संध्या द्विवेदी

‘दो महीने का बिजली का बिल तीन हजार रुपए आया है। महीनों से कोटेदार राशन नहीं दे रहा। आंगनबाड़ी का पोषाहार भैसों का चारा बन रहा है।’ सुंदरनगरी में एल ब्लाक की झुग्गी में रह रही बेबी की शिकायत यहीं नहीं खत्म होती है। वह घर के बाहर भरी नालियों और गलियों की गंदगी की तरफ इशारा करते हुए कहती है, ‘अरविंद जी फोन पर बोलते हैं कि डेंगू से बचने के लिए गंदा पानी न भरने दें, उसे तुरंत साफ करवाएं। इतना बोलकर उनका फोन तो कट जाता है। मगर हम कैसे उन्हें बताएं कि यहां तो सफाईकर्मी आते ही नहीं। शिकायत किससे करें? हमारा विधायक तो जीत के बाद यहां आया ही नहीं।’

यहीं के एस-2 ब्लाक में रहने वाली प्रेमवती को महीनों से वृद्धा पेंशन नहीं मिली है। यहां पर रहने वाले लक्कड़ गुस्से से भरकर कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल से कहो कि सलाह देने के साथ सुनवाई भी करें। फोन पर कहते हैं कि मच्छर न पनपने दें। हमें उनकी यह रिकार्डेड सलाह नहीं चाहिए। कभी यहां आकर देखें। यहां मच्छर ही मच्छर हैं। इस इलाके का नाम बदलकर गंदगी नगरी या समस्या नगरी रख देना चाहिए। यहां की अंगूरी देवी भी नाराज हैं। वह कहती हैं कि अरविंद केजरीवाल ने यहीं से आंदोलन शुरू किया था। हमने जिताया उन्हें। मगर जीतने के बाद वह यहां कभी नहीं आए, क्यों? आंदोलन के समय कहते थे कि हम आम आदमी की राजनीति कर रहे हैं। यह गरीबों की सरकार है। मगर लाल बत्ती मिलने के बाद तो वह आम से खास हो गए और हम गरीब के गरीब ही रहे।

kejri-3सुंदर नगरी का जिक्र सबसे पहले करना इसलिए जरूरी था क्योंकि मार्च 2013 में यहीं से अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन शुरू किया था। उनके आंदोलन को सफल बनाने के लिए हजारों की भीड़ जुटी थी। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस अनिल अंबानी की राजनीति करती है, भाजपा भ्रष्ट राजनीति करती है, मगर हम आम आदमी की राजनीति करेंगे। हमारी सरकार गरीबों की सरकार होगी। कांग्रेस राज से नाराज गरीब तबके ने तो एकजुट होकर आम आदमी पार्टी की सरकार को चुना। मगर सरकार बनने के दस महीने बाद निराशा और गुस्से से भरे लोग कह रहे हैं कि मीठी-मीठी बातें करके अरविंद केजरीवाल ने हमें ठग लिया। लोग कह रहे हैं कि हमारे विधायक की तो शक्ल ही नहीं याद हमें। फोन लगाओ तो फोन उठता नहीं। उठता भी है तो जवाब मिलता है कि विधायक जी व्यस्त हैं। यहीं रहने वाले बंटी गुस्से में आकर कहते हैं कि केजरीवाल तो सीधे आम आदमी से खास आदमी बन गए हैं, सो उन तक हमारी फरियाद पहुंचना चांद पर पहुंचने जैसा है। यह इलाका सीमापुरी में पड़ता है।

सुंदरनगरी कब गए, विधायक को याद नहीं?

सीमापुरी क्षेत्र के विधायक राजेंद्र गौतम हैं। जब उनसे इन समस्याओं के बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि इलाका बहुत बड़ा है। आप दूसरे इलाकों का दौरा भी कीजिए। हम विकास कर रहे हैं। स्कूलों पर अभी ध्यान दिया गया है। गंदगी से भी निपटेंगे। पेंशन भी हमारी प्राथमिकता में है। देखिए रही बिजली के बिल की बात तो वह जितना आएगा उतना तो देना ही पड़ेगा। अगर कोई गड़बड़ी है तो हम जरूर इसे ठीक करेंगे। सुंदर नगरी में आप कितनी बार गए?  इस सवाल का तो कोई सीधा जवाब नहीं मिला। मगर उन्होंने यह जरूर बताया कि मोहल्ला सभा अभी केवल दिल्ली के 11 विधानसभा क्षेत्रों में हो रही थी। आने वाले साल से हमारे यहां भी शुरू हो जाएंगी। 36 मोहल्ला सभाएं चिन्हित की गर्इं। बजट आएगा तो काम करवाया जाएगा। यानी यह बात तो साफ थी कि यहां रहने वाले लोगों का कहना सही है कि उनका विधायक जीतने के बाद यहां आया ही नहीं।

बड़े अरमानों से वोट दिया, अब रो रहे हैं

सुंदर नगरी में ही रहने वाली परवीन महिला मंडल की अध्यक्ष हैं। कच्ची खजूरी, पक्की खजूरी, त्रिलोक पुरी और सुंदर नगरी समेत कई इलाकों की महिलाएं इस महिला मंडल की सदस्य हैं। सरकार के कामकाज के बारे में पूछने पर परवीन का पारा एकदम से चढ़ गया। गुस्से से भरी परवीन कहती हैं कि करीब हजार औरतों का वोट तो मैंने डलवाया था। इन औरतों को मैंने भरोसा दिया था कि आम आदमी पार्टी की सरकार कांग्रेस और भाजपा की सरकार नहीं है। यह गरीबों की सरकार है। मगर ये तो हमारी समस्याओं को हल करने से पहले अपना ही वेतन बढ़वाने लगे। कहते थे गाड़ी बंगले नहीं लेंगे, मगर देखिए सारे नेताओं ने सरकारी कोठियां हथिया लीं। यह तो आम आदमी की नहीं, झूठ की सरकार है। त्रिलोकपुरी की झुग्गियों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। यहां की संकरी गलियां गंदगी से भरी पड़ी हैं। यहां की झुग्गियों में रहने वाले लोग भी ‘आप’ से बेहद खफा हैं। यहां के मोहम्मद सलीम ने तो साफ कह दिया कि हम तो खुलकर कहते हैं कि हमने आम आदमी पार्टी को वोट दिया था। मगर अब नहीं देंगे। हमारे विधायक का पता मिले तो जरूर बताना! जीतने के बाद से वह लापता है! आप खुद भी कोशिश कर लो बात करने की, हो जाए तो हमें भी बता देना। अपने कार्यालय में विधायक जी नहीं मिलते, ताला मिलता है। विधायक के लापता होने की बात तब और सही लगने लगी जब दो दिनों तक लगातार उनसे मिलने और फोन पर बात करने में असफलता मिली। यहीं रहने वाले मुकेश ने बताया कि सरकारी स्कूल में मास्टर आते नहीं। आते हैं तो पढ़ाते नहीं। तंज करते हुए कहा कि यहां की संकरी गलियों की गंदी नालियां दुनियाभर के मच्छरों के लिए सबसे सुरक्षित जगह हैं। लोगों से एक समस्या पूछो, वे दस सुनाते हैं। उनसे कुछ भी पूछो भड़ास निकालने पर अमादा हो जाते हैं।

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मोहल्ला सभा का नाम सुना, देखा नहीं

सही भी है भड़ास निकालें भी तो कहां? सुनाएं भी तो किसे? उनका विधायक तो लापता है!  जाफराबाद के सुहेल कहते हैं कि मोहल्ला सभा करवाने का हल्ला तो खूब मचा। मगर हमें तो आज तक नहीं पता कि मोहल्ला सभा आखिर है क्या? होती कहां है? वसुंधरा और वैशाली में तो नहीं होती, पता लगाईये!  मयूर विहार फेज वन में भी मोहल्ला सभा के बारे में लोगों को कुछ नहीं पता। लोगों से पूछो तो कहते हैं कि जी हां, एकाध बार यहां पर जमावड़ा लगा, मगर हुआ कुछ नहीं। यहां के निवासी श्याम ने तो दो टूक कह दिया कि गरीब आदमियों के लिए इस सरकार ने भी कुछ नहीं किया। गंदी गलियां, पानी की समस्या सब कुछ यहां पर जस का तस है। हमारे घर से 11 लोगों ने ‘आप’ को वोट दिया था। मगर अब ये 11 वोट तो इन्हें दोबारा नहीं मिलने वाले। कच्ची खजूरी, पक्की खजूरी, बुराड़ी, नई दिल्ली के पास बसी झुग्गी। ज्यादातर जगहों की यही समस्याएं हैं। दिल्ली के झुग्गी वाले तो यही कह रहे हैं कि हम गरीबों ने यहां की गद्दी कांग्रेस से छीनकर आम आदमी पार्टी को सौंप दी। मगर हमारी बदहाली का हल तो इनके पास भी नहीं। दिल्ली की झुग्गियों को पहली नजर में देखने से एक बात तो साफ हो जाती है कि यहां की तंग संकरी गलियों तक न झाडू पहुंचती है और न ही पार्टी के नेता। सुंदर नगरी से शुरू हुए आंदोलन का सबसे चर्चित नारा था ‘दिल्ली में हमारी सरकार मगर, मोहल्लों में हम सरकार।’ यह नारा मोहल्ला सभा की जरूरत और आम आदमी की सरकार में भागीदारी के लिए दिया गया था। दस महीने बाद इन झुग्गियों की हालत देखने के बाद यह साफ है कि फिलहाल ‘हम’ नहीं बल्कि ‘आप’ ही सरकार हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मोहल्ला सभा की घोषणा करते हुए कहा था कि दिल्ली सरकार के पास हर साल 40,000 करोड़ का बजट होता है। इसमें विभिन्न खर्चों के बाद अलग-अलग विभागीय योजनाओं के लिए 16,000 करोड़ रुपए बचते हैं। पहले साल 20 करोड़ रुपए का बजट 10-11 विधानसभा क्षेत्रों के विकास में खर्च होगा। मोहल्ला सभा करके आम जनता से ही इस बजट को कैसे और कहां खर्च किया जाए, राय ली जाएगी। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो बाकी विधानसभा क्षेत्रों में भी सभाएं शुरू होंगी। मगर झुग्गियों की हालत देखकर कोई भी कह सकता है कि इस बजट का कोई हिस्सा झुग्गियों तक तो नहीं पहुंचा है।

विधायक बोले, जरा देर लगेगी

माडल टाउन विधानसभा क्षेत्र के विधायक और दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के सदस्य अखिलेश पति त्रिपाठी से जब बात की गई तो उन्होंने भी बजट की जानकारी दी। यह भी बताया कि इस बजट से इलाके के छोटे-मोटे काम जैसे बिजली, पानी, सड़क, नाली की समस्याएं हल की जाएंगी, गेट लगवाए जाएंगे। मगर दस महीनों में कितना बजट खर्च हुआ है और कितना बाकी है। इसका जवाब देने की जगह कहा कि देखिए काम हो रहा है। रणनीति बन चुकी है। खासकर झुग्गियों में समस्याएं बहुत हैं। उन्हें खत्म करने में वक्त तो लगेगा ही। 30 मार्च 2016 तक हम अपना लक्ष्य पाने की तरफ बड़ा कदम उठा चुके होंगे।

ऑटो वाले भी खफा

‘बेलगांव ऑटो स्टैंड का हर एक ऑटो वाला इस नई सरकार को वोट देकर पछता रहा है। मैं अब दोबारा इनके झांसे में नहीं आऊंगा। अपने परिवार का करीब एक दर्जन वोट एकमुश्त झाड़ू में डलवाया था। अब एक भी वोट नहीं मिलेगा मेरे परिवार से। हमसे वादा किया था कि बैच बनवा देंगे। पुलिस हमें तंग नहीं करेगी। न तो बैच बने, न पुलिस की मनमानी थमी। पुलिस वाले जब देखो तब आटो उठाकर थाने में बंद कर देते हैं। आधी कमाई तो आटो छुड़ाने में ही चली जाती है’, गुस्से से भरे सुहेल ने यह सब बताते हुए एक बार नहीं कई बार कहा कि हम वोट नहीं देंगे, बिल्कुल नहीं देंगे, इस बार झांसे में नहीं आएंगे।

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उधर मयूर विहार फेज वन के करीब अपने ऑटो के पास खड़े आटो ड्राइवर से जैसे ही आम आदमी पार्टी के कामकाज के बारे में पूछा तो उनके बीच से एक आवाज आई- झूठी सरकार है, मैडम, बहुत घटिया सरकार है। हमने जिताया उन्हें। मुफ्त में उनके लाउडस्पीकर और पोस्टर लगाकर प्रचार करते रहे। केवल इसलिए कि यह आम आदमी की सरकार है। हमारा दुख दूर करेगी यह सरकार। मगर यहां तो उलटे हम और दिक्कतों के दलदल में फंस गए।’ आटो चालक दीपक ने बताया कि आज भी दिखावे का जीपीएस सिस्टम चल रहा है। इसका साढ़े तेरह सौ किराया देने के साथ ही हर साल आठ सौ रुपया सिम बदलने का हमें भरना पड़ता है। मगर पूछिए कि जीपीएस सिस्टम का मतलब क्या है। क्या कोई काल सेंटर बना है? अगर किसी सवारी का कोई सामान आटो में छूट जाए या फिर कोई सवारी समस्या में फंस जाए तो वह फोन कहां करेगी? कांग्रेस की तरह यह सरकार भी हमसे यह पैसा ठग रही है। हमें लगा था कि पहली सरकार के समय हो रही सारी धांधली यह सरकार बंद कर देगी। मगर…।

पुलिस तो और मनमाना व्यवहार कर रही है। पहले तो एक जुर्म करने पर एक ही सजा मिलती थी, अब तो दो या तीन बार सजा मिलती है। उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा किसी सवारी से ज्यादा पैसा वसूलने, या ज्यादा सवारी बैठाने, या सवारी को बैठाने से मना करने या दूसरे नियम तोड़ने पर पहले या तो जुर्माना होता था या गाड़ी बंद होती थी। मगर अब तो जुर्माना भी होता है और गाड़ी भी बंद होती है। उस पर भी गाड़ी जितने दिन थाने में बंद रहेगी उसकी निगरानी का कर भरो। निगरानी कर कोई सरकारी कर नहीं है, बल्कि घूस के लिए आटो चालकों द्वारा ईजाद किया एक नया शब्द है। पुलिस वाले कहते हैं कि भाई गाड़ी का कोई टायर निकाल ले गया या दूसरा हिस्सा ले गया तो हमारी जिम्मेदारी नहीं होगी। निगरानी के लिए सौ डेढ़ सौ रुपए भरने पड़ते हैं। गुगल साह का हाल ही में अभी चालान कटा है। दीपावली से पहले उनकी गाड़ी तीन दिन बंद रही। उसके लिए रोजाना सौ रुपए भरने पड़े। फिर पैंतीस सौ रुपए जुर्माना भरकर गाड़ी छुड़वाई। मगर पांच-छह दिन बाद दोबारा पहले ही जुर्म के लिए पांच दिन के लिए फिर गाड़ी बंद कर दी। फिर गाड़ी की निगरानी की कीमत अदा करनी पड़ी।

किशोर कुमार भी आम आदमी पार्टी की वादा खिलाफी से नाराज हैं। उन्होंने कहा कि आटो वालों ने ही सरकार बनवाई है। अगर हम सरकार बनवा सकते हैं तो गिरवा भी सकते हैं। सैकड़ों करोड़ सरकार ने प्रचार में खर्च किए। मगर आटो स्टैंड नहीं बन पाए। जब आटो स्टैंड इतने कम हैं तो आप ही बताओ हम आटो खड़े कहां करें? पुलिस वाले जहां-तहां डंडा पीटकर हमसे वसूली करते हैं। आगे खड़े आटो चालक किशोर कुमान ने गुस्से में कहा कि आटो का पिछला हिस्सा हम विज्ञापन के लिए दे देते। फिर सरकारी पैसा इसमें लुटाने की क्या जरूरत थी? चुनाव प्रचार के वक्त दिया भी था। ईमानदार सरकार नहीं बेईमानों की सरकार है यह।

वेतन बढ़ेगा तो ऊपर की कमाई नहीं करेंगे विधायक

लोग सवाल यह भी पूछ रहे हैं कि टीम का चेहरा रहे योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण जैसे लोगों को इन्हें हटाने की जरूरत पड़ जाती है तो क्या हम समझें कि टीम चुनने में ही ये असफल रहे या फिर मुख्यमंत्री की हां में हां मिलाने वाले ही इस सरकार में रहेंगे? उधर वेतन बढ़ने और विज्ञापन के खर्चे के बारे में विधायक राजेंद्र गौतम का बयान भी हैरानी भरा है। गौतम कहते हैं कि देखिए विज्ञापन पर तो हर सरकार खर्च करती रही है। इसका सरकारी बजट होता है। इसलिए इसे तो खर्च करना ही पड़ेगा। भाजपा तो अखबारों में एक-एक पन्ने का विज्ञापन खुलकर छाप रही है। हालांकि जब उन्हें याद दिलाने की कोशिश की गई कि आपकी सरकार ने ही तो कहा था कि यह दूसरी सरकार से अलग सरकार है तो फिर उनसे आप अपनी तुलना कैसे कर रहे हैं?  इस बात को अनसुना करते हुए उन्होंने कहा कि रही बात वेतन बढ़ने की तो अभी यह प्रस्ताव दिया गया है। वेतन नहीं बढा है। वैसे भी अगर वेतन बढ़ जाएगा तो ऊपर की कमाई पर रोक लगेगी। उनसे यह भी पूछा गया कि क्या जिनका वेतन कम है उन्हें ऊपर की कमाई करने का हक है? तो उन्होंने कहा यह मतलब उनका नहीं है, वह तो बस यह कह रहे हैं कि वेतन बढ़ने का प्रस्ताव जनता से बेईमानी नहीं है। कुछ ऐसा ही जवाब विधायक अखिलेश पति त्रिपाठी ने भी दिया। उनसे जब पूछा गया कि जनता पूछ रही है कि आम जनता की समस्याओं का निदान करने की जगह पहले विधायकों का वेतन क्यों बढ़ाया जा रहा है तो उन्होंने भी कहा यह अभी तो प्रस्ताव है। हम जनता का भी भला कर रहे हैं। आगे भी करेंगे। विज्ञापन वाली बात पर उन्होंने भी कहा हमने बजट से ज्यादा नही खर्च किया।

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कहीं नाराजगी तो कहीं उम्मीद है बाकी

रेहड़ी पटरी और छोटे कारोबारी भी सरकार के कामकाज से खुश नहीं दिखते। कनाट प्लेस मे बच्चों के खिलौने और सेंटा के मुखौटे तथा टोपियां बेच रही बबली कर्नाटक की हैं। वह कब अपने परिवार के साथ दिल्ली आई थीं, याद नहीं। उन्होंने बताया कि कर्नाटक के करीब आठ सौ लोग दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में रेहड़ी पटरी लगाते हैं। कमेटी वाले पहले की तरह ही हमें डंडा मारकर भगा देते हैं। हमारा सामान उठा ले जाते हैं। फिर हजार-हजार रुपए मांगते हैं। मैंने तो कई बार अपना सामान ही छोड़ दिया। बीस सालों से यहीं पर सामान बेच रही हूं। एक संस्था से लोग आए थे कि आम आदमी को वोट देना। तुम्हारे दुख दूर हो जाएंगे। उनके साथ ही जाकर हमने झाड़ू को वोट दिया। मगर सब जैसा का तैसा ही है।

कमेटी वाले पहले की तरह ही हमें डंडा मारकर भगा देते हैं। हमारा सामान उठा ले जाते हैं। फिर हजार-हजार रुपये मांगते हैं। मैंने तो कई बार अपना सामान ही छोड़ दिया

कनाट प्लेस में रीगल सिनेमा के पास सन् 1995 से बेल्ट की दुकान लगाए वीरेंद्र ने कहा सरकार को वोट तो दिया था। मगर अभी तो कुछ नहीं हुआ। हम तो जगह का किराया भी देते हैं। एनडीएमसी की किराए कि स्लिप दिखाते हुए उन्होंने कहा कि आठ सौ दस रुपए हम हर महीने किराया भरते हैं। फिर भी पुलिस खाने का बहाना खोज ही लेती है। वहां के सभी दुकानदारों का यही कहना था। उन्होंने कहा कि न तो कुछ अच्छा हुआ, न ही बुरा। मगर अभी हमें उम्मीद है। सरकार छोटे कारोबारियों के लिए कुछ करेगी। पहाड़गंज में फुटपाथ पर चाय और गुटखे की दुकान लगाए सलीम को तो उम्मीद है सरकार जरूर गरीबों के बारे में सोचेगी। तो जनपथ में आर्टिफिशियल जुलरी की दुकान लगाए दीपक आम आदमी के कामकाज से खुश हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस न पहले हमें परेशान करती थी, न अब।

यहां पर कपड़ों की स्थायी दुकान लगाए मंजीत ने कहा कि इस पार्टी ने भी दूसरी सरकारों की तरह बस सपने भर दिखाए। वह ज्यादा कुछ बोलने को तैयार नहीं थे। मगर उनसे जब पूछा गया गया कि दस महीनों की सरकार की परफार्मंेस को वह दस में से कितने नंबर देंगे तो उनका जवाब जीरो था। हालांकि उन्होंने कहा कि दस महीने बीते हैं मगर कई और महीने बाकी हैं। उम्मीद है कि सरकार कुछ अच्छा करेगी। उनके ठीक बगल वाली दुकान पर बैठे राजीव को बीस साल से ज्यादा यहां अपनी दुकान चलाते हो गए। पहले उनके पिता यहां बैठते थे। उन्होंने मौजूदा सरकार को दस में से माइनस दस नंबर दिए। कुछ ऐसी ही प्रतिक्रया ज्यादातर रेहड़ी पटरी वालों और छोटे कारोबारियों से मिली।

आम आदमी पार्टी के दस महीनों के कामकाज का जायजा लेते वक्त लोगों में नाराजगी साफ दिखी, विधायकों के वेतन बढ़ने और विज्ञापन के खर्चे से लोग बौखलाए हैं। कुछ लोग ऐसे भी मिले जो दस महीनों के कामकाज से खुश तो नहीं हैं, मगर उम्मीद बाकी है। यही उम्मीद आम आदमी पार्टी के लिए लोगों का गुस्सा दूर करने का एकमात्र जरिया भी है। दस महीने बीते हैं मगर तकरीबन पचास महीने अभी बाकी हैं। इन बचे महीनों में आम जनता की उम्मीद पर खरा उतरकर आम आदमी पार्टी की सरकार लोगों का टूटा भरोसा जोड़ने की कोशिश कर सकती है।