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उत्तराखंड- कब्रिस्तान पर किचकिच

हल्द्वानी में गौला नदी के पार आठ हेक्टेयर रिजर्व वन भूमि पर इंटर स्टेट बस टर्मिनल (आईएसबीटी) के काम पर चार करोड़ रुपये खर्च हो गए तो वहां कंकाल मिलने लगे और उस भूमि को कब्रिस्तान मानकर काम रोक दिया गया। इससे उत्तराखंड में कांग्रेस को बैठे बिठाए एक मुद्दा मिल गया है।

राजीव थापलियाल

कांग्रेसी राख से भी जी उठते हैं। यहां तो मामला कब्रिस्तान का है। एक ऐसा कब्रिस्तान जिसके होने या न होने का अभी तक कोई अधिकृत प्रमाण नहीं है। शासन और प्रशासन के दस्तावेज भी इस विषय पर मौन हैं। उसी कब्रिस्तान के बहाने उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने हल्द्वानी में निर्माणाधीन अंतरराज्यीय बस अड्डे का काम क्या रुकवाया कि मानो कांग्रेस को संजीवनी मिल गई। ऐसी संजीवनी जिसकी उसे वर्षों से तलाश थी। एक ऐसा मरहम जिसे वह अपनों को आपस में जोड़ने के लिए ढूंढ रही थी। बेशक इस संजीवनी को ढूंढने का काम किया है नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने। पर इसने देश की सबसे पुरानी पार्टी को उत्तराखंड में फिर से खड़े होने की ताकत दे दी है। ऐसी ताकत जिसके बलबूते सभी नेता एक छतरी के नीचे आने को बेताव हैं।

वैसे तो इस सियासी किस्से की शुरुआत मई 2017 में ही हो गई थी। कुमाऊं क्षेत्र खासकर हल्द्वानी-नैनीताल की जनता की भावनाओं व संवेदनाओं से जुड़े गौलापार में निर्माणाधीन आईएसबीटी का काम भाजपा सरकार ने रुकवा दिया। जिस स्थान पर आईएसबीटी का निर्माण हो रहा था वह वन विभाग की जमीन है और मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार ने विभाग को उचित मुआवजा देकर उसका अधिग्रहण किया था। जमीन को समतल करने के दौरान मौके से कुछ हड्डियां और कंकाल क्या मिले कि वर्तमान प्रदेश सरकार ने इसे कब्रिस्तान मान लिया और बस अड्डे का काम रुकवा दिया। बात यहीं पर खत्म नहीं हुई। स्थानीय जनता और इस प्रोजेक्ट को अपना सपना मान चुकीं नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश को लग रहा था कि अंतत: सरकार मान जाएगी। क्योंकि किसी भी दस्तावेज में संबंधित स्थान पर किसी प्रकार के कब्रिस्तान के होने का जिक्र नहीं हुआ है। जमीन पर आईएसबीटी बनाए जाने को लेकर डीएम की ओर से शासन को सौंपी गई रिपोर्ट में भी कब्रिस्तान होने का दूर-दूर तक जिक्र नहीं है। इन कारणों से विपक्ष खासकर नेता प्रतिपक्ष को लग रहा था कि सरकार इस मुद्दे को अपनी प्रतिष्ठा से नहीं जोड़ेगी। पर दिसंबर 2017 की अंतिम कैबिनेट बैठक में गौला पार में प्रस्तावित आईएसबीटी का निर्माण कार्य रोकने और इसे कहीं और शिफ्ट करने के प्रस्ताव पर कैबिनेट ने मुहर लगा दी। इस घटना के बाद इंदिरा हृदयेश ही नहीं कुमाऊं के दर्जनों जन प्रतिनिधि और पूर्व कैबिटने मंत्री हरीश चंद्र दुगार्पाल भी सरकार के खिलाफ खड़े हो गया। धीरे-धीरे जनता भी कांग्रेस के अभियान के साथ जुड़ने लगी। कई छिटपुट प्रदर्शन और धरनों के बाद इंदिरा हृदयेश ने 30 जनवरी को आईएसबीटी के मुद्दे पर अनशन की चेतावनी दे दी। इंदिरा हृदयेश सहित कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि गौलापार की जमीन को जान बूझकर विवादित बनाया गया है। यहां कोई कब्रिस्तान नहीं है। इसकी आड़ में सरकार बस अड्डे को शहर से बाहर किसी दूर स्थान पर ले जाना चाहती है। कांग्रेसियों का यह भी आरोप है कि इस बेशकीमती जमीन पर भाजपा सरकार के कुछ लोगों की नजर है और वे इसे कब्जाना चाहते हैं। इस कारण कांग्रेस को इस मुद्दे पर समर्थन मिलता गया। उसे लगातार मिल रहे समर्थन से सरकार के भी कान खड़े हो गए। खासकर दो माह बाद होने वाले निकाय चुनाव को लेकर भाजपा की तैयारी को बड़ा झटका लगा। इस कारण सरकार की कोशिश थी कि इंदिरा हृदयेश के अनशन से पहले ही बस अड्डे के लिए कोई वैकल्पिक स्थान तलाश लिया जाए। पर ऐसा नहीं हुआ और पूर्व प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार इंदिरा हृदयेश 30 जनवरी यानी गांधी जी के शहादत दिवस पर धरने पर बैठ गर्इं। शुरू में सरकार और भाजपा संगठन ने इसे हलके में लिया। उसे लगा कि टुकड़ों में बंट चुकी कांग्रेस का यह कार्यक्रम फ्लाप साबित होगा। परंतु कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पूर्व कैबिट ने मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल तक और पार्टी के तमाम विधायक धरने को समर्थन देने हल्द्वानी पहुंच गए। पहली बार लगा कि किसी मुद्दे पर कांग्रेस एकजुट हुई है। विधानसभा चुनाव के दौरान मिली करारी शिकस्त के बाद पहली बार लगा कि कांग्रेसियों को उनका जनाधार वापस मिल सकता है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष के आह्वान मात्र पर दस हजार से अधिक लोगों के एकत्र हो जाने से भाजपा भी बेचैन हो गई। भीड़ एकट्ठी होने की पहले से मिली सूचना के आधार पर मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत इंदिरा हृदयेश से धरना टालने का अनुरोध करते रहे। यहां तक कि उन्होंने 25 जनवरी को परिवहन सचिव डी सैंथिल पांडियन को हल्द्वानी भेजा और 30 जनवरी से पहले आईएसबीटी के लिए कोई जमीन तलाश लेने के आदेश दिए। परंतु तकनीकी बाधाओं के कारण ऐसा नहीं हो सका। उधर, पर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी इस धरने से अलग रहने के लिए पश्चाताप कर रहे हैं। पहले तो उन्होंने खुद को इस कार्यक्रम से दूर रखा और दिल्ली चले गए। बाद में जब उन्हें पता चला कि दस हजार से अधिक भीड़ जमा हुई तो आनन-फानन में इंदिरा हृदयेश को बधाई दे डाली। साथ में उलाहना भी कि मुझे इस कार्यक्रम में कोई जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई। अब हरीश रावत चाहते हैं कि कांग्रेस संगठन की ओर से यदि कोई कार्यक्रम हो तो उन्हें भी बुलाया जाए और उन्हें भी कोई न कोई जिम्मेदारी दी जाए। इतना ही नहीं, हल्द्वानी में मिले संगठन को अपार समर्थन से हरीश रावत काफी उत्साहित हैं। अब उन्होंने प्रदेश भर के भ्रमण का कार्यक्रम बनाया है और संगठन को मजबूत करने की कोशिश में जुट गए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि दो दिनों तक चले ट्वीटर व फेसबुक वार के बाद प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह से भी हरीश की दोस्ती हो गई है। यानी कांग्रेस को जिस एकजुटता की दरकार थी वह उसे हल्द्वानी ने दे दी है। बेशक इसका सारा श्रेय नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश को जाता है। उन्होंने अपने बलबूते इतनी बड़ी भीड़ एकट्ठी की। पर यदि उनके प्रयासों से संगठन को मजबूती मिलती है तो इसमें गलत भी क्या है।

बात बस अड्डे की, नजर 2019 पर
आईएसबीटी के मुद्दे को धार देते हुए कांग्रेस ने राज्य सरकार को जनविरोधी सरकार के रूप में पेश करने का पूरा प्रयास किया। नेता प्रतिपक्ष ने उपवास कार्यक्रम में सरकार के खिलाफ हुंकार भरी और नोटबंदी एवं जीएसटी से लेकर महंगाई समेत अन्य मुद्दों पर केंद्र एवं राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। कालाधन वापस लाने के मामले पर भी सीधे प्रधानमंत्री पर चोट की तो प्रतिवर्ष दो करोड़ लोगों को रोजगार देने के मामले में भी सवाल दागा। चार वर्षों की केंद्र एवं दस माह की राज्य सरकार की नाकामी गिनाकर कांग्रेसियों में जोश भरने की कोशिश की। साथ ही आह्वान भी कर दिया कि केंद्र एवं राज्य सरकार की विदाई की शुरुआत निकाय चुनाव से शुरू कर दें। खास बात यह रही कि डॉ. हृदयेश के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक के कार्यकर्ता व नेता हल्द्वानी पहुंच गए। पार्टी के मुखिया प्रीतम सिंह भी सभा में मौजूद रहे। उन्होंने खुद कई वरिष्ठ नेताओं से सीधे भी संपर्क साधा और उपवास कार्यक्रम में आने को कहा।

बेरोजगार विपक्ष को मिल गया काम : भाजपा
हल्द्वानी आईएसबीटी को लेकर कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन को भाजपा नौटंकी मान रही है। प्रदेश के सहकारिता मंत्री धन सिंह रावत कहते हैं कि बेरोजगार विपक्ष को आईएसबीटी के बहाने रोजगार मिल गया है। प्रदेश की जनता कांग्रेस को पूरी तरह नकार चुकी है और इस कारण वह हताश होकर उलटा सीधा काम कर रही है।

इंदिरा हृदयेश का तर्क
डॉ. इंदिरा हृदयेश ने एक बयान में कहा कि पुरातत्व विद्वान यशोधर मठपाल ने खुद गौलापार में आईएसबीटी के लिए चयनित भूमि का निरीक्षण किया था। मठपाल ने प्रमाणित किया था कि अवशेष हिंदू समुदाय के शिशुओं के हो सकते हैं या वे लोग जो खेतों में निवास करते थे अपने परिजनों का दाह संस्कार खेतों के समीप वन भूमि में ही कर देते थे। इंदिरा ने कहा कि श्मशान भूमि की भ्रांति फैलाकर गौलापार के चयनित स्थान का महत्व कम न किया जाए। राज्य सरकार का लगभग साढ़े तीन से चार करोड़ रुपये उक्त योजना में खर्च हो चुका है। उसकी भरपाई कौन करेगा।

सरकार आईएसबीटी के लिए कोई नई जगह तलाश करती है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। डॉ. हृदयेश ने कहा कि आईएसबीटी के लिए प्रस्तावित 75 या 80 एकड़ जमीन वन विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। किसी योजना के लिए एक बार जमीन आवंटित होने के बाद उसी योजना के लिए दूसरी जमीन नहीं मिल सकती है। वन विभाग को पौधरोपण के लिए दोगुनी जमीन देनी होती है।

ऐसे रुका काम, गरमाई सियासत
मई 2017 की बात है। हल्द्वानी में गौला नदी के पार आठ हेक्टेयर रिजर्व वन भूमि के इलाके में इंटर स्टेट बस टर्मिनल (आईएसबीटी) का काम हो रहा था। कार्यदायी संस्थान नागार्जुन ने जब वन भूमि को समतल करने के लिए खुदाई का काम किया तो वहां हड्डियां निकलनी शुरू हो गर्इं। हड्डियों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया परंतु 10 मई को भूमि के समतलीकरण के दौरान वहां कई कब्रनुमा चबूतरे मिले। इसके बाद कार्यदायी संस्था के प्रोजेक्ट मैनेजर ने काम पर रोक लगा दी। बनभूलपुरा थाना पुलिस ने उस स्थान का मौका मुआयना किया जहां बच्चों की कब्रें ज्यादा मिली हैं। पुलिस को एक बच्चे की खोपड़ी की हड्डी भी पड़ी मिली। पुलिस ने इसका पंचनामा भरकर कब्जे में ले लिया है। बाद में कब्रों की रिपोर्ट आला अफसरों को दी। सवाल यह है कि कब्रिस्तान है किसका और राजस्व अभिलेखों में इसका उल्लेख क्यों नहीं है। आईएसबीटी के लिए भूमि के चयन के दौरान तत्कालीन डीएम की रिपोर्ट में कोई भी धार्मिक स्थल, कब्रिस्तान न होने की बात का उल्लेख है। हल्द्वानी के एक नागरिक को आरटीआई में दी गई जानकारी के अनुसार वन भूमि के हस्तांतरण से पहले हर तरह की प्रक्रिया वन विभाग, निर्माण कंपनी, आरटीओ और प्रशासन ने पूरी की। इस दौरान न तो कब्रिस्तान का मामला सामने आया और न ही कोई कंकाल दिखा। समतलीकरण के दौरान अचानक हड्डियों और कब्रों का मिलना कई सवाल खड़े करता है। कुछ कब्रों को दो सौ साल पुराना बताया जा रहा है। सवाल यह है कि दो सौ साल पहले तो सीमेंट का इस्तेमाल ही नहीं होता था।

यह है पूरी योजना
हल्द्वानी के गौलापार में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय खेल काम्प्लेक्स के करीब 22 एकड़ जमीन में आईएसबीटी बनाया जा रहा है। इसके लिए 76 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया गया है। अक्टूबर 2016 में हरीश रावत के कार्यकाल में तत्कालीन वित्त मंत्री व वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के प्रयासों से इसका शिलान्यास हुआ। मई 2017 में इस भूमि पर निर्माण कार्य शुरू हुआ। 10 मई को कब्रिस्तान का मामला सामने आया। उसके बाद परिवहन मंत्री यशपाल आर्य ने जांच होने तक काम रोकने के आदेश दिए। मेडिकल कालेज में हड्डियों की फोरेंसिक जांच हुई। जांच में हड्डियों को एक दो साल पुराना बताया गया।

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