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रफा करो रफाल की राजनीति

प्रवीण सिंह कमोडोर।

कूटनीति और राजनीति हमेशा ही युद्ध का एक आवश्यक अंग रही हैं। चाहे वो सदियों पहले लड़ी गई महाभारत हो या दशकों पहले लड़ा गया विश्व-युद्ध। राजनीति का उपयोग प्राय: युद्ध टालने के लिए होता है। ‘दे दो केवल पांच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम’- पांडवों के इस प्रस्ताव से महाभारत नहीं टाली जा सकी तो फिर कृष्ण सेना जुटाने की कूटनीति में लग गए। कौन कौरवों का साथ देगा और कौन पांडवों का, ये तय करने के बाद युद्ध शुरू हुआ। और उसके बाद जिसमें जितना कौशल रहा वो उसके हिसाब से लड़ता गया।
कोई भी परिपक्व देश, चाहे वहां प्रजातंत्र हो या तानाशाही, सेनाओं के लिए खरीदे गए हथियारों में राजनीति नहीं करता। राजनीति का प्रयोग आदर्श रूप से युद्ध टालने के लिए होता है न कि हथियारों की खरीदारी में अड़ंगा डालने के लिए। बोफोर्स बंदूकें हों, नौसेना की बराक मिसाइल या पनडुब्बियां हों या वायु सेना के विमान; हथियारों की हर खरीद में राजनीति घुसा देना, ये कला कोई हमारे देश के नेताओं से सीखे। देश के लिए खरीदे जाने वाले हथियार कितने ही सक्षम क्यों न हों हम उनकी मट्टीपलीद करना भली भांति जानते हैं। और अगर ऐसा न हुआ तो विपक्ष अपनी भूमिका कैसे अदा करेगा! दूसरी बात यह भी है कि हथियारों की खरीद में बहुत ज्यादा धन लगता है और धन पर तीन पांच करना हमारे राजनेताओं का प्रिय विषय रहा है। इसी श्रृंखला की सबसे नई कड़ी आज रफाल लड़ाकू विमान है। बस पाला बदल गया है। आलोचक वही हैं जो कुछ वर्षांे पहले आलोच्य थे। आलोचना के मूल विषय से पहले चलिए ये देखें कि रफाल है किस चिड़िया का नाम और ये हिन्दुस्तान में कहां से उड़ कर आ रही है! वैसे रफाल को एक चिड़िया कहना उचित नहीं। ये बेहद सक्षम और आधुनिक लड़ाकू विमान है और आधुनिकतम विमानों में गिना जाता है। मल्टीरोल, हवा से सतह और हवा से हवा वाली मिसाइलों और उपकरणों से लैस, शक्तिशाली दो इंजन वाला ये विमान दुश्मन के खेमे में कहर ढाने की क्षमता रखता है। तो फिर समस्या क्या है?

वायुसेना की जरूरतें
आजादी के बाद से भारतीय वायुसेना की ज्यादातर जरूरतें पूर्व सोवियत संघ द्वारा निर्मित मिग और अन्य विमानों द्वारा पूरी होती रही थीं। शीत युद्ध के दौरान रूस के साथ सौदा करने के कई कारण रहे थे। रूस हमारा पुराना राजनीतिक समर्थक रहा था और रुपये रूबल व्यापार से दोनों देशों को फायदा होता था। सोवियत संघ के टूटने के बाद जब नए समीकरण बनने लगे तो भारत ने अपनी रक्षा खरीदारी के लिए दूसरी दिशाओं में भी देखना शुरू किया। पर जहां तक फ्रांस का सवाल रहा, हम उससे लड़ाकू विमान बहुत पहले से ही खरीदते आ रहे हैं। मिग विमानों की बढ़ती उम्र और घटती संख्या के कारण वर्ष 2001 में वायुसेना में एक नई सोच पनपी, जिसमें अलग-अलग हल्के या भारी विमानों के बदले एक ऐसे प्रकार के विमान को खरीदने पर विचार किया गया था जो बहुमुखी हो यानी मल्टीरोल निभा सके। बाहरी देशों से विमान खरीदने का एक मुख्य कारण ये भी रहा कि सफेद हाथी कही जाने वाली संस्था डीआरडीओ द्वारा विकसित घरेलू फाइटर जिसे अब तक हमारे नभ में होना चाहिए था, क्षितिज पर भी नहीं था! तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी के समय, 2007 में इस प्रस्ताव को अनुमोदित किया गया। लाल-फीताशाही की रेल गाड़ी पर सवार ये प्रक्रिया चलती रही और 2012 में जाकर ये अनुबंध रफाल के पक्ष में गया।

रफाल बनाम अन्य
अगर हम यूरोप का इतिहास देखें तो वहां के छोटे छोटे देश अक्सर मिल कर अपनी सामूहिक शक्ति दिखाते हैं। उनकी नीति हमेशा ‘एक से भले दो’ के सिद्धांत पर चलती है। मामला चाहे अर्थव्यवस्था से जुड़ा हो या सामरिक निर्णयों से, इनकी विदेश नीतियां भी आपस में मिलती जुलती रही हैं लेकिन अगर आप गौर से देखें तो फ्रांस कुछ हद तक अपनी ढपली अपना राग बजाता रहा है। वो सामरिक संबधों से लेकर राजनीति में अपनी अलग पहचान रखता आया है। वह टीपू सुल्तान के जमाने से भारत का पुराना सामरिक मित्र भी रहा है। दशकों पहले जब ब्रिटेन, इटली, जर्मनी और स्पेन जैसे यूरोपीय देशों ने मिल कर लड़ाकू विमान बनाने की नीति अपनाई तो फ्रांस ने कुछ दिनों तक उनका साथ निभाने के बाद अपने आप को उस परियोजना से अलग कर लिया और अपने रक्षा विमानों को अकेले ही बनाने का निर्णय लिया। नतीजा ये हुआ कि फ्रांस की कंपनी डासो एविएशन द्वारा विकसित रफाल विमान बाकी यूरोपीय देशों द्वारा मिल कर बनाए गए टाइफूनफाइटर का प्रतिद्वंद्वी बन गया। डासो एविएशन वही कंपनी है जिसने भारतीय वायुसेना को मिराज जैसे सक्षम विमान बेचे थे। मिराज हमारी और कई अन्य वायुसेनाओं में पिछले कई दशकों से सेवारत हैं। भारतीय वायु सेना इनसे अत्यधिक संतुष्ट रही है। कारगिल युद्ध में इनको गेम-चेंजर माना गया था और भारत की जीत का एक बड़ा श्रेय इनके हिस्से भी गया था। रफाल विमान अपने बड़े भाई मिराज से कहीं ज्यादा सक्षम माने जाते हैं। फिलहाल विश्व की कई वायु सेनाएं या इन्हें उड़ा रही हैं या खरीदने की और बढ़ रही हैं। इन विमानों की क्षमता किसी भी संशय या तर्क से परे है, यह बात स्वयं भारतीय वायुसेना के आला अधिकारियों ने डंके की चोट पर कही है। आज इसे दुनिया के सबसे सक्षम मल्टीरोल वाले विमानों में गिना जाता है। प्राय: कोई विमान अपने किसी एक ही मुख्य मिशन के लिए कारगर होता है पर एक मल्टीरोल लड़ाकू विमान कई चीजें एक साथ करने के लिए सक्षम होता है। जैसे रेकी, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, एयरस्पेस नियंत्रण, मिसाइल फायरिंग, दुश्मन की एयर सुरक्षा को भेदना आदि। अगर आप इतनी सारी सुविधाएं एक जगह डालेंगे तो जाहिर है कि विमान का आकार बड़ा हो जाएगा और उसकी शक्ति, क्षमता, गति और चपलता पर सीधा असर पड़ेगा। इसलिए मल्टीरोल विमानों को सोच समझ कर बनाया जाता है, ताकि लड़ाई के एक मिशन को पूरा करने के चक्कर में उनकी दूसरी क्षमताओं पर ज्यादा असर न पड़े। भारतीय वायुसेना द्वारा इस श्रेणी में उपलब्ध दुनिया भर के विमानों को ठोक बजा कर और कठिनतम परिस्थितियों में उड़ा कर देखा गया। एक लंबे परीक्षण के बाद रफाल और यूरोफाइटर की अंतिम सूची बनाई गई। अब जो कम बोली लगाता उसी को सौदा जाता। जब दोनों कंपनियों की प्राइसबिड (बोली) खुली तो कम दाम होने के कारण रफाल बाजी मार गया।

क्यों साइन नहीं हो पाया था पुराना अनुबंध डासो एविएशन के साथ?
2007 की आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) के हिसाब से सौदे में भाग लेने वाली कम्पनियों को 18 विमान अपने देश में तैयार कर वायुसेना को देने थे और बाकी के 108 हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) में बनाये जाने थे। जब बोलियों के लिफाफे खोले गए तो डासो एविएशन की कीमत सबसे कम पाई गई। लेकिन उस कीमत में एचएएल ने विमान बनाने में असमर्थता जाहिर की। डासो एविएशन कम्पनी का कहना था कि एचएएल एक विमान बनाने के लिए उसकी बोली में लगाई गई अनुमान राशि से ज्यादा समय और पैसे मांग रही थी। यानी देश में बने विमान विदेश से महंगे। डासो एविएशन को एचएएल की सुविधाएं और कार्य प्रणाली भी सक्षम नहीं लगीं। ऐसे में उसका मानना था कि वहां से बने विमानों में वो गुणवत्ता नहीं आ पाएगी जो फ्रांस में बने विमानों में होगी। अगर यहां बने जहाज गलती से दुर्घटनाग्रस्त हो गए उससे उसकी प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लग सकता था। इन सब को मद्दे नजर रखते हुए कम्पनी ने हिन्दुस्तान में बने विमानों की गारंटी लेने से मना कर दिया। रक्षा मंत्रालय ने इसे आरएफपी का उल्लंघन मानते हुए इस बात पर जोर दिया कि हिन्दुस्तान में बने विमानों का मूल्य वही होना चाहिए जो कंपनी ने अपनी बोली में लगाया था। इस पर एका न होने से सौदा खटाई में पड़ गया। उस समय की सरकार इस मसले पर कोई निर्णय नहीं ले पाई। दूसरी तरफ वायुसेना देश की सुरक्षा का हवाला देते हुए जल्द से जल्द विमानों को खरीदना चाह रही थी। सरकार बदलने पर वायुसेना की जरूरतों के तहत मौजूदा सरकार ने 36 विमानों का इंटरगवर्नमेंटल समझौते के तहत नए सिरे से सौदा किया ताकि वायुसेना की जरूरतें कुछ हद तक पूरी हो सकें। इस सौदे का ऐलान 2015 में प्रधानमंत्री के फ्रांस दौरे के दौरान किया गया और इस पर 2016 में हस्ताक्षर किए गए। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस सौदे का मूल्य 59 हजार करोड़ रुपये है और इसके तहत पहला विमान सितम्बर 2019 में भारत आएगा। यानी 2001 में देखे गए वायुसेना के 126 विमानों के सपनों का पहला विमान अंतत: भारत के नभ में अपने पंख पसारेगा। इस सौदे में खरीदे जा रहे सारे विमान फ्रांस से ही आएंगे। हो सकता है कि आगे जाकर बाकी के विमान भारत में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत ट्रांसफर आॅफ टेक्नोलॉजी से बनाए जाएं पर उनके लिए नया सौदा होगा। सरकार के इस फैसले से वायुसेना बहुत खुश नजर आ रही है क्योंकि उन्हें अंतत: अपनी पसंद का विमान मिल रहा है, भले ही इनकी संख्या फिलहाल उतनी नहीं जितनी उन्हें चाहिए।

विपक्ष के किन सवालों पर बवाल
आइए हाल में उठाए गए कुछ आलोचना भरे सवालों पर सूक्ष्मता से नजर डालते हैं :
सरकार विमानों का असली मूल्य छिपा रही है।
हमें एक बात समझनी चाहिए कि सेना की खरीदारी कोई आईपीएल की नीलामी नहीं जिसे टीवी पर लाइव दिखाया जाए। ऐसा दो कारणों से किया जाता है, पहला बेचने वाली कंपनी ये नहीं चाहेगी कि आप उसकी लगाई बोली पूरी दुनिया को बताएं। ये रक्षा व्यापार की आचार संहिता के खिलाफ माना जाता है। दूसरी तरफ खरीदार कीमतों का खुलासा इसलिए नहीं चाहेगा क्योंकि कीमतों से दुश्मन को यह पता चल जाएगा कि आपके खरीदे हुए उपकरणों में कितनी मारक क्षमता है। अगर ऐसा हुआ तो आप आधी लड़ाई ऐसे ही हार जाएंगे।
इंटरगवर्नमेंटल विधि से खरीदने में विमानों की कीमत पुराने अनुबंध के हिसाब से ज्यादा मंहगी है।
जब भी कोई रक्षा अनुबंध साइन होता है तो उसमें उपकरणों के अलावा कई और चीजें होती हैं। जैसे भविष्य में उनके रखरखाव में काम आने वाले कल पुर्जे, प्रशिक्षण, साथ लगा इन्फ्रÞास्ट्रक्चर, विमानों के साथ खरीदी जाने वाली मिसाइलें या अन्य उपकरण और ढेरों अन्य सामग्री। कभी-कभी तकनीकी हस्तांतरण भी परियोजना का हिस्सा होता है। इन सबके अलावा सबसे महत्त्वपूर्ण बात होती है ‘प्राइस एस्कलेशन’। मतलब आप अनुबंध साइन करने में जितनी देरी करेंगे दाम उतने ही बढ़ते जाएंगे। ये दाम प्रतिवर्ष कितने बढ़ाए जाएंगे, कंपनियां अपनी बोली में लिख देती हैं। एक और चीज मद्देनजर रखनी होती है और वो है विदेशी मुद्रा की बढ़ती कीमतें। प्राय: रुपया डॉलर या यूरो की तुलना में कमजोर होता जाता है। इसलिए अगर आपके दाम डॉलर में स्थिर भी रहें तो रुपयों में बढ़ते जाएंगे। इसलिए किसी भी देश के हित में ये रहता है कि आप जल्द से जल्द अपने रक्षा-अनुबंधों को अन्तिम रूप दें। अगर किसी कारण अनुबंध पर हस्ताक्षर करने में देर हो जाए (जो हमारे देश में एक आदत सी बन गई है) तो आपको इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है और कीमतें स्वत: अधिक हो जाती हैं। एक और सामान्य व्यापार ज्ञान ये भी है कि आप जितनी ज्यादा संख्या में माल खरीदेंगे सौदा उतना ही सस्ता होगा। यानी 126 विमानों की खेप में एक इकाई विमान सस्ता पड़ेगा बजाय तब जब आप सिर्फ 36 विमान खरीद रहे हैं। इस गणित के मद्देनजर ही दामों की तुलना होनी चाहिए। शायद आलोचकों ने इस विषय पर जल्दबाजी दिखाई है और अपनी गणित की बुद्धि का पूरा इस्तेमाल नहीं किया है। ध्यान रहे कि 126 विमानों का अनुबंध मतभेदों के कारण साइन नहीं हो पाया था और 36 विमानों का अनुबंध साइन हो चुका है। एक सौदे की बोली 2007 में लगी थी तो दूसरे की 2016 में। मूल्यात्मक तुलना एक समय में साइन किए हुए सौदों की होती है। वो भी तब जब दोनों सौदे बिल्कुल एक सामान हों।
किसी ‘पूरे’ से एक ‘अधूरे’ की तुलना करना व्यापार बुद्धि न होने का द्योतक माना जाता है। डासो एविएशन द्वारा दूसरे देशों को बेचे गए रफाल विमानों से भी भारत के विमानों की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि उनमें लगे उपकरण भिन्न हैं। हमारी प्रशिक्षण की जरूरतें भी अलग हैं। वायुसेना के कुछ आला अधिकरियों ने अपने वक्तव्यों में इस बात से इनकार किया है कि रफाल विमानों के मूल्य में डासो एविएशन ने कोई इजाफा किया है।
इंडियन आॅफसेट पार्टनर्स के रूप में डासो एविएशन ने रिलायंस को चुना है जिसके पास रक्षा उपकरण बनाने का पूर्व अनुभव नहीं।
इस पर टिप्पणी करने से पहले आइए देखें ये आफसेट क्या बला है! आॅफसेट किसे कहते हैं उसे समझने के पहले ये समझ लेना चाहिए कि इस देश के किसी आम नागरिक के लिए आॅफसेट के नियमों को समझना उतना आसान नहीं है। शायद यही कारण है कि किसी भी रक्षा सौदे के आलोचक इस शब्द को खूब भुनाते हैं!
बचपन में हम पढ़ा करते थे कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। जाहिर है कि ऐसा देश लड़ाकू विमान या युद्ध सामग्री इतनी आसानी से नहीं बना सकता। इंजीनियरिंग और अनुसंधान के हिसाब से रक्षा उपकरण बनाना एक विशाल चुनौती होती है। इसका ज्वलंत उदाहरण हमारा चींटी की तरह घिसटता हुआ रक्षा अनुंसधान, डीआरडीओ है, जिसमें चल रही परियोजनाएं अक्सर आलोचना का विषय रही हैं। रक्षा उपकरणों के बारे में वाकपटुता दिखाना भले ही आसान हो, पर उनका निर्माण करना एक टेढ़ी खीर है। निश्चित तौर पर भारत को इस स्तर पर पहुंचने में बहुत लंबा रास्ता तय करना है। इसी के मद्देनजर हमारे रक्षा मंत्रालय ने रक्षा खरीदारी के अनुबंधों में एक ऐसा प्रावधान रखा है, जिसके तहत कांट्रैक्ट जीतने वाली किसी भी विदेशी कंपनी के लिए ये अनिवार्य है कि वो कांट्रैक्ट मूल्य का एक निश्चित प्रतिशत वापस भारत की उन इकाइयों में निवेश करे जो रक्षा उपकरण, रक्षा अनुसंधान, सिक्योरिटी आदि क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं। ताकि हमारी अपनी इकाइयां आगे जा कर रक्षा उपकरण बनाने में अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। साथ ही बाहर जा रही बहुमूल्य विदेशी मुद्रा आंशिक रूप से देश में वापस आ सके। इससे हमारी अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलेगा और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। इन इकाइयों को इंडियन आॅफसेट पार्टनर्स का नाम दिया जाता है। इंडियन आॅफसेट पार्टनर्स द्वारा बनाई गई वस्तुएं जरूरी नहीं कि उसी अनुबंध में लगाई जाएं जिसका कि ये हिस्सा हैं। यानी ये जरूरी नहीं कि डासो एविएशन के रफाल विमानों के आॅफसेट पार्टनर जो उपकरण बनाएंगे उसका इस्तेमाल रफाल विमानों में ही हो। उनका प्रयोग हमारे देश में या विदेशों में कहीं भी हो सकता है। आॅफसेट के तहत बन रही वस्तुओं के लिए एक अलग से अनुबंध साइन किया जाता है जिसके लिए अलग वारंटी बांड होता है। अगर कंपनी उस अनुबंध का पूर्ण रूप से पालन नहीं कर पाएगी तो उसे जुर्माना देना होगा।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए देखते हैं कि रिलायंस का चुनाव नियमानुसार हुआ है या नहीं। बताया जा रहा है कि इस अनुबंध में से पचास फीसदी राशि आॅफसेट के लिए सुनिश्चित की गई है। यानी डासो एविएशन को अनुबंधित राशि (कांट्रैक्ट मूल्य) का आधा हिस्सा भारत में निवेश करना होगा। रक्षा खरीदारी के नियम निर्धारित करने वाली पुस्तिका (डीपीपी) के हिसाब से सौदा जीतने वाली कंपनी को अपने इंडियन आॅफसेट पार्टनर्स चुनने का अधिकार होता है। प्राय: कंपनियां उन हिन्दुस्तानी इकाइयों को चुनती हैं जो उन्हें इस बात का भरोसा दिला सकें कि वो किसी प्रकार का रक्षा उपकरण बना पाएंगी। रिलायंस उन अनेक कंपनियों में से सिर्फ एक है जिसे डासो एविएशन ने अपने इंडियन आॅफसेट पार्टनर्स के रूप में चुना है। माना जा रहा है कि ऐसी करीब 70 और कंपनियां हैं जिन्हें डासो एविएशन ने चुना है। और डासो एविएशन रिलायंस पर भरोसा करे या न करे, ये इन दो कंपनियों के बीच का मामला है। सरकार को बस इतना देखना है कि डासो एविएशन अनुबंध की पचास फीसदी राशि भारत की रक्षा इकाइयों में निवेश करे। डासो एविएशन ने रिलायंस में ‘क्षमता’ देखी हो या ‘अनुभव’ ये उसका जिम्मा है। और अगर इस जिम्मे को न निभा पाया तो वॉरंटी बांड के रूप में हर्जाना भी उसे ही देना होगा न कि वायुसेना या सरकार को। सरकार का मकसद बस इतना है कि हर हाल में देश से बाहर गई मुद्रा का एक निश्चित हिस्सा आॅफसेट के तहत देश में ही आए। अगर चुने हुए इंडियन आॅफसेट पार्टनर्स रक्षा उपकरण बना पाए तो उन्हें आगे जाकर अनुभव प्राप्त होगा और अगर खुदा न खास्ता न भी बना पाए तो डासो एविएशन हर्जाना भरेगी। इसमें चित्त भी देश की होगी और पट भी। एक मजेदार बात यह भी है कि आज पिपाव शिपयार्ड रिलायंस में समाहित हो चुका है। यह वही शिपयार्ड है जिसे कुछ सालों पहले कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान बिना किसी पूर्व अनुभव के नौसेना के लिए पांच युद्धपोत बनाने का अनुबंध मिला था। चूंकि यह शिपयार्ड अब रिलायंस का हिस्सा है, इसलिए तकनीकी तौर पर रिलायंस के पास रक्षा उपकरण बनाने का अनुभव है। इसलिए इस बात का ढोल पीटना कि कंपनी ने फलां-फलां को क्यों चुना, अप्रासंगिक है।
हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड जैसे एक सरकारी उद्यम को हटाकर रफाल रिलायंस के साथ मिलकर हिंदुस्तान में विमान बनाएगी।
इस बात में कोई तथ्य नहीं है। इस सौदे के दौरान सारे विमान फ्रांस में बन रहे हैं। रिलायंस डासो एविएशन के आॅफसेट पार्टनरों में से एक है। ये कंपनी रफाल विमान नहीं बनाएगी बल्कि डासो एविएशन द्वारा बनाए जा रहे एक अन्य विमान के कुछ हिस्से बनाएगी। गौरतलब यह है कि डासो एविएशन हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड को भी अपना आॅफसेट पार्टनर बनाए बैठी है। हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड से कुछ छीना नहीं गया है क्योंकि उनके साथ मिलकर भारत में विमान बनाने का सौदा साइन ही नहीं हो पाया था।
यूरोफाइटर कंपनी ने इंटरगवर्नमेंटल एग्रीमेंट के तहत अपने विमानों को रफाल से कम दाम में बेचने का प्रस्ताव रखा था?
हुजूर आते-आते बहुत देर कर दी। जब बोलियां लगी थीं तो यूरो के विमान रफाल से महंगे थे। जाहिर है सरकार ने इंटरगवर्नमेंटल एग्रीमेंट के तहत उन्हीं विमानों को सीमित संख्या में खरीदने का निर्णय लिया। वैसे ऐसा भी माना जाता है कि यूरो ने भारत को पूरे 126 विमानों पर छूट देने की बात कही थी न कि सिर्फ 36 को खरीदने पर।
रक्षा अनुबंधों में पक्षपात होगा या नहीं- ये किसी देश के राजनीतिक चरित्र पर निर्भर करता है। आप कोई भी नियम बनाइए, चाहने वाले कहीं न कहीं पक्षपात का रास्ता जरूर खोज लेंगे। क्या इस अप्रासंगिक आलोचना को लेकर विमानों की खरीदारी को पटरी से उतार देना सही होगा? विगत में ऐसी कई आलोचनाएं हुर्इं जिनके कारण देश की सुरक्षा तैयारी पर सीधा असर पड़ा था। भारतीय नौसेना के ‘एमसीएमवी प्रोजेक्ट’ के तहत कोरिया से खरीदे जा रहे माइनस्वीपर विमान कुछ ऐसी ही आलोचनाओं का शिकार हुए थे। वह परियोजना इस कदर फिसली कि आज तक नहीं संभल पाई पर हम अपने इतिहास से शिक्षा लेने में हमेशा से कतराते रहे हैं। जाहिर है इस बार भी वही कहानी नजर आ रही है और भारत के नभ में इन सक्षम लड़ाकू विमानों की गूंज सुनाई पड़ने से पहले राजनीति के गलियारों में आलोचना की एक बेमेल चिंघाड़ सुनाई दे रही है। डेढ़ दशक तक घिसटने के बाद जब वायुसेना के हाथ विमान लगने की बारी आई तो शुरू हो गया आलोचना- प्रत्यालोचना का दौर। आखिरकार हम प्रजातंत्र जो हैं… और इन सबके बीच, हमेशा की तरह पिसेंगी सशस्त्र सेनाएं।
दधीचि की हड्डी से बने वज्र को बनाने वाले को कितने का मुनाफा हुआ या इंद्र द्वारा कर्ण से लिए गए कवच कुंडल का मूल्य उसको दी हुई एकध्वनि से ज्यादा था या कम? अर्जुन के गांडीव पर पांडवों को कितनी छूट मिली थी! अगर हमारे पूर्वज इस पचड़े में फंस जाते तो फिर असुरों का संहार कैसे होता। सेनाएं मैदान कैसे संभालतीं? सच की विजय कैसे होती!
वक्त आ गया है कि जल्द से जल्द ही वायुसेना में इन विमानों को शामिल किया जाए और हम अपनी सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान दें। बदलते समीकरण में उत्तर और पश्चिम दोनों से खतरा बढ़ता जा रहा है। हमें 126 विमानों की आवश्यकता थी और हम 36 पर ही अटक गए हैं। भारतीय वायुसेना के पायलट दुनिया भर में अपने युद्ध कौशल के लिए मशहूर हैं। विमानों की खरीदारी में राजनीतिक कारणों से हुई देरी कहीं हमारे इन जांबाजों को आकाश में एक निरीह जटायु न बना दें और अगर ऐसा हुआ तो देश, आॅफसेट नहीं बल्कि सुरक्षा का हिसाब मांगेगा।
डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर के दायरे में वायुसेना द्वारा किए गए 17 साल के अथक परिश्रम के बाद आज यह प्रश्न क्षीण हो चुका है कि ‘एक रफाल विमान की कीमत कितनी है’। अगर कुछ मायने रखता है तो सिर्फ यह शाश्वत सत्य कि ‘आजादी की कीमत नहीं होती।’ 

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