख तक की आमदनी वालों के लिए आयकर की दर पहले ही पांच फीसदी की जा चुकी है, जो दुनिया में सबसे कम है।

यह बजट अर्थव्यवस्था के साथ ही राजनीति की भी चिंता करता है। अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं ऐसे में आशंका थी कि सरकार वित्तीय घाटे की चिंता छोड़कर बहुत सारी लोलुभावन घोषणाएं करेगी। पर वित्त मंत्री ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने न केवल वित्तीय घाटे पर अंकुश बनाए रखा है बल्कि ऐसे आर्थिक कदम उठाए हैं जिससे रोजगार और विकास को बढ़ावा मिले। सरकार को उम्मीद है कि 2018-19 में देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर सात से साढ़े सात फीसदी के बीच होगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थांे की बढ़ती कीमत और उसका महंगाई पर असर चिंता का कारण बना रहेगा। मुद्रास्फीति की दर बढ़ने का असर जल्दी ही ब्याज दरों पर दिखाई देगा। स्टेट बैंक आॅफ इंडिया ने जमा राशि पर ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी करके संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर बढ़ाने के लिए देश में निजी क्षेत्र का निवेश बढ़ना जरूरी है। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि निजी निवेश शुरू होने के संकेत दिखने लगे हैं। पर रोजगार के अवसर मुहैया कराने के लिए निजी निवेश में तेज वृद्धि जरूरी है। इनमें से किसी मसले पर कमजोरी सरकार के आर्थिक गणित को बिगाड़ सकती है।

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सरकार के लिए अच्छी खबर यह है कि अमेरिका और यूरोप के देशों की अर्थव्यवस्था की विकास दर बढ़ रही है। दशकों से बुरी हालत में रहे जापान में भी विकास नजर आ रहा है। इसका फायदा हमारे निर्यात और विनिर्माण क्षेत्र को मिल सकता है। काफी समय बाद दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेजी का दौर शुरू हुआ है। इसका लाभ भारत को मिलेगा। पर भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी के लिए जरूरी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आमदनी बढ़े। इस बजट की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुधार में कितना प्रभावी होगा। देश की दो तिहाई आबादी आज भी गांवों में बसती है। इसलिए गांव तरक्की करेंगे तभी देश भी तरक्की करेगा।

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