कैसा होगा 100 का नया नोट

नई दिल्‍ली।

सरकार 100 का भी नया नोट लाने वाली है। इससे पहले 2 हजार,  5सौ,  50 और 10 के नए नोट लाए जा चुके हैं। नए नोट का रंग बैगनी होगा और इस पर वैश्विक धरोहर में शामिल गुजरात की ऐतिहासिक रानी की बाव की झलक देखने को मिलेगी। यह ऐतिहासिक स्थल गुजरात के पाटन जिले में स्थित है। 100 रुपये के पुराने नोट भी चलन में रहेंगे।

इस नोट के डिजाइन को अंतिम रूप मैसूर की उसी प्रिंटिंग प्रेस में दिया गया, जहां 2000 के नोट की छपाई होती है। दिखने में यह नोट 100 रुपये के मौजूदा नोट से छोटा और 10 रुपये के नोट से बड़ा होगा।

100 रुपये के नए नोट की छपाई का काम बैंक नोट प्रेस देवास में शुरू हो चुका है। मैसूर में जो शुरुआती नमूने छापे गए थे, उनमें विदेशी स्याही का उपयोग हुआ था। देवास में देशी स्याही के उपयोग के चलते नमूने से रंग मिलान में आई परेशानी को भी दूर कर लिया गया है।

रानी की बाव की नक्काशी और यहां लगी मूर्तियों की खूबसूरती न केवल मन मोह लेती है बल्कि अपने वैभवशाली इतिहास पर गर्व भी कराती है। 2001 में इस बावड़ी से 11वीं और 12वीं शताब्दी में बनी दो मूर्तियां चोरी हो गईं थीं। इनमें एक मूर्ति गणपति और दूसरी ब्रह्मा-ब्रह्माणी की थी।

भारत की इस विरासत को यूनेस्को ने 2014 में विश्व विरासत की सूची में शामिल किया था। यूनेस्को ने इस बावड़ी को भारत में स्थित सभी बावड़ियों की रानी के खिताब से नवाजा है। 10वीं सदी में निर्मित यह बावड़ी सोलंकी वंश की भव्यता को दर्शाती है।

इस बावड़ी की लंबाई 64 मीटर, चौड़ाई 20 मीटर और गहराई 27 मीटर है। गुजराती भाषा में बावड़ी को बाव कहते हैं। इसलिए इसे रानी की बाव कहा जाता है क्योंकि इस बावड़ी का निर्माण रानी उदयामति ने 1063 में कराया था। बाव की दीवारों पर भगवान राम, वामनावतार, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि अवतार और भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों के चित्र अंकित हैं।

सनातन धर्म में प्यासे को पानी पिलाना ही सबसे बड़ा पवित्र कर्म बताया जाता है। इसी कारण हमारे राजा-महाराजा जगह-जगह राहगीरों के लिए बावड़ियों का निर्माण कराते थे।

इस बावड़ी की दीवारों पर अंकित धार्मिक चित्र और नक्काशी इस बात का प्रतिनिधित्व करते हैं कि उस समय हमारे समाज में धर्म और कला के प्रति कितना समर्पण था। यह बावड़ी वास्तु के लिहाज से भी बहुत विकसित मानी जाती है।

कौन थी रानी उदयामति?

रानी उदयामति सोलंकी राजवंश के राजा भीमदेव प्रथम की पत्नी थीं। राजा की मृत्यु के बाद उन्‍होंने राजा की याद में इस बावड़ी का निर्माण कराया था। बावड़ी में कई स्तर की सीढ़ियां हैं और यह देखने में बेहद सुंदर लगती है। पहली नजर में इसे देखने पर धरती में गढ़े किसी छोटे सुंदर महल का अहसास होता है।

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