पद्मावती- इतिहास, मिथक और विवाद

ओपिनियन पोस्ट
Tue, 02 Jan, 2018 15:50 PM IST

उमेश चतुर्वेदी।

संजय लीला भंसाली निर्देशित फिल्म पद्मावती को लेकर जारी विवाद में बहस एक जगह आकर टिक गई है कि पद्मावती असल में थी भी या नहीं। तथ्यों के आलोक में इतिहास को परखने-लिखने वाले कथित प्रगतिवादी धारा के इतिहासकार राम और कृष्ण की लोक सम्मत और लोकश्रुत कथाओं को मिथक के नाम पर जिस तरह नकारते रहे हैं, चित्तौड़गढ़ की रानी पद्मिनी की कहानी और उसके जौहर को भी लोक गाथाओं के नाम पर नकारने की कोशिश कर रहे हैं। लोक गाथाओं की परंपराएं श्रुति और स्मृति से ही चलती रही हैं। इस परंपरा में बेशक मुखामुखी कुछ अतिरंजनाएं जुड़ती जाती हैं। हर अगला वाचक अपने श्रोता को कुछ अतिरंजित मोड़ में कथा को सुनाता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कथा का आधार ही नहीं हो। मेवाड़ की लोक गाथाओं में चित्तौड़गढ़ के राजा रतन सिंह की अतीव सुंदरी पत्नी पद्मिनी के जौहर की कहानी विख्यात है। इसी कथा को आधार बनाकर पंडित श्याम नारायण पांडेय ने जौहर नामक रचना की है। वीर रस से परिपूर्ण इस रचना में उन्होंने पद्मिनी के जौहर और अलाउद्दीन खिलजी को यूं याद किया है-

बोल उठा उन्मादी फिर,
मुझको थोड़ा सा पानी दो
कहां पद्मिनी, कहां पद्मिनी
मुझे पद्मिनी रानी दो।

इतिहासकार और पुरातत्वविद् विवेक भटनागर ने राजस्थान के इतिहास पर काफी काम किया है। वे इस तथ्य से ही इनकार करते हैं कि अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ या मेवाड़ पर इसलिए हमला नहीं किया था कि उसे पद्मिनी रानी चाहिए थी। विवेक भटनागर का कहना है, ‘अलाउद्दीन खिलजी इतना मूर्ख नहीं था कि वह सिर्फ पद्मिनी के लिए मेवाड़ पर हमला करता। जिन दिनों उसने मेवाड़ पर हमला किया, उस आठ महीने के दौर में मंगोल तातार खान दिल्ली के नजदीक तक हमला करते पहुंच गया था। ऐसे में कोई मूर्ख शासक ही होगा जो सल्तनत की राजधानी से इतने दिन तक दूर रहता।’ तो आखिर सवाल यह है कि मेवाड़ पर खिलजी के हमले की असल वजह क्या थी? विवेक भटनागर बताते हैं, ‘उन दिनों मुद्रा के लिए चांदी का इस्तेमाल होता था। चांदी का उत्पादन या तो चीन से होता था या फिर भारत में मेवाड़ से। चूंकि 1290 के आसपास मंगोलों का हमला शुरू हो गया था, इसलिए चीन से चांदी की आवक घट गई थी। भारत में चांदी का उत्पादन मेवाड़ में ही होता था। यही वजह है कि ईसा पूर्व दूसरी सदी में मौर्य साम्राज्य ने चित्तौड़गढ़ और ईसा पूर्व तीसरी सदी में कुंभलगढ़ में किले की स्थापना की ताकि मेवाड़ पर उसका कब्जा बना रहे और राजमुद्रा के लिए चांदी की अबाध आपूर्ति बनी रहे।’

विवेक भटनागर तर्क देते हैं कि मंगोल हमले के बाद चीन से चांदी की कम आवक के चलते तब के हिंदुस्तान में चांदी की बजाय तांबे के सिक्के भी चलाने पड़े थे। खिलजी के बाद आए तुगलक वंश के शासन में ऐसा हुआ। आज भी मेवाड़ स्थित हिंदुस्तान जिंक्स लिमिटेड सालाना करीब 112-115 टन चांदी का खनन और परिशोधन करता है। उनका कहना है, ‘अगर पद्मिनी के लिए खिलजी ने हमला किया होता तो उसके साथ भारत आए अमीर खुसरो के दीवानों में इसका वर्णन मिलता। खुसरो ने 12 दीवान लिखे हैं जिनमें से चार खिलजी पर हैं- तारीख-अ-अलाई, खजाइन-उल-फतूह, मसनबी-ए-खिज्र और किरान-उस-सादेन। इनमें सिर्फ खजाइन-उल-फतूह में ही छह-सात लाइनें पद्मिनी पर हैं जिसके मुताबिक वह बहुत खूबसूरत थी। हालांकि मोहम्मद हबीब, आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव और दशरथ शर्मा जैसे इतिहासकारों का मानना है कि अमीर खुसरो ने अपनी खजाइन-उल-फतूह में अलाउद्दीन को सोलोमन बताकर हुदहुद पक्षी और बिल्किस की कहानी के माध्यम से पद्मिनी की ही कहानी की ओर संकेत किया है। इन इतिहासकारों का मानना है कि 25 अगस्त, 1303 को 16,000 रानियों और स्त्रियों के साथ जौहर करके पद्मिनी ने एक तरह से अलाउद्दीन को न सिर्फ चुनौती दी थी बल्कि खुद को होम करके उसे अपमानित भी किया था। इसलिए अलाउद्दीन की ही सलाह या आदेश पर अमीर खुसरो ने अपने किसी भी दीवान में पद्मिनी के इस जौहर का कहीं जिक्र नहीं किया है।’

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इस तथ्य को म्यूजियम एसोसिएशन आॅफ इंडिया के सचिव और दिल्ली के विरासत अनुसंधान एवं अध्ययन संस्थान में कार्यरत प्रोफेसर आनंद वर्धन भी स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि भारत में प्रगतिवादी धारा ने जो सोच विकसित की, उसमें मौखिक साहित्य और गाथाओं के जरिये कही गई ऐतिहासिक कथाओं को नकारने का प्रचलन बढ़ा। इसीलिए पद्मावती के अस्तित्व पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि चित्तौड़गढ़ में सदियों से यह गाथा ऐसे ही नहीं चली आ रही है-
गढ़ तो सब चित्तौड़गढ़,
बाकी सब गढ़ैया
रानी तो बस पद्मिनी रानी
बाकी सब रनैया

आनंद वर्धन का कहना है कि अपने ऐतिहासिक जौहर के कारण पद्मिनी इतिहास का गौरव बन गई। लोकधर्म और आस्था में वह सतीत्व का प्रतिमान बन गई। पद्मिनी लोक मान्यता में आस्था का प्रतीक है। उनका मानना है कि चित्तौड़गढ़ में रानी पद्मिनी की मूर्ति स्थापित करके मेवाड़ ने सिंहल देश की इस राजकुमारी को सम्मान दिया है। आज भी चित्तौड़गढ़ के किले में पद्मिनी के अंत:पुर को दिखाने ले जाया जाता है। आनंद वर्धन अमीर खुसरो के दीवान खजाइन-उल-फतूह में लिखी उस लाइन की तरफ ध्यान दिलाते हैं जिसमें खुसरो लिखते हैं कि लड़ाई जीत गया, युद्ध हार गया। आखिर इस पंक्ति का मतलब क्या है? मतलब यही है कि खिलजी ने भले ही मेवाड़ जीत लिया लेकिन पद्मिनी को वह हासिल नहीं कर पाया। इससे अपमानित खिलजी को एक तरह से हार मिली।

वर्धन कहते हैं, ‘चित्तौड़ में तीन जौहर हुए हैं। उनमें से पद्मिनी का जौहर बहुत ही लोमहर्षक है। उसने भारतीय सतीत्व के प्रति जनमानस में नई आस्था का संचार किया। जौहर का पहला उदाहरण यूनानी हमले के वक्त मिलता है। तब जौहर का मतलब होता था युद्ध में हार के बाद विधर्मी के हाथ पड़ने से बेहतर है कि खुद को होम कर दिया जाए। इसमें रनिवास की राजपूतानियां ही नहीं, वहां रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियां और 12 साल तक की उम्र वाले लड़कों तक के जौहर का विधान था। लड़कों के जौहर का विधान इसलिए था कि कहीं वे विधर्मी के हाथ लग गए तो उनका भी यौन शोषण हो सकता है या फिर उन्हें धर्मांतरित किया जा सकता है।’

भंसाली की फिल्म के बचाव में आए लोगों का तर्क है कि पद्मावती कोई ऐतिहासिक पात्र नहीं है। विवेक भटनागर भी कहते हैं कि सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने जिस पद्मावत की रचना की है उसके ऐतिहासिक तथ्य नहीं हैं। जायसी ने पद्मावत में पद्मिनी को आत्मा, रतन सिंह को शरीर, चित्तौड़ को चेतना और खिलजी को शैतान का प्रतीक बताया है। जायसी ने करीब 1540 ईस्वी में पद्मावत की रचना की। पद्मावत के अंत में जायसी ने लिखा है-
तन चितउर, मन राजा कीन्हा।
हिय सिंघल, बुधि पदमिनि चीन्हा॥
गुरु सुआ जेइ पंथ देखावा।
बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा॥
नागमती यह दुनिया-धंधा।
बाँचा सोइ न एहि चित बंधा॥
राघव दूत सोई सैतानू।
माया अलाउदीन सुलतानू ॥
प्रेम-कथा एहि भाँति बिचारहु।
बूझि लेहु जौ बूझै पारहु॥

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लेकिन आनंद वर्धन इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि जब इजरायल को लेकर होलोकास्ट हुआ तो उसके लिए यहूदियों के मौखिक इतिहास को ही आधार बनाया गया। वैसे भी मौखिक गाथाएं सामूहिक स्मृति का मानसिक दस्तावेज होती हैं। आधुनिक इतिहासकार इस तथ्य को नकार रहे हैं।

वैसे अमीर खुसरो ने प्रसिद्ध दीवान खजाइन-उल-फतूह में लिखा है कि पद्मिनी के लिए अलाउद्दीन ने चित्तौड़गढ़ पर 1302 में हमला किया जो 8 माह चला और 1303 में चित्तौड़ पराजित हो गया। अमीर खुसरो ने अपने दीवान में चित्तौड़ का संपूर्ण शिल्प और सुरक्षा प्राचीर व सैन्य संयोजन के बारे में लिखा है। उसने युद्ध के बाद अलाई सेना द्वारा किए गए जनसंहार का भी वर्णन किया है। उसने लिखा है कि एक दिन में 30 हजार महिलाओं, पुरूषों और बच्चों को तलवार के घाट उतारा गया। चित्तौड़गढ़ पर हमले का प्रमुख कारण उसने रावल रतन सिंह की पत्नी के सौंदर्य के आकर्षण को बताया है। युद्ध में सभी मेवाड़ी वीर मारे गए और रानी के साथ गढ़ की 16,000 स्त्रियों ने जौहर किया। अपने सतीत्व और अस्मिता की रक्षा का विश्व में इससे अनुपम उदाहरण कहीं भी देखने को नहीं मिलता है। आपको बता दें कि खजाइन-उल-फतूह की प्रति लंदन म्यूजियम में ले जाई गई है। उसमें यह विवरण उसके 77वें पृष्ठ पर अंकित है।

इतिहासकार महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा का मानना रहा है कि पद्मिनी या पद्मावती सिंहल देश की राजकन्या नहीं रही है। उन्होंने कुंभलगढ़ का प्रशस्ति लेख प्रस्तुत किया है जिसमें उसे मेवाड़ का स्वामी और समर सिंह का पुत्र लिखा गया है। यद्यपि यह लेख भी रतन सिंह की मृत्यु (1303) के 157 वर्ष बाद 1460 में उत्कीर्ण किया गया था। लेकिन औपन्यासिक शैली में लिखा गया प्रख्यात शोध ग्रंथ ‘अग्नि की लपटें’ में प्रख्यात इतिहासकार तेजपाल सिंह धामा ने उन्हें ऐतिहासिक संदर्भों व जाफना से प्रकाशित ग्रंथों के आधार पर श्रीलंका की राजकुमारी ही सिद्ध किया है। भट्ट काव्यों, ख्यातों और अन्य प्रबंधों के अलावा बाद की रचनाओं में ‘पद्मिनी के महल’ और ‘पद्मिनी के तालाब’ जैसे स्मारकों का भरपूर जिक्र है। ओझा का मानना रहा है कि बिना किसी ठोस ऐतिहासिक प्रमाण के रतन सिंह की रानी को पद्मिनी नाम दे देना अथवा पद्मिनी को हठात उसके साथ जोड़ देना असंगत है। संभव है कि सतीत्व रक्षा के निमित्त जौहर की आदर्श परंपरा की नेत्री चित्तौड़ की रानी को पद्मिनी नाम देकर तथा सती प्रथा संबंधी पुरावृत्त के आधार पर इस कथा को रोचक तथा सम्मत बनाने के लिए रानी की अभिजात जीवनी के साथ अन्यान्य प्रसंग गढ़ लिए हों। लेकिन जानकार सौंदर्य, आदर्श के लोक प्रसिद्ध प्रतीक और काव्य कल्पित पात्र के रूप में पद्मिनी नाम को स्वीकार किया जाना ठीक मानते हैं। उसके रूप, यौवन और जौहर व्रत की कथा मध्य काल से लेकर वर्तमान काल तक चारणों, भाटों, कवियों, धर्म प्रचारकों और लोक गायकों द्वारा विविध रूपों एवं आशयों में व्यक्त हुई है। पद्मिनी संबंधी कथाओं में सर्वत्र यह स्वीकार किया गया है कि अलाउद्दीन पद्मिनी के लिए चित्तौड़गढ़ पर हमला कर सकता था लेकिन किसी विश्वसनीय तथा लिखित प्रमाण के अभाव में ऐतिहासिक दृष्टि से इसे पूर्णतया सत्य मान लेना कठिन है।

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विवेक भटनागर मानते हैं कि पद्मावती फिल्म में जिस तरह राजस्थानी घूमर पेश किया गया है उसे लेकर लोगों की नाराजगी जायज है। विवेक भटनागर के मुताबिक, ‘घूमर राजस्थानी लोकनृत्य है जिसे गणगौर के वक्त ईसर और गौरी यानी शिव और पार्वती के सामने स्त्रियां करती हैं। फिल्म के एक गाने में दिखाया गया है कि पद्मावती भरे दरबार में घूमर करती है। मेवाड़ की परंपरा में ऐसा हो ही नहीं सकता कि रानी भरे दरबार में नृत्य करे। इसलिए लोगों की नाराजगी जायज है।’

आनंद वर्धन तर्क देते हैं कि इतिहास से छेड़छाड़ करना और उस पर फिल्म बनाना बाद की पीढ़ी के सामने दरअसल उसी छेड़छाड़ को ऐतिहासिक तथ्य के तौर पर स्थापित कर देता है। वे निर्माता-निर्देशक के आसिफ की फिल्म मुगल-ए-आजम का हवाला देते हुए कहते हैं जिसमें उन्होंने जोधाबाई को अकबर की बेगम बता दिया। जबकि हकीकत यह नहीं है। तब फिल्म का विरोध नहीं हुआ और बाद की पीढ़ियां जोधाबाई को अकबर की बेगम मानने लगीं। इसे लेकर हाल ही में विवाद भी हो चुका है। इसलिए ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की अनुमति किसी को नहीं दी जानी चाहिए।

छायावाद के प्रमुख हस्ताक्षर जयशंकर प्रसाद की अनेक रचनाएं ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं पर हैं। उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात हमले और वहां की रानी कर्णावती को लूट कर ले जाने की घटना और बाद में खिलजी के बेटे खिज्र खां द्वारा कर्णावती की बेटी देवला के साथ शादी करने की कथा पर लहर नाम से काव्य लिखा है। खिलजी के गिरने की यह चरम पराकाष्ठा थी कि उसने खुद गुजरात के राजा की बेवा को अपने हरम में रख लिया। उसकी निगाह कर्णावती, जिसका इतिहास में जिक्र कमला के तौर पर भी आता है, की बेटी देवला पर भी थी। यह बात और है कि उसके बेटे खिज्र खां ने बगावती तेवर अख्तियार कर लिए तो उसने देवला को बेटे को सौंप दिया। अमीर खुसरो के दीवान मसनबी-ए-खिज्र में इसका जिक्र है। बहरहाल अगर पद्मिनी ऐतिहासिक पात्र नहीं होती तो जयशंकर प्रसाद जैसी समझ की शख्सियत अपनी मशहूर रचना लहर में ऐसा नहीं लिखते। लहर में कमला सोच रही है-

सुना जिस दिन पद्मिनी का जल मरना
सती के पवित्र आत्म गौरव की पुण्य गाथा
गूंज उठी भारत के कोने-कोने जिस दिन
उन्नत हुआ था भाल
महिला महत्व का।

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