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विनोद खन्ना- सफलता जिनके कदम चूमती थी

विनोद खन्ना ने कभी भी सफलता की कामना नहीं की, बस अपना काम करते रहे। जिस समय उनका स्टारडम चरम पर था उन्होंने आध्यात्मिक शांति की तलाश में ओशो की शरण ले ली जिसका उनके कैरियर पर बुरा प्रभाव पड़ा।

निशा शर्मा।

हिंदी सिनेमा का जाना माना चेहरा विनोद खन्ना नहीं रहे। उन्होंने मुंबई के रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में 27 अप्रैल को अंतिम सांस ली। वे 31 मार्च से अस्पताल में भर्ती थे जिसके बाद खबरें आती रहीं कि उन्हें ब्लैडर कैंसर। हालांकि इस बात की पुष्टि उनके परिवार ने नहीं की। उनका जन्म 7 अक्टूबर, 1946 को पेशावर, पाकिस्तान में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार मुंबई आकर बस गया था। उनके पिता किशनचंद्र खन्ना एक बिजनेसमैन थे और माता कमला खन्ना एक हाउसवाइफ थीं।

जिस समय विनोद खन्ना ने फिल्मों में कदम रखा उस समय हीरो के लिए अभिनय के अलावा भी कई मापदंड थे। जैसे, वह देखने में गोरा, लंबा और खूबसूरत हो। विनोद इस खांचे में खासे जमते थे। फिल्म समीक्षक जय प्रकाश चौकसे विनोद खन्ना को याद करते हुए कहते हैं, ‘विनोद खन्ना पृथ्वीराज कपूर के बाद इकलौते अभिनेता थे जिनकी कद काठी अच्छी और सुडौल थी, रंग गोरा था। जैसा कि हमारे शास्त्रों में आर्यपुत्र का वर्णन किया गया है, बिल्कुल उसी रूप में विनोद खन्ना को देखा जाता था। लेकिन इसका उनमें कभी घमंड नहीं था। वे पंजाब की पृष्ठभूमि से निकले एक गबरूजवान थे। यही कारण था कि वे हैंडसम हीरो की लिस्ट में भी रहे।’

विनोद खन्ना के पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा फिल्मों में जाए लेकिन वे सिर्फ और सिर्फ अभिनेता ही बनना चाहते थे। बेटे की इच्छा और जिद ने पिता को झुका दिया। हालांकि पिता ने विनोद को दो साल का समय दिया कि अगर वे फिल्मों में जम गए तो ठीक है वरना उन्हें पारिवारिक बिजनेस को आगे बढ़ाना पड़ेगा। यही कारण था कि उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में कड़ी मेहनत की लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उनका कोई गॉड फादर नहीं था। इस वजह से उन्होंने शुरुआत में किसी भी तरह के रोल को स्वीकार करना ही बेहतर समझा। उन्हें पहली फिल्म में विलेन का रोल का आॅफर किया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। जय प्रकाश चौकसे कहते हैं, ‘विनोद खन्ना को पहला ब्रेक फिल्म ‘मन का मीत’ में मिला था। इसमें वह साइड रोल में था। दरअसल, इस फिल्म के जरिये सुनील दत्त अपने भाई सोम दत्त को लांच करना चाहते थे। फिल्म में अभिनेत्री लीना चंद्रावरकर थी। उनकी भी यह पहली फिल्म थी। यह फिल्म सोम दत्त के लिए तो हिट साबित नहीं हुई लेकिन विनोद खन्ना और लीन चंद्रावरकर चल पड़े।’ इस फिल्म के बाद भी वह कई शुरुआती फिल्मों में सह अभिनेता या विलेन के रोल में ही नजर आए। इनमें से कुछ फिल्में थीं पूरब और पश्चिम, सच्चा झूठा, आन मिलो सजन, मस्ताना, मेरा गांव मेरा देश, ऐलान आदि।

लेकिन जैसे-जैसे उनकी फिल्में आती गर्इं उन्होंने अपनी जगह फिल्म जगत में बना ली। कई फिल्मों में उन्हें उनके किरदार के तौर पर जाना जाने लगा। इनमें मेरे अपने, मेरा गांव मेरा देश, इम्तिहान, इनकार, अमर अकबर एंथनी, लहू के दो रंग, कुर्बानी, दयावान और जुर्म जैसी फिल्में हैं। एक समय ऐसा आया जब विनोद खन्ना का सितारा सिनेमा जगत में जगमगाने लगा। उन्हें अमिताभ बच्चन की टक्कर में गिना जाने लगा। 1977 में अमिताभ बच्चन के साथ उनकी फिल्म परवरिश में वे स्टार के तौर पर उभरे। अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना को फिल्म समीक्षकों और पत्र-पत्रिकाओं ने प्रतिद्वंद्वी करार दिया। जयप्रकाश चौकसे उस समय को याद करते हुए कहते हैं कि यह सच है कि एक समय ऐसा आया जब विनोद खन्ना स्टारडम के चरम पर पहुंचे लेकिन ऐसे समय में वह आध्यात्मिक शांति के लिए आचार्य रजनीश (ओशो) के पास आने जाने लगे। इसकी वजह से उनके कैरियर पर भी बुरा प्रभाव पड़ा। आधयात्मिक शांति के प्रति विनोद खन्ना का लगाव उन्हें फिल्मों से दूर ले जाता गया। यही नहीं जहां भी आचार्य रजनीश जाते विनोद खन्ना उनके पीछे-पीछे जाने लगे। जब आचार्य रजनीश अमेरिका गए तो विनोद भी अपना सब कुछ छोड़कर अमेरिका चले गए थे। बाद में वह वापस फिल्मों में लौटे जरूर पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। ऐसे में विनोद काफी पीछे रह गए और उन्हें वह सिंहासन नहीं मिल पाया जिसकी दौड़ में वे अव्वल आ सकते थे।

चौकसे कहते हैं कि विनोद खन्ना एक ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने कभी सफलता की कामना नहीं की। वे बस काम करते था। उन्हें ज्यादा पैसा, ख्याति कुछ नहीं चाहिए था। उन्होंने कभी ऐसे किरदारों को करने के लिए मना नहीं किया जहां मल्टी स्टार हों या उसके विपरीत कोई बड़ा अभिनता हो। साल 1998, 1999, 2004 और 2014 में वे पंजाब के गुरदासपुर क्षेत्र से भाजपा की टिकट पर सांसद चुने गए। 2002 में वे संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री भी रहे। विनोद खन्ना ने जब-जब फिल्मों में वापसी की दर्शकों के दिलों में जगह बनाते गए लेकिन उनकी जिंदगी के पन्नों को टटोलें तो पता लगता है कि अभिनय के क्षेत्र में उन्होंने कभी भी अपनी अभिनय क्षमता को पूरी तरह नहीं टटोला।

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