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आओ मिलकर लड़ें बच्चों के खिलाफ़ हो रहे अपराधों से- कैलाश सत्यार्थी

नोबल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी बाल अधिकारों के लिए पिछले 30 सालों से काम कर रहे हैं। उनकी गैर सरकारी संस्था बचपन बचाओ आंदोलन पिछले तीस सालों में करीब 80 हजार बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त कराने के लिए जानी जाती है। इस बार उन्होंने सोमवार को बच्चों के यौन उत्पीड़न और तस्करी के खिलाफ देशव्यापी मार्च की शुरूआत कर दी है। यह यात्रा ‘सुरक्षित बचपन-सुरक्षित भारत’ मुहिम के तहत की जाएगी। भारत यात्रा समेत, बच्चों की तस्करी, बाल शोषण जैसे अहम मुद्दों पर निशा शर्मा ने उनसे विस्तार से बात की।

भारत यात्रा के बारे में बताइए किस तरह से चलेगी?
35 दिनों की यह यात्रा 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से होकर गुजरेगी, जिसमें 11 हजार किलोमीटर का सफर तय किया जाएगा। इस यात्रा की शुरुआत सितंबर में होगी, जिसे कई चरणों में बांटा गया है। दक्षिण में यात्रा की शुरुआत कन्याकुमारी से होगी और इसमें पूरे पश्चिम भारत को कवर किया जाएगा। इसी तरह देश के पूर्वी हिस्से में यात्रा की शुरुआत गुवाहाटी से होगी और उत्तर भारत में श्रीनगर से इसकी शुरुआत होगी। यात्रा का समापन 15 अक्टूबर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में होगा।

इस यात्रा से क्या उम्मीद कर रहे हैं आप?
मैं उम्मीद कर रहा हूं कि कई हजार बच्चे, नौजवान, बड़े-बूढ़े इस यात्रा में शामिल होंगे। हम अपनी यात्रा में सबको इस बात की शपथ दिलाते चलेंगे कि वे अपने इर्द-गिर्द बच्चों के साथ यौन शोषण, हिंसा और बलात्कार जैसी घटनाएं नहीं होने देंगे। साथ ही ऐसे लोगों के खिलाफ आवाज भी उठाएंगे जो गांवों में, शहरों में बच्चों की दलाली से जुड़े हैं। साथ ही हम उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार पास्को कानून को सख्ती से पालन करवाने की पहल भी करेगी, जिसमें पुलिस, ज्यूडिशयरी जैसी संस्थाएं आती हैं। इस यात्रा में हम इन संस्थाओं के सदस्यों या पूर्व सदस्यों का भी सहयोग ले रहे हैं ताकि वे भी इसमें अपनी भागीदारी को समझें। हम यह भी अपेक्षा कर रहे हैं कि हमारी संसद बाल तस्करी के खिलाफ कानून जल्द पारित करेगी।

मीडिया रिपोर्टों की मानें तो बच्चों की तस्करी, बाल यौन शोषण या बंधुआ मजदूरी जैसे मामले बढ़े हैं, ऐसे में आप क्या कारण मानते हैं इसके लिए?
मैं बाल मजदूरी, यौन शोषण और बंधुआ मजदूरी जैसी चीजों को महामारी मानता हूं। इसका एक कारण शिक्षा व जागरूकता की कमी है। दूसरा बड़ा कारण है आम लोगों की उदासीनता और घटना पर चुप्पी साधे रहना है और तीसरा और बड़ा कारण कानून का ठीक से पालन न हो पाना है, जिसकी वजह से अपराधी स्वतंत्र और बेखौफ घूमते रहते हैं। इन तीनों से हमें एक साथ लड़ना होगा ताकि हम अपने देश के भविष्य को संवार पाएं। हम अपनी यात्रा के द्वारा राज्यों को ही नहीं बल्कि पूरे देश को सुरक्षित करना चाहते हैं। हम चाइल्ड फ्रेंडली होम, स्कूल, वातावरण बनाने की कोशिश में हैं। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहां की मानसिकता है कि अगर लड़की के साथ ऐसा कुछ हुआ है, तो इसकी कसूरवार वह है या उसका परिवार है। यही नहीं ऐसा होने पर अभी बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो बात को बाहर भी नहीं निकालते ताकि बेटी की शादी में कोई रुकावट न आ पाए। मैं बार-बार इस बात पर जोर देता हूं कि इज्जत तो उन लोगों की लुटती है जो इस तरह के बुरे काम करते हैं, ऐसी वारदात को अंजाम देते हैं। लड़की की कौन-सी इज्जत लुटेगी। यह देश दुर्गा का देश है, यहां हमारी शक्तियों की इज्जत लूटने की किसकी हिम्मत है। वे लोग लुटेरे हैं जो ऐसी वारदात को अंजाम दे रहे हैं और सरकार जल्द ऐसे लोगों के लिए सख्त कानून लाएगी।

सुरक्षित भारत की यात्रा के बाद के परिणामों में आपको क्या लगता है कि क्या सुधार होगा?
सुरक्षित भारत की यात्रा एक महीने की यात्रा नहीं है। इसे हम तीन साल की मान कर चल रहे हैं। मुझे लगता है कि हम भारत को सुरक्षित भारत बनाने में जरूर कामयाब होंगे। मैं यह नहीं कहता कि समाज में बच्चे-बच्चियां पूरी तरह सुरक्षित हो जाएंगी। लेकिन मुझे लगता है इस यात्रा के बाद हम आम जनता में जागरूकता का संचार कर देंगे। उसके बाद इन मुद्दों पर लोग बोलने लगेंगे, यही नहीं सरकारें ज्यादा मुस्तैदी से काम करेंगी और बच्चे इतना साहस जुटा पाएंगे कि अगर उनके साथ कुछ गलत हुआ है तो वे उसके बारे में बताएंगे। घरों में, स्कूलों में कहीं भी उनके साथ छेड़खानी हो रही होगी तो वे उसके खिलाफ बोलेंगे। मुझे लगता है कि माता-पिता में भी यह साहस आएगा कि वे पुलिस के पास जाकर शिकायत दर्ज करवाएंगे। अभी ऐसा है कि लोग शर्म-लज्जा, भय, मान-मर्यादा बचाने के लिए शिकायतें दर्ज नहीं करवाते हैं। दरअसल, बच्चों का शोषण सबसे ज्यादा उनके घरों में होता है और उन लोगों के द्वारा किया जाता है जिससे वे अच्छी तरह से परिचित होते हैं। इनमें सौतेला बाप, मामा, चाचा, भाई जैसे लोग शामिल होते हैं।

आपने यात्रा से पहले देश भर में यात्राएं कीं और नागरिकों, धार्मिक नेताओं, कर्मचारियों, कारपोरेट्स, सांसदों, सामाजिक संगठनों आदि से मुलाकात की, कैसी प्रतिक्रिया रही?
इस बुराई को खत्म करने के लिए हमें एक साथ खड़े होना पड़ेगा। इसका अंत सिर्फ पुलिस नहीं कर सकती। उसके लिए सामाजिक जागरूकता जरूरी है, सामाजिक आंदोलन जरूरी है। संयोग से मैं किसी विचारधारा के साथ जुड़ा हुआ नहीं हूं, किसी राजनीतिक पार्टी से मेरा लेना-देना नहीं है। मुझे सबके साथ काम करने में आसानी है और सबको मेरे साथ काम करने में। मैं सभी धर्मों के, सभी राजनैतिक पार्टियों से मिल रहा हूं, सभी ने समर्थन देने का वादा किया है। धर्म गुरुओं ने कहा कि हम आपकी यात्रा के दौरान लोगों को भोजन करवाएंगे, अपने यहां ठहराएंगे। आपका साथ देंगे। मैं अपने फायदे के लिए यह काम नहीं करने जा रहा हूं। मैं सभी के बेहतरीन भविष्य के लिए यह कदम उठा रहा हूं, जिसमें सब बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी दे रहे हैं।

आपने हिमाचल से कोटखाई गैंग रेप पीड़िता के पिता को भी अपनी यात्रा में शामिल करने की बात की, लेकिन यह यात्रा हिमाचल से होती हुई नहीं जाएगी, क्यों? जबकि वहां भी इस तरह की घटनाएं घटनी शुरू हो गई हैं?
देखिए, यह सही है कि यह यात्रा हिमाचल होकर नहीं जाएगी, लेकिन हमने हिमाचल के मंत्रियों, धर्मगुरुओं से इसमें भागीदारी देने को कहा है। श्रीनगर से होती हुई यात्रा जम्मू, पंजाब आएगी। इसी बीच में हिमाचल से भी बहुत लोग इसमें जुड़ेंगे, जिसमें गुड़िया (गैंग रेप पीड़िता) के पिता और हिमाचल से कई लोग इस यात्रा में जुड़ेंगे। बहुत से लोगों ने अपना सहयोग देने की बात कही है।

अगर हिमाचल की तरह और भी राज्य आपकी यात्रा में छूटते हैं तो वहां के लिए आपका क्या प्लॉन है?
हम उस राज्य की सरकार से लगातार बातचीत कर रहे हैं, जहां हम जा नहीं पा रहे हैं। हम उन राज्यों की धार्मिक संस्थाओं, एनजीओ, शिक्षाविदों को साथ लेकर चल रहे हैं ताकि वे इन सब मुद्दों पर बोलें और उनकी बात गांव-गांव तक पहुंचे। हम यह भी कोशिश कर रहे हैं कि एक सही तरह से तैयार की गई सेक्स एजुकेशन हमारी शिक्षा प्रणाली का हिस्सा हो, जिससे हम बच्चों को भी सतर्क कर सकें।

आप शिक्षा में सेक्स एजुकेशन की बात कर रहे हैं लेकिन क्या आपको लगता है कि ऐसी शिक्षा की सिर्फ गांवों में जरूरत है, मुंबई के एक प्राइवेट स्कूल में चार साल की बच्ची को चपरासी ने अपनी हवस का शिकार बनाया। शिक्षा में कहां कमी लगती है?
भारत में शिक्षा की कमी एक बड़ा मुद्दा है। हमारी शिक्षा में मानव मूल्यों का समावेश होना चाहिए। शिक्षा से समाज में सहनशीलता आती है जिससे शांति, भाईचारा और एक दूसरे के लिए सम्मान पैदा होता है। हम नई शिक्षा नीति में यह मांग कर रहे हैं कि बच्चों के संपर्क में आने वाले जो भी लोग हैं। जैसे डॉक्टर, पुलिस, अध्यापक, अध्यापिका, ड्राइवर, चपरासी, माली जो भी हैं, इनकी ट्रेनिंग, इनकी जवाबदेही तय हो। सरकार ने हमारे इस परामर्श को माना भी है।

देश में लापरवाही से बच्चों की मौत पर आप क्या कहना चाहेंगे?
देखिए, मुझे जो कुछ कहना था, अपने ट्वीटर अकाउंट के जरिये कह चुका हूं और बस यह कहना चाहूंगा कि हर कोई अगले चुनाव के लिए राजनीति चमका रहा है तो क्यों न हम अपने इस तरह के प्रयासों से अगली पीढ़ी को चमकाएं।

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