जान देंगे, जमीन नहीं देंगे

सितंबर 2012 में बनी झारखंड सरकार की ऊर्जा नीति अक्टूबर 2016 में बदल दी गई. इसके प्रावधानों में संशोधन किए गए और रघुवर दास कैबिनेट ने उस पर मुहर लगा दी. इससे पहले सरकार ने कोई सर्वे नहीं कराया और न किसी विशेषज्ञ समिति ने उसे ऐसा करने की सलाह दी. संशोधन के महज पंद्रह दिनों बाद झारखंड सरकार और अडाणी समूह के बीच सेकेंड लेवल का एमओयू साइन किया गया.

झारखंड राज्य गठन का आंदोलन शोषण एवं दमन के खिलाफ सांस्कृतिक अस्मिता और राजनीतिक स्वायत्त्तता का आंदोलन था. लेकिन हुआ उलटा. सांस्कृतिक अस्मिता खत्म कर राजनीतिक स्वायत्त्तता गिरवीं रखते हुए सरकार राज्य के प्राकृतिक संसाधन बड़े इजारेदारों के हाथों बेचने पर उतारू है. लिहाजा, विस्थापन और माटी से बेदखल होते रहना यहां के मूल निवासियों की नियति बन गई है. उनके खिलाफ बल प्रयोग कर उन्हें नक्सली और देशद्रोही करार दिया जा रहा है. जनता द्वारा चुनी हुई सरकार अडाणी के पीछे खड़ी है. झारखंड के गोड्डा में अडाणी का फरमान है कि जमीन नहीं दोगे, तो जमीन में गाड़ देंगे. राज्य सरकार ने विशेष आर्थिक क्षेत्रके रूप में अडानी की 14,000 करोड़ रुपये की गोड्डा पॉवर प्लांट परियोजना को मंजूरी दी है. इसमें उत्पादित होने वाली बिजली बांग्लादेश को दी जाएगी, जिसके लिए कंपनी ने समझौते पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं. परियोजना के तहत 800-800 मेगावाट की दो सुपर क्रिटिकल इकाइयां स्थापित की जाएंगी. 2022 के आखिर तक परियोजना पूरी हो जाएगी. परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति (क्लीयरेंस) मिल गई है.

सुनीता रानी मिंज कहती हैं कि निहत्थी जनता खुद को लड़ते हुए अकेला पाती है. हम जब लोकतंत्र के महापर्व में भागीदार बनने जा रहे हैं, तो ऐसे में संगठित ताकत का इस्तेमाल वोट के रूप में करें. इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड स्टेबिलिटी के राजेंद्र रवि कहते हैं कि आज पूरी दुनिया में कोल खनन और कोयले से पैदा होने वाली ऊर्जा का विरोध हो रहा है, कई देश इसे प्रतिबंधित कर रहे हैं, क्योंकि इससे पर्यावरणीय उष्मा बढ़ती है और जलवायु परिवर्तन की समस्या पैदा होती है. ऑस्ट्रेलिया कंजर्वेशन ने अडानी के कोल खनन को चुनौती दी है, लेकिन सरकार ने उनके लिए रास्ते खोल रखे हैं. अडानी पॉवर (झारखंड) लिमिटेड ने झारखंड में 425 हेक्टेयर से अधिक बड़े क्षेत्र में विशेष सेक्टर का सेज स्थापित करने के लिए मंजूरी मांगी थी, जो गोड्डा जिले के मोतिया, माली, गायघाट और उसके आसपास के गांवों में प्रस्तावित है. वाणिज्य सचिव की अध्यक्षता वाले बोर्ड ने कंपनी को उसके पास उपलब्ध 222.68 हेक्टेयर भूमि के लिए औपचारिक और शेष 202.32 हेक्टेयर भूमि के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दी है.

सितंबर 2012 में बनी झारखंड सरकार की ऊर्जा नीति अक्टूबर 2016 में बदल दी गई. इसके प्रावधानों में संशोधन किए गए और रघुवर दास कैबिनेट ने उस पर मुहर लगा दी. इससे पहले सरकार ने कोई सर्वे नहीं कराया और न किसी विशेषज्ञ समिति ने उसे ऐसा करने की सलाह दी. संशोधन के महज पंद्रह दिनों बाद झारखंड सरकार और अडाणी समूह के बीच सेकेंड लेवल का एमओयू साइन किया गया. अगर ऊर्जा नीति में संशोधन न किया जाता, तो अडाणी पॉवर(झारखंड) लिमिटेड को गोड्डा प्लांट में उत्पादित 400 मेगावाट बिजली (1600 मेगावाट का 25 प्रतिशत) झारखंड को देनी पड़ती. 2012 की ऊर्जा नीति के मुताबिक, पॉवर कंपनियों को कुल उत्पादन के 25 प्रतिशत हिस्से का सिर्फ 12 प्रतिशत वेरियेबल कॉस्ट पर देना होता है, शेष 13 प्रतिशत बिजली की कीमत फिक्स्ड और वेरियेबल, दोनों खर्चे ध्यान में रखकर तय की जाती है. अब पॉवर कंपनियां समूची 25 प्रतिशत बिजली फिक्स्ड और वेरियेबल, दोनों खर्चों के आधार पर तय कीमत पर दे सकती हैं. इससे सरकार को बिजली खरीद के लिए ज्यादा भुगतान करना होगा. झारखंड के महालेखाकार भी ऊर्जा नीति में संशोधन को घाटे का सौदा बताते हैं. राज्य सरकार को हर साल करीब 296 करोड़ रुपये और अगले 25 सालों में करीब 7410 करोड़ रुपये का घाटा हो सकता है.

अडाणी समूह के साथ एमओयू साइन करने से पहले सरकार ने गोड्डा की जमीन की कीमत तय करने के लिए एक कमेटी बना दी थी. 2014 में तत्कालीन उपायुक्त ने जिस जमीन की कीमत प्रति एकड़ करीब 40 लाख रुपये तय की थी, कमेटी ने उसकी कीमत घटाकर करीब सवा तीन लाख रुपये प्रति एकड़ कर दी. राज्य में जमीन अधिग्रहण की स्थिति में बाजार भाव का चार गुना मुआवजा देने का प्रावधान है. पुरानी कीमतों के मुताबिक प्रति एकड़ करीब डेढ़ करोड़ रुपये का मुआवजा मिलता था, लेकिन नई कीमतों के मुताबिक मुआवजे की रकम करीब 13 लाख रुपये प्रति एकड़ हो गई है. विपक्ष के हंगामे के बाद सरकार ने तत्कालीन मुख्य सचिव राजीव गौवा की अध्यक्षता में नई कमेटी बनाकर उसे कीमत निर्धारण का जिम्मा सौंपा. कमेटी ने नई कीमतें तय कीं, जो पहले से अधिक थीं, लेकिन उसने जमीनों का वर्गीकरण कर दिया. अब जमीन की कीमत प्रति एकड़ करीब छह लाख रुपये न्यूनतम और 13 लाख रुपये अधिकतम हो गई. मतलब यह कि पहले जिस रैयत को डेढ़ करोड़ रुपये का मुआवजा मिलता, उसे अब अधिकतम 52 लाख रुपये का मुआवजा मिलेगा. अडाणी समूह के खिलाफ लड़ाई 2016 में गोड्डा से सटे माली और उसके आसपास के नौ अन्य गांवों में शुरू हुई थी. यही वह समय था, जब अडाणी समूह की सहायक कंपनी अडाणी पॉवर (झारखंड) लिमिटेड ने झारखंड सरकार से कहा कि वह इन गांवों में 2,000 एकड़ भूमि (निजी खेत और आम जमीन) पर कोयले से चलने वाले प्लांट का निर्माण करना चाहती है. जन संसाधन पीठ और इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड स्टेबिलिटी ने अपनी रिपोर्ट में जिला भू-अर्जन कार्यालय गोड्डा के हवाले से कहा है कि इस संंयंत्र के लिए प्रस्तावित भूमि का रकबा 2385 एकड़ है, जिसमें 2120.28 एकड़ भूमि रैयती है और 264 एकड़ सरकारी. यह भूमि मोतिया, पटवा, गंगटा, नयावाद, सोनाडीहा, रेगनिया, वलियाकिता, पेटवी, गायघाट और मालीगांव की है. यह रिपोर्ट राधेश्याम मंगोलपुरी, वसंत हेतमसरिया, राजेंद्र रवि, मधुरेश कुमार एवं निशांत सिंह ने तैयार की है.

साल 2016 से परियोजना का विरोध कर रहे चिंतामणि साहू बताते हैं कि कंपनी की सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (सोशल इम्पैक्ट एसेसमेंट) रिपोर्ट में कई तथ्यात्मक एवं वैधानिक त्रुटियां हैं, जैसे प्रभावित गांवों में तकनीकी रूप से कुशल एवं शिक्षित लोग न होना, शून्य विस्थापन, प्रभावित ग्रामीणों का धर्म हिंदू बताना आदि. बटाईदारों एवं खेतिहर मजदूरों पर होने वाले प्रभाव का भी कोई जिक्र नहीं है और न वैकल्पिक भूमि की बात कही गई है. परियोजना से सृजित होने वाली नौकरियों की संख्या रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं है. सरकार ने चार गांवों में लगभग 500 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की है, जिसमें से 100 एकड़ भूमि का अधिग्रहण प्रभावित परिवारों की सहमति के बिना यानी जबरन किया गया. कंपनी ने पुलिस के सहयोग से माली गांव के मैनेजर हेम्ब्रम सहित अन्य पांच आदिवासी परिवारों की 15 एकड़ भूमि में खड़ी फसलों, पेड़-पौधों, श्मशान घाट और तालाब को बर्बाद कर दिया. क्षेत्र के अधिकांश आदिवासी और गैर आदिवासी परिवार शुरू से परियोजना का विरोध कर रहे हैं. 2016 और 2017 में सामाजिक एवं पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन के लिए जन सुनवाई आयोजित की गई थी. कई भू-स्वामियों, जो परियोजना के विरोध में थे, को अडानी के अधिकारियों और प्रशासन ने जन सुनवाई में हिस्सा नहीं लेने दिया. प्रभावित ग्रामीण दावा करते हैं कि गैर प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को सुनवाई में बैठाया गया. ऐसी ही एक जन सुनवाई के बाद प्रभावित ग्रामीणों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई. भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के अनुसार, निजी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण करने के लिए कम से कम 80 प्रतिशत प्रभावित परिवारों की सहमति एवं ग्राम सभा की अनुमति जरूरी है. सभी दस गांवों में भूमि अधिग्रहण से 1,000 से अधिक परिवार विस्थापित हो जाएंगे और उनकी आजीविका एवं रोजगार पर विपरीत असर पड़ेगा. कंपनी ने पॉवर प्लांट के लिए भूमि की घेराबंदी शुरू कर दी है. इसमें उन किसानों की भूमि भी शामिल है, जिन्होंने कंपनी या सरकार से कोई मुआवजा नहीं लिया है.

कवियत्री जेसिंता केरकेट्टा कहती हैं कि आदिवासी परिवारों के लिए भूमि उनकी संस्कृति, परंपराओं एवं अस्तित्व से जुड़ी है, जिसे वे गंवाना नहीं चाहते. वे चाहते हैं कि समाज के जानकार और उनसे हमदर्दी रखने वाले लोग उनकी सहायता करने, रास्ता दिखाने के लिए आगे आएं, ताकि वे और उनकी पीढिय़ां पुरखों की विरासत से बेदखल होने से बच जाएं. सवाल सिर्फ भूमि का नहीं, पानी का भी है. 600 एकड़ भूमि पर प्लांट बनाने का काम शुरू हो गया है. घेराबंदी वाले इलाके में 100 से भी अधिक डीप बोरिंग की गई है. ग्रामीणों का आरोप है कि इससे इलाके का जलस्तर प्रभावित हो रहा है. अडानी की गोड्डा परियोजना को चिर नदी से हर साल तीन करोड़ 60 लाख क्यूबिक मीटर पानी लेने की अनुमति दी गई है. झारखंड सरकार कोयले की ढुलाई के उद्देश्य से रेल लाइन बिछाने के लिए भी भूमि अधिग्रहण कर रही है.

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