नागरिकता संशोधन विधेयक हंगामा है क्यों बरपा…

लोकसभा की मंजूरी के बाद नागरिकता संशोधन विधेयक राज्यसभा में पेश किया जा चुका है. विधेयक के प्रावधानों को लेकर पूर्वोत्तर में हंगामा मचा हुआ है. भाजपा के कई सहयोगी दल भी उसका साथ छोड़ रहे हैं. पूर्वोत्तर के करीब सौ संगठनों ने विधेयक के विरोध में बंद का आह्वान किया है, लोग सडक़ पर उतर आए हैं. आखिर ऐसा क्या है विधेयक में, जिसके चलते पूर्वोत्तर में उबाल आ गया है.

नागरिकता संशेधन विधेयकएक बार फिर पूर्वोत्तर के राज्यों में आंदोलन शुरू हो गया है. उत्तर पूर्व भारत के राज्यों के सौ से अधिक संगठन एवं कई राजनीतिक दल अपनी पहचान बनाए रखने का हवाला देकर लगातार विरोध कर रहे हैं. लेकिन, यह विरोध न तो एनआरसी के मुद्दे पर है और न पूर्वोत्तर की उपेक्षा को लेकर. इस बार नाराजगी नागरिकता संशोधन विधेयक को कानून बनाए जाने के चलते उभर कर सामने आई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिल्चर की रैली में साफ तौर पर कहा कि केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 को संसद में पारित कराकर उसके प्रावधान लागू करने पर गंभीरता से विचार कर ही है. इसी के बाद पूर्वोत्तर की राजनीति में उबाल आ गया. असम, त्रिपुरा, मेघालय सहित उत्तर पूर्व के कई राज्यों में विरोध होने लगा. भाजपा के सहयोगी दलों ने उसका साथ छोडऩा शुरू कर दिया. असम में भाजपा की सहयोगी असम गण परिषद ने साथ छोडऩे की घोषणा कर दी. कई अन्य दलों ने भी साथ छोडऩे की धमकी दी है. जब विधेयक को लोकसभा में पेश किया गया, तो विपक्षी दलों ने उसका मुखर विरोध किया. आरोप-प्रत्यारोप के बाद आखिरकार विधेयक को लोकसभा की मंजूरी मिल गई, लेकिन पूर्वोत्तर में विरोध लगातार जारी है.

दरअसल, नागरिकता संशोधन विधेयक के प्रावधान पूर्वोत्तर के कई राजनीतिक दलों एवं संगठनों को स्वीकार्य नहीं  हैं. विधेयक में कुछ खास क्षेत्र से आए कुछ खास धर्म के शरणार्थियों के लिए भारतीय नागरिक बनने के प्रावधानों में छूट दी गई है. विधेयक में कहा गया है कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश व पाकिस्तान से भारत आए हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी एवं ईसाई धर्म के लोगों को बिना किसी महत्वपूर्ण दस्तावेज के भारतीय नागरिक बनाया जा सकता है. यही नहीं, विधेयक में नागरिकता के लिए भारत में निवास करने के समय में भी उन्हें छूट दी गई है. नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार किसी भी शरणार्थी को भारतीय नागरिक बनने के लिए पिछले १४ सालों में 11 साल तक भारत में रहना अनिवार्य था. इस विधेयक में यह समय सीमा घटाकर छह साल कर दी गई है. नागरिकता की परिभाषा में इसी बदलाव का सबसे ज्यादा विरोध किया जा रहा है. असम के कुछ संगठन एवं राजनीतिक दल इसे सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा बना रहे हैं, तो कुछ धार्मिक आधार पर भेदभाव वाली व्यवस्था बता रहे हैं. उनका कहना है कि अगर विधेयक के प्रावधान लागू कर दिए गए, तो पूर्वोत्तर के लोगों की सांस्कृतिक पहचान संकट में पड़ जाएगी. पूर्वोत्तर के राज्यों में लगातार आ रहे शरणार्थियों से पहले से ही परेशान चल रहे इन संगठनों को लगता है कि अगर समय सीमा में इतनी छूट दी जाएगी, तो इलाके में रहने वाले बाहरी लोगों को नागरिकता मिल जाएगी और फिर उनके रहन-सहन, खान-पान आदि के तौर-तरीकों और मूल निवासियों के तौर-तरीकों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाएगी.

सांस्कृतिक पहचान के संकट के साथ-साथ विधेयक के प्रावधानों के विरोध की दूसरी वजह इसमें निहित धार्मिक भेदभाव भी है. इसमें अफगानिस्तान, बांग्लादेश व पाकिस्तान से आने वाले हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी  एवं ईसाई धर्म के लोगों को नागरिक बनाने के लिए छूट देने की बात तो कही गई, लेकिन मुसलमानों को शामिल नहीं किया गया. सरकार का मानना है कि इन देशों में धार्मिक अल्पसंख्यक होने के कारण प्रताडऩा झेल रहे लोगों के लिए शरण लेने की जगह भारत ही है और उनकी परेशानियों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए, जबकि इन देशों से आने वाले मुसलमानों की समस्या या तो आर्थिक है या फिर वहां की आंतरिक कलह. लेकिन, भारत के कई राजनीतिक दल इस बात का विरोध कर रहे हैं. कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने संसद में भी सरकार की इस विभेदकारी नीति का विरोध किया है. विपक्ष का मानना है कि यह देश की लोकतांत्रिक और नैतिक भावनाओं के साथ छेड़छाड़ है, क्योंकि नागरिकता जैसे विषय को किसी धर्म विशेष के साथ जोडक़र नहीं देखा जा सकता.

असम में विधेयक का सबसे ज्यादा विरोध असम करार के प्रावधानों के साथ इसका विरोधाभास है. असम करार के अनुसार 24 मार्च 1971 के बाद पड़ोसी देशों से आए लोगों को नागरिकता का अधिकार नहीं दिया जाएगा. लेकिन विधेयक के प्रावधान कहते हैं कि उन्हें नागरिकता दी जा सकती है. शरणार्थी समस्या से जूझते रहे असम में पहले भी इसे मुद्दा बनाकर आंदोलन किया जा चुका है और उसी के बाद 1985 में असम करार हुआ था, लेकिन करार के सभी प्रावधानों का सही क्रियान्वयन न होने की वजह से समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुईं. शरणार्थियों की समस्या से निजात पाने के लिए ही असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को अद्यतन करने की प्रक्रिया शुरू की गई, जिसका पहला मसौदा तैयार हो चुका है, जिसमें करीब चालीस लाख लोगों के नाम नहीं आए थे. ऐसे लोगों को अपने वैध दस्तावेजों के साथ दोबारा दावा करने के लिए 25 दिसंबर 2018 तक का समय दिया गया था. करीब तीस लाख लोगों ने अपना दावा पेश किया है, लेकिन अब भी 10 लाख लोग इससे बाहर हैं. निर्धारित अवधि में दावा पेश करने वाले तीस लाख लोगों के वैध दस्तावेजों की जांच बाकी है. उसके बाद संभव है कि कुछ नाम फिर से काटे जाएं. एनआरसी में भी असम करार को आधार बनाया गया है और उसके अनुसार 24 मार्च 1971 से पहले आने वालों को वैध शरणार्थी और उसके बाद आने वालों को अवैध शरणार्थी बताया गया है. ऐसे में अगर नागरिकता संशोधन विधेयक के प्रावधान लागू कर दिए जाते हैं, तो 1971 की यह सीमा गैर-मुसलमानों के लिए खत्म हो जाएगी. असम के राजनीतिक दल  एवं संगठन इसी बात का विरोध कर रहे हैं.

इस संशोधन विधेयक का राजनीतिक कारणों से भी विरोध किया जा रहा है. भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की नजर पूर्वोत्तर की 25 लोकसभा सीटों पर है. विधेयक में जिस तरह नागरिकता पाने के लिए दी जाने वाली छूट से मुसलमानों को बाहर किया गया है, उसका प्रभाव आगामी चुनाव पर भी पडऩे वाला है. भाजपा की इस पहल से पूर्वोत्तर के दूसरे राजनीतिक दलों का परेशान होना लाजिमी है. इसीलिए सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक आधार को दरकिनार कर मूल निवासी बनाम बाहरी जैसे मुद्दे सामने आए हैं. यही वजह है कि भाजपा के कई सहयोगी दल आज उससे अलग होने की बात कर रहे हैं.

एनआरसी बनाम नागरिकता संशोधन विधेयक

असम में एनआरसी को अद्यतन किए जाने के लिए 24 मार्च 1971 तक भारत आने वाले लोगों को वैध शरणार्थी बनाए जाने की बात है, जिसमें धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया है, लेकिन नागरिकता संशोधन विधेयक में इस समय सीमा को बढ़ाकर 31 दिसंबर 2014 कर दिया गया है. इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान से आने वाले हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई एवं पारसी धर्म के लोगों को तो छूट दी गई है, लेकिन मुसलमानों को नहीं. इस वजह से एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक के प्रावधानों में विरोधाभास पैदा हो गया है.

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