न्यूज फ्लैश

प्रगतिशील और समरस बहुजन संस्कृति

सत्यदेव त्रिपाठी

पैत्तृक घर का एक हिस्सा नया बनवाने के सिलसिले में पिछले दिनों गांव (सम्मौपुर, आजमगढ़) में था। दो मिस्त्री (राजगीर) और पांच मजदूर रोज काम कर रहे थे। एक मिस्त्री गांव के राजभर हैं- मिरतू और दूसरे हैं बगल के गांव (इरनी) के हरिजन छट्ठू। एक दिन छट्ठू नहीं आए। पता लगा कि अपने बड़े बेटे को लेकर अस्पताल गए हैं जौनपुर। दूसरे दिन यह कहते हुए काम पर आ गए कि डॉक्टर ने जवाब दे दिया है, क्योंकि उसके शरीर में खून बिल्कुल नहीं है और 6-7 बोतल खून वे ला नहीं सकते। तीसरे दिन बेटा चल बसा और छट्ठू क्रिया-कर्म में लग गए।

मैंने समझा, अब तो 13-15 दिनों के लिए गए छट्ठू। लेकिन बस पांच दिन बाद जब मेरे यहां सिलाप (स्लैब) लगना था, मुंडे सिर छट्ठू काम पर आ गए। बताया- ‘बाबा तिरात्री (त्रिरात्रि) कर दिया’। त्रिरात्रि का विधान समूची हिन्दू संस्कृति में है- अत्यावश्यक और अटाल्य होने पर तेरह के बदले तीन दिन में भी काम निपटाया जा सकता है। हमारी संस्कृति ने सारे विधान में ऐसे आपात्कालीन विकल्प दिए हैं- राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित व प्रसिद्ध सत्यनारायण व्रतकथा में ‘शालिचूर्ण न हो, तो शक्कर या गुड़ (अभावे शालिचूर्णं च शर्करा वा गुडं तथा) तो मुहावरा ही बन गया है। मेरे पालक काका 1968 में ऐन कार्तिक में चल बसे थे और मेरा हाईस्कूल का इम्तहान भी था, तो पुरोहित और पूरे गांव ने त्रिरात्रि करने की सलाह दी थी। बात की तस्दीक के लिए प्रमाण दिया था- ‘तेरह कातिक, तीन असाढ़- जौ चूके, तौ बण्टाढार’। यानी कार्तिक में रबी की फसल की बुवाई में तेरह दिन और आषाढ़ में खरीफ की फसल की बुवाई में तीन दिन भी किसान का गैर हाजिर हो जाना परिवार के पूरे साल के जीवन को बर्बाद कर देता है। ये अलग बात है कि मैंने सबको ‘छोटे मुंह बड़ी बात’ जैसा जवाब दे दिया था- ‘कातिक तो अगले साल फिर आएगा, काका अब नहीं आएंगे’ और त्रिरात्रि नहीं किया था।

लेकिन छट्ठू की अपनी हालत… वे त्रिरात्रि करके गढू मन से आ गए कि अब बहू और तीन बच्चों की जिम्मेदारी उनके सर। सुनते ही मेरे मुंह से निकल गया- लेकिन उसकी स्त्री तो रहेगी नहीं, चली जाएगी शादी करके किसी के साथ। शायद बच्चे भी चले जाएं और मेरी बात सुनकर सभी अवाक… कल पति मरा, आज मैं (पढ़ा-लिखा बुजुर्ग आदमी) ऐसा कह दे रहा। थोड़े अंतराल के बाद एक ने कहा- अब बाबा, ये तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन मैंने जोर दिया- समय बताएगा! अरे वो तो रोज-रोज बता रहा है… आप लोग बताइए, है कोई औरत हमारे बहुजन समाज में पचास-पंचावन साल के उम्र तक की, जो पति के मरने या पति द्वारा छोड़ दिए जाने के बाद विधवा या ‘छूटी हुई’ होकर अकेले रह रही हो? आपने झिनकू भइया (राजभर) की पत्नी को तो देखा है, जो उनके टीबी से मर जाने के बाद आज से चालीस साल पहले दस-बारह बच्चों की मां होने के बावजूद अपने समधी के साथ चली गई थी।

अपने मुहल्ले का ही यह असम्भव-सा उदाहरण सुनकर हमारे दूसरे मिस्त्री मिरतू मुस्कराए भी और शरमाए भी। मुझे सहसा याद आया- अरे, मिरतू ने तो पत्नी के मरने के बाद तीन बच्चों की मां से शादी की है- प्रेम-विवाह, जो आयोजित रूप से घर-बिरादरी ने मिलकर किया। अब वे पहली पत्नी के अपने तीन और दूसरी पत्नी के पहले वाले पति से हुए तीन बच्चों के साथ मजे से रह रहे हैं। सुना है कि इस पत्नी से भी दो बच्चे हैं- कुल आठ। लेकिन इस संख्या पर नहीं जाना अभी, क्योंकि बात संस्कृति की है, बढ़ती आबादी की नहीं। और संस्कृति की नजाकत यह कि जिन्हें हम पिछड़ा और निम्न वर्ग का कहते हैं, उसी श्रेणी के मिरतू के साथ उनकी औरत के साथ वहां से आया बेटा हमारे यहां काम कर रहा है। दोनों के सलीके को देखते हुए कौन कहेगा कि यह इनका बेटा नहीं? (इस मुकाम पर अशोक कुमार व पर्ल पद्मसी तथा राकेश रोशन व बिंदिया गोस्वामी अभिनीत फिल्म ‘खट्टा-मीठा’ मुझे बेतरह याद आ रही, जिसमें दोनों के मिलाकर सात बच्चे थे और शुरुआती झगड़े-धमाल के बाद क्या खूब रहे थे!) मिरतू-परिवार जैसी समरसता आज कहां मिलेगी? अपने देश में ही नहीं, विदेशों में भी नहीं मिलेगी, जहां मरने के बाद तो क्या, जीतेजी तलाक और पुनर्विवाह का खुला चलन है।

और मेरे मन में इस विषयक संस्कृति की यादों के घोड़े सरपट दौड़ने लगे… पिछली सदी के आठवें दशक के उत्तरार्ध में जिन दिनों मैं मुम्बई में बी.ए.-एम.ए. कर रहा था, अपनी पसन्द से शादी यानी प्रेम-विवाह की आवश्यकता और वैधता को लेकर चर्चा जोरों पर थी। प्रेम-विवाह तो पारम्परिक आग्रहों व मां-पिता के भावनात्मक दोहनों के अलावा निर्विवाद रूप से वैचारिक मान्यता के साथ नई पीढ़ी द्वारा थोड़ी-मोड़ी पहल भी पा रहा था, जो अब सुदूर गांवों तक में रिवाज न सही, आचार रूप में स्वीकृति भी पा चुका है। लेकिन तलाक और एक से अधिक विवाह को लेकर पहलकदमी तो क्या, वैचारिक स्तर पर भी अड़चनें बहुत थीं, जिनमें सात जन्मों के तथाकथित संबंध तो खारिज हो रहे थे, पर संस्कारशील मन फिर भी मानने को तैयार न हो रहे थे- औरतें तो एकदम नहीं और यह बहुत पढ़ी-लिखी तमाम औरतों की दुखती रग आज भी है। सबसे बड़ी और नितांत व्यावहारिक अड़चन बच्चों को लेकर थी कि मां-बाप के अलग हो जाने पर उनका क्या होगा?

इसी को लेकर मन्नू भंडारी ने उसी दौर में एक श्रेष्ठ उपन्यास लिखा था- ‘आपका बंटी’। और उसमें असली मां और नए पिता तथा असली पिता और नई मां के साथ बच्चे बंटी के रहने के दोनों रूपों के शुभ-अशुभ पक्षों पर भारतीय संवेदनशीलता की जानिब से एक मुकम्मल विमर्श दरपेश हुआ था। विदेशों के एकाधिक तलाक व पुनर्विवाह में जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता का तत्त्व है, वह उन दिनों मन को बहुत लुभा रहा था- आज तो अपने पीछे चलाने लगा है। तब भी वह सोच को काफी हद तक सहमत कर रहा था, आज तो कर चुका है। वहां की व्यवस्था के मुताबिक बच्चे को पुराने (असली) माता-पिता भी खर्च देते हैं और नए वाले भी। दोनों मिलाकर दुगुना-तिगुना खर्च पाने वाले बच्चों का अपने दोस्तों के सामने इतराना- इतना पैसा मेरे एक्स फादर/मदर और इतना एक्स-एक्स फादर/मदर ने भेजा है। ये कहानियां और समाचार हमें आज भी सुनने-पढ़ने को मिलते हैं। लेकिन मन्नूजी ने तभी इस वृत्ति को भारतीय संवेदनशीलता की जानिब से अपाच्य ठहराया था, जो आज भी सुपाच्य तो नहीं हो पा रही है, पर अपवाद स्वरूप कहीं-कहीं खायी अवश्य जा रही है। इसमें बच्चों को अलग-थलग करके पैसे देकर फर्ज निभा देने के संतोष व शान की वृत्ति भारतीय संस्कारशीलता के नितांत विरुद्ध है, मानवीयता की समाधि पर खड़ी है।
इन सबके बरक्स उक्त फिल्म ‘खट्टा-मीठा’ का विकल्प आदर्श मानवता का मानक रचता है और मिरतू का उसे साकार कर देना कला के सपने को पूरा कर देने और आदर्श को वास्तविकता की जमीन पर उतार देने जैसा है। और इसमें मिरतू न अकेले हैं, न नए व अनोखे। यह उस बहुजन वर्ग की एक मुकम्मल संस्कृति हैं, जिसका एक रूप यह भी है कि मां के साथ बच्चे चले जाते थे। बेटियों की तो शादी कर दी जाती थी, जिसमें वास्तविक पिता भी ऐच्छिक रूप से मदद करता रहा है, पर बेटे बड़े होने पर असली बाप के पास आ जाते और पैत्तृक हक पाते। इन्हें ‘तरायन’ कहा जाता था, जिसके उदाहरण आज भी जिन्दा हैं। मेरे गांव के इसी समाज का शंकर तो अपने भाई की बेटी को भी बड़ी होने पर उठा लाया है। लेकिन इस पूरी व्यवस्था (सिस्टम) को सवर्ण समाज के तथाकथित शिष्ट वर्ग द्वारा हिकारत से देखा जाता है। लेकिन समाज के अग्रणी वर्ग के इस रवैये के बावजूद इसी के बीच से एक समानांतर संस्कृति के रूप में यह विकसित व फलित हुई है। इसके समक्ष गौर करें, तो सवर्ण समाज ने विधवाओं की एक पीढ़ी खड़ी कर दी, जो पुनर्विवाह न करने देने की वर्जना और इसके पीछे छिपी सामंतवादी पुरुष वृत्ति का खामियाजा आज भी भुगत रही है।
इस प्रकार सहज और मुक्त भाव से बनी बहुजन समाज की यह संस्कृति स्वच्छन्द और भौतिकवादी पश्चिमी समाज और अपने यहां के मुख्य धारा के शिष्ट समाज के मुकाबले कहीं अधिक प्रगतिशील और समरस भाव से मानवीय है, जो तिरस्कार नहीं, स्वीकर और स्वागत योग्य है। पर अपने बच्चों को न पाल पाने वाला हमारा प्रगत समाज क्या इतना उदार और सहनशील रह गया है कि ऐसी पारिवारिकता को संभाल-संवार सके? बहुजन समाज की तरफ से महादेवीजी की पंक्तियों के जरिये पूछने का मन होता है-
मेरी लघुता पर आती,
जिस दिव्य लोक को व्रीड़ा (शर्म),
उनके प्राणों से पूछो, क्या पाल सकेंगे पीड़ा? 

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