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सिर्फ सरकार के बूते का नहीं बाढ़ रोकना

धीमी रफ्तार से निर्माण की वजह से एक ओर जहां नए इलाकों का तटबंध मजबूत किया जाता है वहीं पुराना निर्माण धवस्त हो जाता है। इस गति से बाढ़ लाने वाली नदियों पर तटबंध बनाना कभी संभव नहीं होगा।

राज्य सरकार को बाढ़ के प्रति जिम्मेवारी का बराबर अहसास बिहार विधान परिषद के पूर्व उप नेता असलम आजाद कराते रहे हैं। विधान परिषद में उन्होंने कई बार बाढ़ की समस्या को उठाया और इसके स्थायी निदान के लिए केंद्र से पत्राचार भी किया। वे बाढ़ की समस्या के खिलाफ वर्षों से संघर्षरत हैं। ओपिनियन पोस्ट संवाददाता ने उनसे बातचीत की:-

बाढ़ से स्थायी निजात के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?

बाढ़ से निजात पाना सिर्फ बिहार सरकार के बूते की बात नही हैं। इसमें काफी संसाधन खर्च होंगे। इस समस्या से निजात दिलाने में केंद्र सरकार की भूमिका अहम है क्योंकि यहां बाढ़ की समस्या अंतरराष्ट्रीय है। बिहार में बाढ़ का पानी नेपाल से आता है। इसे रोकने में नेपाल की भूमिका महत्वपूर्ण है।

हर साल बाढ़ से होने वाले जानमाल के नुकसान में इजाफा हो रहा है। क्या प्रदेश सरकार के प्रयास में चूक है?

जब भी बिहार में बाढ़ रोकने पर सरकारी चर्चा हुई तो बांध को बाढ़ से निजात का उपाय बताया गया। पिछले कुछ वर्षों से नदियों के तटबंध को मजबूत करने का प्रयास केंद्र व राज्य सरकार की ओर से किया जा रहा है। मगर यह काम भी समय पर पूरा नहीं हुआ। केंद्र अपने हिस्से की राशि समय पर नहीं देता जिससे निर्माण कंपनियां काम में देरी करती हैं। धीमी रफ्तार से निर्माण की वजह से एक ओर जहां नए इलाकों का तटबंध मजबूत किया जाता है वहीं पुराना निर्माण धवस्त हो जाता है। इस गति से बाढ़ लाने वाली नदियों पर तटबंध बनाना कभी संभव नहीं होगा। बिहार में बाढ़ के लिए जिम्मेवार नदियों का उद्गम स्थल नेपाल है। केंद्र ने कभी इस मुद्दे पर गंभीरता के साथ नेपाल से बातचीत नहीं की। कोसी नदी पर नेपाल के बराहक्षेत्र में प्रस्तावित बांध बांधने से 42,475 क्यूबिक मीटर प्रति सेंकेड तक के बहाव को रोका जा सकता है। साथ ही बांध गाद को रोक लेगा जिससे नदी का बहाव ज्यादा स्थिर हो जाएगा।

बाढ़ राहत में भारी हेराफेरी की शिकायत हमेशा से रही है। क्या बाढ़ लूट पर रोक संभव है?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि बाढ़ राहत में भारी हेरफेर होता है। बाढ़ राहत के दौरान अगस्त-सितंबर में और बाढ़ में हुए नुकसान की भरपाई के नाम पर मार्च में भारी लूट होती है। इसके लिए व्यवस्था जिम्मेवार है। राहत और पुनर्निर्माण में जुटे अधिकारी अपने अधिकारों का नाजायज फायदा उठाते हैं। कुछ वर्ष पहले बाढ़ राहत घोटाला भी सामने आ चुका है। इसके बाद भी सरकार ने अधिकारियों के अधिकार पर फिर से विचार नहीं किया। मौजूदा समय में भले ही बाढ़ को रोका नहीं जा सकता मगर व्यवस्था में बदलाव से बाढ़ राहत की लूट को रोका जा सकता है। सरकार आपादा राहत कानून बनाए। इसमें बाढ़ की किसी भी परिस्थिति को आपदा घोषित किए जाने के प्रावधान स्पष्ट हों। आपदा घोषित होने के बाद अधिकारियों के क्या अधिकार हों इसे बिल्कुल साफ करना चाहिए। अभी आपदा घोषित होने के साथ ही बाढ़ इलाके के अधिकारी आलाकमान हो जाते हैं।

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