करे कोई, भुगते कोई

कांग्रेस की सरकार नक्सल समस्या के समाधान को लेकर कितनी भ्रमित है, इसका एक जीता जागता उदाहरण है, गोडेलगुड़ा की घटना. इस घटना में दो आदिवासी महिलाओं की मौत को लेकर राज्य के कैबिनेट मंत्री सीआरपीएफ को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं वहीं पुलिस प्रशासन का कुछ और ही कहना है…

सुकमा जिले के गोडेलगुड़ा में फरवरी के पहले सप्ताह में हुई पुलिस-नक्सली मुठभेड़ में वर्दी एक बार फिर दागदार हुई. घटना ने आबकारी मंत्री कवासी लखमा को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पत्र लिखने के लिए विवश कर दिया कि फर्जी मुठभेड़ की ऐसी घटनाओं से बस्तर के गरीब आदिवासियों का सरकार के प्रति विश्वास कमजोर होगा. दरअसल, पोलमपल्ली थाना क्षेत्र के गोडेलगुड़ा गांव के पास दो आदिवासी महिलाएं पोडिय़म सुक्की एवं कलमु देवे लकड़ी काटने गई थीं. दोनों को संदिग्ध नक्सली मानते हुए सुरक्षा बल और जिला पुलिस ने गोली मार दी, जिससे पोडियम सुक्की की मौत हो गई और कलमु देवे का पैर टूट गया. दोनों महिलाओं के पास से गोली-बंदूक या अन्य कोई संदिग्ध सामग्री नहीं मिली. सुक्की के चार बच्चे हैं, जिनमें चौथा महज छह माह का है. रमन सिंह सरकार में भी फर्जी मुठभेड़ के चलते कई बार वर्दी पर उंगली उठी. गोडेलगुड़ा मुठभेड़ को सामाजिक कार्यकर्ता और नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखने वाली सोनी सोरी ने फर्जी बताते हुए एसपी-सुकमा जितेंद्र शुक्ला की भूमिका संदिग्ध बताई. मुठभेड़ में नक्सलियों पर नहीं, बल्कि ग्रामीणों पर गोलियां बरसाई गईं. सुक्की और देवे को वर्दी पहना कर उन्हें नक्सली बताने की कोशिश की गई.

वहीं एसपी जितेंद्र शुक्ला का कहना है, उक्त महिलाएं जहां लकड़ी काटने गई थीं, वहां नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ चल रही थी. क्रास फायरिंग में महिलाएं गोलियों की चपेट में आ गईं. आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने कहा, सीआरपीएफ एवं जिला पुलिस के दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए और सुक्की के परिवारीजनों को 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और किसी एक सदस्य को शासकीय नौकरी दी जाए. घायल कलमु देवे को पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए, ताकि आदिवासियों का सरकार पर भरोसा कायम हो सके.

आठ साल बाद घुसी फोर्स

अबूझमाड़ माओवादियों का आधार इलाका माना जाता है. यहां पहली बार 2011 में फोर्स घुसी थी. ऑपरेशन हाका में बस्तर, बीजापुर एवं नारायण पुर पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई की थी. हालांकि, पुलिस को कुछ खास हासिल नहीं हुआ था. इंद्रावती नदी के पार इस इलाके की 11 पंचायतों के 65 गांव बीजापुर में आते हैं. मुठभेड़ करके वापस लौटना और बारिश में घुसना-निकलना जोखिम भरे कार्य हैं. पहाडिय़ों और घने जंगलों के चलते सुरक्षा बल यहां आने से कतराते हैं, क्योंकि माओवादी कहीं भी घात लगाकर हमला कर देते हैं.

जंगल में प्रशिक्षण शिविर

माओवादियों का मानना है कि सत्ता का रास्ता बंदूक की गोली से निकलता है. यही वजह है कि बीते डेढ़ दशक से पुलिस और नक्सलियों के बीच संघर्ष थम नहीं रहा है. बीती नौ फरवरी को इंद्रावती नदी के उस पार अबूझमाड़ के जंगलों में नक्सलियों की मिलिट्री और जन मिलिशिया टीमों की ट्रेनिंग बड़े नक्सलियों की मौजूदगी में चलने की सूचना सुरक्षा बलों को मिली, तो उनके कान खड़े हो गए. हमले की रणनीति बनाई गई. सुरक्षा बलों के 30 घंटे के ऑपरेशन के दौरान १० नक्सली मारे गए और कई कुख्यात नक्सली भाग गए. इस ऑपरेशन में पुलिस ने 361 राउंड गोलियां दागीं और नक्सलियों ने २५० राउंड फायर किए. एसपी-बीजापुर मोहित गर्ग ने बताया कि अबूझमाड़ में नक्सलियों को बड़ा प्रशिक्षण शिविर चल रहा था. शवों की शिनाख्त के लिए पहुंचे ग्रामीणों ने इसकी पुष्टि की है.

शिनाख्त करने में दिक्कत

पुलिस दावा कर रही है कि उसने अबूझमाड़ में नक्सलियों का शिविर ध्वस्त किया, लेकिन मुठभेड़ में मारे गए नक्सलियों की शिनाख्त कराने में उसे चार दिनों से अधिक समय लग गया. वह मारे गए नक्सलियों के सिर्फ नाम, उम्र और पता ही ढूंढ पाई. अधिकारी यह नहीं बता पाए कि जिन्हें मुठभेड़ में मारा गया, वे नक्सली संगठन में कबसे सक्रिय थे. किस स्तर पर काम कर रहे थे. उन पर कोई इनाम था या नहीं. मारे गए नक्सलियों की पहचान और कार्रवाई से लेकर उनके शव परिवारीजनों को सौंपने तक पूरी प्रक्रिया बेहद गोपनीय रखी गई. एसपी-बीजापुर मोहित गर्ग ने कहा, मारे नक्सलियों के परिवारीजन जब शव लेने आए, तो वे सिर्फ नाम और पते ही बता पाए.

हथियार और राशन बरामद

ग्राम जीड़पल्ली के जंगल पहाड़ में प्रतिबंधित सीपीआई माओवादियों के जमावड़े की सूचना बीजापुर पुलिस को मिली. थाना पामेड़ एवं तोंगगुडा के संयुक्त बल को जीड़पल्ली के जंगल नाले के पास माओवादियों का शिविर दिखाई दिया. भनक मिलते ही माओवादियों ने फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस के बढ़ते दबाव से घबरा कर माओवादी भाग गए. घटना स्थल से चार भरमार बंदूकें, प्रेशर कुकर, कार्डेक्स वायर, कमर्शियल एक्प्लोजिव, स्वीच मय इलेक्ट्रिक वायर, स्पाईक, नक्सली वर्दी, बैनर, पोस्टर, पंपलेट्स, चार टैंट, बर्तन, चावल, दाल, तेल, कंबल, पानी, ड्रम और दैनिक उपायोग की अन्य सामग्री पुलिस के हाथ लगी. राजनांदगांव जिले के बकरपट्टा थाना अंतर्गत सबरदानी जंगल में नक्सलियों ने ड्रम के अंदर हथियार छुपाकर रखे थे. दरअसल, गर्मी में नक्सली वारदात करने के लिए घने जंगलों से बाहर निकल आते हैं. यहां 315 बोर रायफल के साथ बड़ी संख्या में वर्दी, जूते और अन्य सामग्री जब्त की गईं. आईजी-दुर्ग रतन लाल डांगी ने बताया कि नक्सली मूवमेंट को ध्यान में रखते हुए लगातार सर्चिंग अभियान चलाया जा रहा है.

नक्सलियों का आत्म समर्पण जारी

नक्सलियों पर दबाव बनाने का अभियान जारी है. यही वजह है कि वे लगातार हथियार डाल रहे हैं. 13 लाख रुपये के इनामी नक्सली दंपति नंदू और कमला ने आईजी-दुर्ग रतन लाल डांगी के सामने आत्म समर्पण कर दिया. उन्होंने नौ बड़ी घटनाएं अंजाम दीं और वे शहरी नेटवर्क के लिए काम करते थे. दोनों नक्सली एमएमसी जोन इंचार्ज दीपक उर्फ मिलिंद तेलतुंबडे के विश्वासपात्र थे. उन्हें आईजी ने 10-10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी. नंदू 2004 में नागपुर में पढ़ाई के दौरान छात्र आंदोलन के जरिये माओवादी पार्टी (भाकपा) में शामिल हुआ था. बीजापुर में आईजी-बस्तर विवेकानंद सिन्हा के समक्ष 11 लाख रुपये के इनामी नौ माओवादियों ने आत्म समर्पण किया, जिनमें एक महिला भी शामिल है.

कमजोर हुए नक्सली: डीजीपी

ग्राम पंचायत दोरनापाल इलाके में नक्सलियों ने सडक़ के किनारे पेड़ों पर पर्चे लगाकर गोदेलगुड़ा मुठभेड़ को फर्जी करार देकर विरोध जताया. नेता प्रतिपक्ष धरम लाल कौशिक कहते हैं, पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह की वजह से नक्सली बैकफुट पर आ गए थे, अब बस्तर में नक्सली गतिविधियां तेज हो गई हैं. भाजपा सरकार ने 2022 तक राज्य को नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य तय किया था, लेकिन मौजूदा हालात के चलते ऐसा हो पाने में संदेह है. डीजीपी डीएम अवस्थी कहते हैं, नक्सली पहले से कमजोर हुए हैं. अब लाल गलियारा क्षेत्र भी घट गया है. अबूझमाड़ में नक्सली सक्रिय हैं. बावजूद इसके, माओवादियों के कई ठिकाने ध्वस्त किए गए हैं, जहां बड़ी मात्रा में हथियार बरामद हुए और कई नक्सली मारे गए. बहुत जल्द छत्तीसगढ़ नक्सल मुक्त हो जाएगा. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं, छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद एक गंभीर समस्या है, जिसे कोई भी तुरंत हल नहीं कर सकता, क्योंकि उनकी बहुत मजबूत पकड़ है. केवल बंदूक के जरिये हल नहीं ढूंढा जाएगा. अब तक सरकारें बंदूक के रास्ते नक्सलवाद का हल निकालना चाहती थीं.

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