अंतरिक्ष युद्ध के लिए भारत तैयार

राजीव कुमार
Mon, 22 Apr, 2019 16:36 PM IST

देश की बढ़ती सामरिक ताकत में एक नया अध्याय जुड़ गया है. जल, थल और नभ के बाद अब अंतरिक्ष में भी भारत ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया हैं. उपग्रह रोधी मिसाइल का सफल परीक्षण करके भारत ने यह साबित कर दिया कि हम दुश्मन का मुकाबला करने के लिए हर मोर्चे पर तैयार हैं. अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत दुनिया का चौथा अंतरिक्ष महाशक्ति बन गया है.

इतिहास के हर दौर में सबसे बड़ा हथियार तकनीक रही है. आज भी जिसके पास जितनी बेहतरीन तकनीक है, वह उतना ही ज्यादा मजबूत है. आर्थिक क्षेत्र से लेकर सामरिक क्षेत्र तक तकनीक का बोलबाला है. वास्तव में तकनीक ही दुनिया को चला रही है. आजकल युद्ध के तरीके बदलते जा रहे हैं. युद्ध लोगों को मारकर नहीं, बल्कि देश को पंगु बनाकर जीतने की कोशिशें की जाती हैं. आजकल अंतरिक्ष से देश की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं. इंटरनेट के इस दौर में किसी भी देश की पूरी व्यवस्था उपग्रहों से संचालित होती है और अगर कोई आपके उपग्रहों को नष्ट कर दे, तो आप बिना किसी सैन्य गतिविधियों के हार मान लेंगे. ऐसे ही युद्ध को अंतरिक्ष युद्ध कहा जाता है. यानी किसी देश को घुटने पर लाने के लिए उस पर हमला करने की जरूरत नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष में उस देश के उपग्रहों को नष्ट कर दो, जिससे वहां की व्यवस्था ठप्प पड़ जाए, उसके संचार माध्यम नष्ट हो जाएं और उसकी अर्थ व्यवस्था चरमरा जाए. ऐसे माहौल में अगर कोई देश अंतरिक्ष में अपनी सुरक्षा के लिए तैयार नहीं रहता, तो उसकी सामरिक तैयारी मुकम्मल नहीं कही जा सकती.

दरअसल, भारत ने पिछले दिनों एक ऐसा ही परीक्षण किया है. धरती से 300 किमी दूर पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित अपना एक उपग्रह मिसाइल से नष्ट करके भारत ने दुनिया को अपनी अंतरिक्ष क्षमता से परिचित कराया गया. भारत का यह परीक्षण इस बात का सुबूत है कि अब कोई भी देश उसके उपग्रहों पर हमला करने से पहले सौ बार सोचेगा, क्योंकि अगर ऐसा होता है, तो भारत भी उसके उपग्रह नष्ट करने में सक्षम है. गौरतलब है कि आधुनिक समय में उपग्रहों का इस्तेमाल कई तरह के कार्यों के लिए किया जाता है. संचार माध्यमों जैसे मोबाइल, इंटरनेट, जीपीएस आदि का संचालन उपग्रह के माध्यम से ही होता है. यही नहीं, बैंकिंग प्रणाली से लेकर शेयर बाजार तक का संचालन भी संचार माध्यम द्वारा किया जाता है, जिसके लिए उपग्रहों का सही-सलामत रहकर काम करना जरूरी है. मौसम की पूर्व जानकारी, भूमि एवं जंगलों के बारे में आंकड़े एकत्र करने के लिए इन्हीं उपग्रहों का इस्तेमाल किया जाता है. अगर कोई दुश्मन देश आपके संचार उपग्रहों को नष्ट कर देता है, तो आप न तो संवाद स्थापित कर पाएंगे और न नेविगेशन प्रणाली का इस्तेमाल कर पाएंगे. इसके अलावा सामरिक क्षेत्र में भी उपग्रहों का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है. गाइडेड मिसाइल की पूरी प्रणाली उपग्रहों से मिलने वाली जानकारियों से ही संचालित होती है. आज के दौर में युद्ध का सबसे घातक हथियार मिसाइल है. जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल हो या फिर हवा से जमीन पर या हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल, सभी को सटीक निशाना लगाने के लिए उपग्रहों से मिली जानकारियों की जरूरत होती है. ऐसे में, अगर कुछ देशों के पास उपग्रह नष्ट करने की क्षमता है, तो युद्ध की स्थिति में उसे अपनी सेना भेजने की जरूरत नहीं है, बल्कि दुश्मन देश के उपग्रह नष्ट करके ही वह उसे घुटने पर ला सकता है.

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अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत को इस तकनीक की जरूरत क्यों पड़ी. आखिर अंतरिक्ष में किसी उपग्रह को नष्ट करने की क्षमता हासिल करके भारत को क्या मिलेगा? दरअसल, अंतरिक्ष में हथियारों की इस होड़ की शुरुआत पचास के दशक में हो गई थी. अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच चल रहे शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने इस तकनीक पर काम करना शुरू किया. उसने उपग्रह नष्ट करने की प्रणाली विकसित करने की कोशिश शुरू की, जिसके बाद रूस को भी यह क्षमता हासिल करने की जरूरत महसूस हुई. हालांकि, अमेरिका ने 1959 में पहली बार उपग्रह रोधी मिसाइल का परीक्षण किया, लेकिन वह विफल हो गया. इस बीच रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) ने इस पर जोर-शोर से काम करना शुरू किया और साल 1973 में उसने सफल परीक्षण की घोषणा कर दी. रूस की सफलता से बौखलाए अमेरिका ने ठंडी पड़ी इस परियोजना पर काम करना शुरू किया और फिर उसने 1980 के दशक में कई परीक्षण किए तथा अंतत: 1985 में सफलता पूर्वक अपना एक उपग्रह नष्ट करके यह क्षमता हासिल करने की घोषणा की. अमेरिका और रूस के बाद चीन ने भी इस पर काम शुरू किया और साल 2007 में उसने उपग्रह रोधी मिसाइल का सफल परीक्षण कर दिखाया. चीन की सफलता के बाद भारत के लिए यह तकनीक हासिल करना मजबूरी बन गई. भारत के एक ओर चीन है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान. दोनों ही देशों का भारत के साथ सीमा विवाद है, जिसके कारण तनाव की स्थिति बनी रहती है. भारत के दोनों शत्रु देश आपस में गहरे मित्र हैं. भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की स्थिति में चीन हमेशा पाकिस्तान को सहयोग देता रहा है. यही नहीं, पाकिस्तान हमेशा भारत के खिलाफ चीन के हथियारों का इस्तेमाल करता रहा है. पाकिस्तान के पास चीन निर्मित कई टैंक, मिसाइल और तोप हैं. दुश्मनों से घिरे भारत के लिए यह जरूरी है कि वह चीन का सामना करने के लिए उसकी बराबरी करे. माना जाता है कि अगर भारत ने 1962 के पहले परमाणु बम का परीक्षण कर लिया होता, तो चीन भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत न जुटा पाता और अंतरराष्ट्रीय शक्तियां भी दोनों के बीच मध्यस्थता करने में जल्दबाजी दिखातीं. चूंकि भारत के पास उस समय परमाणु क्षमता नहीं थी, इसलिए न तो चीन और न वैश्विक समुदाय को परमाणु युद्ध का डर था. भारत एक बार यह दंश झेल चुका है, इसलिए चीन का सामना करने के लिए उसकी सामरिक क्षमता की बराबरी करना जरूरी है. हालांकि, अभी तक अंतरिक्ष में किसी भी देश ने दूसरे देश के उपग्रह नष्ट नहीं किए हैं, लेकिन इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती कि भविष्य में युद्ध की स्थिति पैदा होने पर कोई ऐसा नहीं करेगा. दूसरे विश्व युद्ध के समय अमेरिका ने जब जापान पर परमाणु हमला किया था, तो उसके पहले इस बात की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी कि कोई भी देश किसी के खिलाफ इस तरह के घातक हथियार का इस्तेमाल करेगा.

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यही स्थिति एंटी सैटेलाइट मिसाइल की है. अगर चीन जैसे देश के साथ तनाव बढ़ जाए और भारत के पास उपग्रह नष्ट करने की क्षमता न होती, तो चीन इस तकनीक का इस्तेमाल भारत की संचार और नेविगेशन व्यवस्था ठप्प करने के लिए कर सकता था. अब जबकि, भारत ने यह क्षमता हासिल कर ली है, तो वही देश अंतरिक्ष में जमा हो रहे कचरे की बात कर रहे हैं. चीन ने भारत की इस सफलता के बाद अंतरिक्ष में शांति बनाए रखने की अपील भी कर दी. हालांकि, रूस और अमेरिका जैसे देशों की ओर से कोई कड़ी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन वैश्विक समुदाय ने अंतरिक्ष में शांति बनाए रखने और कचरा न फैलाने की अपील जरूर की है. भारत ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उसका मिशन किसी देश को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी क्षमता का विकास करने के लिए है, ताकि कोई भी देश उसके खिलाफ इस तकनीक का इस्तेमाल न कर सके. हालांकि, भारत ने पृथ्वी से केवल 300 किमी की दूरी पर स्थित उपग्रह नष्ट किया है, लेकिन इस तकनीक का सफल परीक्षण किए जाने के बाद यह भी स्पष्ट हो गया है कि भारत के पास अब पृथ्वी की निचली और मध्यम कक्षा के किसी भी उपग्रह को नष्ट करने की क्षमता है. भारतीय वैज्ञानिकों का कहना है कि पांच हजार किमी की मारक क्षमता वाले अग्नि मिसाइल का इस्तेमाल कर हम लो-अर्थ ऑरबिट के किसी भी उपग्रह को नष्ट कर सकते हैं.

किसने क्या कहा

हमने जो नई क्षमता हासिल की है, यह किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि तेज गति से बढ़ रहे हिंदुस्तान की रक्षात्मक पहल है.

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   – नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री.

भारत के पास एक दशक पहले भी एंटी सैटेलाइट मिसाइल क्षमता थी, लेकिन उस समय राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण इसे सफलतापूर्वक अंजाम नहीं दिया जा सका.

– जी माधवन नायर, पूर्व इसरो प्रमुख.

जब डॉक्टर सतीश रेड्डी (वर्तमान डीआरडीओ प्रमुख) और एनएसए अजित डोभाल ने पीएम मोदी के सामने प्रस्ताव रखा, तो उन्होंने साहस दिखाया और इस परियोजना पर आगे बढऩे की अनुमति दी. अगर 2012-13 में तत्कालीन सरकार ने इसकी अनुमति दी होती, तो मुझे पूरा विश्वास है कि 2014-15 में इसे अंजाम दिया जा चुका होता.

– डॉ. वीके सारस्वत, पूर्व डीआरडीओ प्रमुख.

चीन से निपटने में सक्षम

भारत को पाकिस्तान से ज्यादा खतरा चीन से है. चीन की आर्थिक एवं सामरिक महत्वाकांक्षाएं कभी भी भारत के लिए खतरा बन सकती हैं. माना जाता है कि अगर भारत ने 1962 के पहले परमाणु बम का परीक्षण कर लिया होता, तो चीन भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत न जुटा पाता. चीन कई बार उपग्रह रोधी मिसाइल परीक्षण कर चुका है, इसलिए भारत को भी ऐसा करना जरूरी हो गया था. अमेरिका के खुफिया विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने साल 2007 के बाद ऐसे कई परीक्षण किए. साल 2007 में चीन ने केटी-1 रॉकेट लांचर का इस्तेमाल कर फेंग युन 1-सी नामक अपन मौसम उपग्रह पृथ्वी से 800 किमी की दूरी पर मार गिराया था. रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने अपनी सेना में एंटी सैटेलाइट मिसाइलों के लिए एक विशेष यूनिट बनाई है और अंतरिक्ष युद्ध की स्थिति में दुश्मन देश के उपग्रह नष्ट करने की क्षमता विकसित करने के लिए प्रशिक्षण देना भी शुरू कर दिया है.

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