सम्मत- लोकसभा चुनाव की झांकी

प्रदीप सिंह।

संसदीय जनतंत्र में चुनाव नतीजे सरकारों के कामकाज पर मतदाता का फैसला होते हैं। हर पांच साल पर (यदि चुनाव समय से हुए) सरकार को अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर जनता के बीच जाना पड़ता है। मतदाता इस रिपोर्ट कार्ड के सामने आने से पहले अपना भी एक रिपोर्ट कार्ड तैयार करता रहता है। वह इस बात का इंतजार नहीं करता कि सरकार उसके सामने अपने कामकाज का लेखा जोखा लेकर आए उसके बाद वह फैसला करेगा। सरकार बनने के बाद से ही लोग सरकार को जांचते रहते हैं। आमतौर पर मतदाता किसी भी सरकार को चार पांच कसौटियों पर कसता है। पहली, सरकार आम लोगों के सरोकारों के प्रति कितनी संवेदनशील है। यानी संकट के समय वह कितनी मुस्तैद रहती है। दूसरा, जिस रास्ते पर उसने चलने का वादा किया था वह उस रास्ते पर चल रही है या नहीं। तीसरा, सरकार के कामकाज से आम आदमी के जीवन पर कोई सकारात्मक असर पड़ रहा है या पड़ने की संभावना दिख रही है कि नहीं। चौथा, सरकार की नीयत कैसी है। उसकी नीयत उसकी नीतियों से मेल खाती है या नहीं। और पांचवां, वह एक और मौका देने लायक है या नहीं। चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दलों और नेताओं की नजर मतदाता की इस पांचवीं कसौटी पर ही रहती है। उनकी कोशिश रहती है कि बाकी चार कसौटियों पर वे खरे उतरें तो पांचवीं कसौटी से आसानी से गुजर जाएंगे। सरकार के कामकाज के बारे में मतदाता की राय पर ही विपक्ष की उम्मीद टिकी होती है। इसलिए विपक्ष की पूरी कोशिश होती है कि मतदाता के समक्ष ऐसी तस्वीर पेश करे कि वह सत्तारूढ़ दल को एक और मौका देने की बजाय विपक्ष को अवसर दे।
देश के पांच राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो चुकी है। छत्तीसगढ़ के अलावा बाकी सभी राज्यों में एक ही चरण में मतदान होगा। सबसे आखिर में सात दिसम्बर को राजस्थान में वोट पड़ेंगे और ग्यारह दिसम्बर को वोटों की गिनती होगी। साल 2019 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव नतीजों की अहमियत ज्यादा है। उसका एक कारण तो यह है कि लोकसभा चुनाव से पहले यह किसी भी राज्य में आखिरी चुनाव होंगे। पर उससे बड़ा कारण यह है कि इन तीन राज्यों में भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर है। इन राज्यों में कोई बड़ी तीसरी ताकत नहीं है। छत्तीसगढ़ में इसे बनाने की कोशिश हो रही है। राज्य में नक्सली हमले में कांग्रेस का समूचा प्रदेश नेतृत्व मारा गया। केवल पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी बचे। उन्होंने भी अपनी अलग पार्टी बना ली है और अब बहुजन समाज पार्टी से समझौता कर लिया है। राज्य में पहली बार जोगी कांग्रेस विरोधी खेमे में होंगे। राज्य में कांग्रेस का जो नेतृत्व है वह तरह तरह के विवादों में उलझा है। दूसरी ओर पंद्रह साल की ऐंटी इनकम्बेंसी के बावजूद मुख्यमंत्री रमन सिंह की हालत खराब नहीं दिख रही है। यह तिकोना मुकाबला उनके लिए मददगार साबित हो सकता है।
मध्य प्रदेश में इस बार कांग्रेस ने कमर कसी है। लेकिन उसकी इस कसी कमर को उसके अपने ही ढीली कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करने से मना कर दिया है। उन्होंने पार्टी हाईकमान पर तंज कसते हुए कहा कि ‘कहा जा रहा है कि मेरे जाने से कांग्रेस का वोट कम हो जाता है। इसलिए मैं चुनाव सभाओं में नहीं जाऊंगा।’ कोशिश के बावजूद बहुजन समाज पार्टी से कोई समझौता नहीं हो पाया। बसपा ने इसके लिए कांग्रेस की नीति और उसके नेता दिग्विजय सिंह को जिम्मेदार ठहराया। बसपा नेता मायावती ने कांग्रेस पर जितने और जिस तरह के आरोप लगाए वह कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था। बात केवल तीन राज्यों की नहीं है। लोकसभा चुनाव में कोई भी महागठबंधन मायावती के बिना बहुत कमजोर रहेगा। क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के बाद बसपा ही एक ऐसी पार्टी है जिसका दूसरे राज्यों में भी जनाधार है। भले ही कम हो पर है। मायावती ने कांग्रेस के लिए कहा कि ‘रस्सी जल गई बल नहीं गया। कांग्रेस हमेशा पीठ में छुरा घोंपती है।’ इसके अलावा उनका एक वाक्य महागठबंधन की उम्मीद पर पानी फेरने वाला है। मायावती ने कहा कि ‘चुनाव पूर्व गठबंधन से बसपा को हमेशा नुकसान होता है।’
मध्य प्रदेश में भाजपा के विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ अच्छी खासी नाराजगी है। कांग्रेस की उम्मीद इसी पर टिकी है। पर उसका अपना घर यदि ठीक नहीं रहा तो सत्ता चौथी बार भी हाथ से फिसल सकती है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता में बहुत ज्यादा कमी नहीं आई है। उसका एक बड़ा कारण है उनका सहज स्वभाव, सबसे मिलने को तत्पर रहना और आम लोगों में घुलमिल जाना। राजस्थान भाजपा के लिए सबसे टेढ़ी खीर है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया भाजपा के लिए बोझ बन गई हैं। पार्टी की समस्या यह है कि बीच चुनाव में इस बोझ से छुटकारा पाना भी संभव नहीं है। राजस्थान में कोई चमत्कार और अमित शाह ही भाजपा को जिता सकते हैं। राजस्थान में कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता अशोक गहलोत हैं। पर मुख्यमंत्री पद के लिए राहुल गांधी की पहली पसंद सचिन पालयट हैं। इसके बावजूद कांग्रेस किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने के लिए तैयार नहीं है। पार्टी को लग रहा है कि मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से गुटबाजी और भितरघात बढ़ सकती है। इन तीनों राज्यों में एक बात समान है कि तीनों जगह भाजपा सत्ता में है और ऐंटीइनकम्बेंसी का सामना कर रही है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पंद्रह साल से भाजपा सत्ता में है। नेहरू के दौर के बाद लगातार चौथी बार सत्ता में आने के दो ही उदाहरण हैं। पश्चिम बंगाल में वामदलों की सरकार और गुजरात में भाजपा की सरकार।
इन परिस्थितियों में राहुल गांधी के नेतृत्व और वोट दिलाने की क्षमता का बड़ा इम्तहान है। तीनों राज्यों में परिस्थितियां कांग्रेस के अनुकूल हैं। यहां कांग्रेस की जीत न केवल राहुल गांधी के नेतृत्व में भरोसा बढ़ाएगी बल्कि विपक्षी एकता का मार्ग भी प्रशस्त करेगी। इन तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे लोकसभा चुनाव के लिए राजनीतिक ध्रुवीकरण की दिशा तय करेंगे। इन चुनाव नतीजों से लोकसभा चुनाव के नतीजे के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना शायद जल्दबाजी होगी। क्योंकि इससे पहले भी राज्यों के चुनाव नतीजे और उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के नतीजे अलग अलग रहे हैं। इन तीन राज्यों में भाजपा की हार उसके लिए 2019 का मुकाबला और मुश्किल बना देगी। पर इन राज्यों में जीत उसके राजनीतिक विरोधियों का हौसला पस्त कर देगी। यही वजह है कि दोनों राष्ट्रीय दलों ने इन चुनावों को प्रतिष्ठा का चुनाव बना लिया है। टिकटों का बंटवारा दोनों दलों के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि उसके बाद भड़कने वाले असंतोष को दबाना आसान नहीं होता। आखिर में तो मतदाता को ही यह तय करना है कि वह सत्तारूढ़ दल को एक और मौका देना चाहता है या विरोधी दल को एक मौका देना चाहता है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस बार जिसकी भी हार होगी वह इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को दोष नहीं देगा। इन चुनावों को लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल तो नहीं कह सकते पर झांकी जरूर कह सकते हैं। 

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