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डिजीटल गांव पालनार -मैडम प्लीज पेटीएम कीजिये न!

धीरज ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘मैडम आप पेटीएम नहीं करतीं क्या? आप भूल गईं, आप कैशलेश गांव में हैं, आप पालनार में हैं।’

अब ये गांव नक्सलियों के गढ़ के रूप में नहीं बल्कि डिजीटल होने की वजह से चर्चा में है

संध्या द्विवेदी। छ्त्तीसगढ़ के जिले दंतेवाड़ा का नाम अभी तक सुर्खियों में रहा है तो नक्सली हिंसा या नक्सलियों के गढ़ के रूप में। मगर इन दिनों जिले का पालनार गांव सुर्खियों में हैं। वजह है, इस गांव का डिजीटल हो जाना। छत्तीसगढ़ का यह पहला गांव है जो डिजीटल हो गया है।

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दिसंबर 2016 से यहां अबाध रूप से डिजीटल सर्विस दी जा रही है। गांव के धीरज गुप्ता कहते हैं कि पहले लगा था कि यह महीने दो महीने का हल्ला है फिर सब खतम हो जायेगा। लेकिन अब करीब छह महीने हो गये हैं। हमारे गांव की चर्चा पूरे जिले में है। धीरज गर्व से बताते हैं कि ‘पहले भी कई बार यहां मीडिया आई है। मगर यहां के लोगों से सवाल जवाब नक्सलियों को लेकर ही होते थे। मगर अब लोग हमसे डिजीटल गांव के अनुभव पूछते हैं।’

रोजमर्रा के सामान की दुकान के मालिक धीरज गुप्ता ने बताया कि पहले खरीददार छुट्टा न होने का बहाना बनाकर उधार लेते रहते थे। लेकिन अब पेटीएम में पचास पैसे तक का भुगतान हो जाता है। इस मशीन ने छुट्टा न होने के बहाने की छुट्टी कर दी। तो दूसरी तरफ खरीददार सुरेश इसे ग्राहकों के लिये हितकर मानते हैं। उन्होंने बताया पहले दुकानदार चिल्लर न होने की बात कहकर टाफी दे देते थे। लेकिन अब चिल्लर न होने की चिक चिक नहीं है। पेटीएम करो और और जितना पैसा है उतना ही भुगतान करो। कुल मिलाकर दुकानदार और ग्राहक दोनों खुश हैं।

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बातचीत के दौरान मैंने उनसे कुछ खाने के सामान खरीदने के लिये अपना पर्स खोला तो धीरज ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘मैडम आप पेटीएम नहीं करतीं क्या? आप भूल गईं, आप कैशलेश गांव में हैं, आप पालनार में हैं।’

बुजुर्गों के लिये यह व्यवस्था मददगार साबित हो रही है। जिन बुजुर्गों का अकाउंट आधार कार्ड से लिंक है। उन्हें अब बैंक की लाइन में लगने की जरूरत नहीं है। बस अंगूठा लगाया आपका पैसा आपके हाथ में। खासतौर पर वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन पाने वाले लोग बेहद खुश हैं।

गांव के मुख्य चौराहे पर आधे किलोमीटर से ज्यादा इलाके में आपको भरपूर इंटरनेट मिल जायेगा। इंटरनेट की रफ्तार का अंदाजा लगाने के लिये झटपट दो एप डाउनलोडिंग में लगा दिये। एक एप डाउनलोड करने में डेढ़ मिनट तो दूसरा एप डाउनलोड करने में 1.7 सेकेंड का समय लगया। दूसरे गांव से आते जाते लड़के लड़कियां कुछ समय यहां जरूर बिताते हैं। 12वीं कक्षा के छात्र मिथलेश गुढ़ामी ने बताया की वो यहां रोजाना आधा घंटे बिताते हैं। फेसबुक, मेल और वाट्सअफ चेक करने और लोगों को संदेश भेजने के लिये।

गांव के जिला पंचायत अध्यक्ष नंदलाल मुढ़ामी कहते हैं, छत्तीसगढ़ का यह पहला गांव है जहां कैशलेश इंडिया का सपना सच होता दिख रहा है। जल्द ही यहां टेलीमैडिशन की सुविधा भी होगी। स्वास्थ्य से जुड़ी किसी गंभीर समस्या के बारे में गांव के डॉक्टर रायपुर के डाक्टर से सलाह ले सकेंगे। अगर ऐसा होगा तो केवल पालनार ही नहीं बल्कि आसपास के कई गांवों के लिये यह वरदान साबित होगा।

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हास्पिटल के अंदर जाने पर वाकई यह किसी गांव का अस्पताल नहीं लगता। कंप्यूटर के सामने बैठे स्वास्थ्य कर्मी ने झट से कंप्यूटर ऑन करके बताया कि देखिये अब हमे रिपोर्ट के लिये इंतजार नहीं करना पड़ता। एक्सरे, प्रेग्नेंसी, अल्ट्रासाउंड, या कोई और रिपोर्ट। इधर जांच हुई उधर डिजीटल रिपोर्ट में आंकड़े दर्ज हो गये।

 

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